VIDEO : कारगिल युद्ध छेड़ने वाले दिल्ली के परवेज़ मुशर्रफ को पाकिस्तान में मिली फाँसी की सज़ा

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 17 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। एक तरफ दिल्ली में निर्भया कांड के 4 अपराधियों को फाँसी पर लटकाने की तैयारियाँ चल रही हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली में ही जन्मे और वर्ष 1999 में कश्मीर में कारगिल का युद्ध छेड़ने वाले पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ को देशद्रोह के एक मामले में पाकिस्तान में फाँसी की सज़ा सुनाई गई है। हालाँकि मुशर्रफ अभी पाकिस्तान में नहीं हैं और वे दुबई में निर्वासित जीवन जी रहे हैं, जहाँ वे अजीबो-गरीब बीमारी से पीड़ित हैं और अपना इलाज करवा रहे हैं। अब इस सज़ा के बाद मुशर्रफ के जीवन पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है कि वे फाँसी से बच पाएँगे या नहीं ?

दिल्ली में जन्मे मुशर्रफ पर 2013 में दर्ज हुआ था राजद्रोह का मामला

76 वर्ष के परवेज़ मुशर्रफ ब्रिटिश भारत में दिल्ली के दरियागंज इलाके में 11 अगस्त 1943 को जन्मे थे। 1947 में भारत के बँटवारे के बाद उनका परिवार कराची जाकर बस गया था। जब जनरल परवेज़ मुशर्रफ पाकिस्तान के सेना प्रमुख थे, तब उन्होंने ही 1999 के प्रारंभ में अपने सैनिकों की घुसपैठियों के वेश में कश्मीर में घुसपैठ करवाई थी, जिसके बाद अप्रैल से जून-1999 तक कश्मीर में कारगिल युद्ध हुआ था। इस युद्ध में भी पिछले युद्धों की तरह ही पाकिस्तान की करारी शिकस्त हुई थी। हालाँकि भारतीय सेना के सैकड़ों सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद अक्टूबर-1999 में जब तत्कालीन नवाज़ शरीफ़ सरकार ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख के पद से हटाने का प्रयास किया तो मुशर्रफ ने उनके प्रति वफादार जनरलों की मदद से शरीफ़ सरकार का तख्ता पलट कर दिया था और सरकार पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद मई-2000 में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव कराने का आदेश दिया था, तब मुशर्रफ ने जून-2001 में तत्कालीन राष्ट्रपति रफीक़ तरार को हटा दिया और खुद राष्ट्रपति बन बैठे थे। इसके बाद अप्रैल 2002 में उन्होंने सेना प्रमुख के साथ-साथ राष्ट्रपति बने रहने के लिये जनमत संग्रह कराया था, जिसका अधिकांश राजनीतिक दलों ने बहिष्कार किया था। अक्टूबर-2002 में पाकिस्तान में चुनाव हुए थे, जिसमें मुशर्रफ का समर्थन करने वाली मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमाल पार्टी को बहुमत मिला था, उसकी सहायता से मुशर्रफ ने पाकिस्तान के संविधान में कई परिवर्तन कराये थे। इन बदलावों के माध्यम से मुशर्रफ ने 1999 के तख्ता पलट और अपने अन्य कई आदेशों को वैधानिक ठहराया था। मुशर्रफ के कार्यकाल में भारत में आतंकी हमले बढ़े थे। 2005 में परेड नामक एक पत्रिका ने मुशर्रफ को दुनिया के 10 सबसे बुरे तानाशाहों की सूची में रखा था। 24 नवंबर 2007 को उन्होंने सेना प्रमुख के पद से त्यागपत्र दिया था और असैन्य राष्ट्रपति की शपथ ली थी। इसी साल उन्होंने पाकिस्तान में आपातकाल लागू किया था। उनके शासन का अंत होने के बाद 2013 में फिर से चुनी गई नवाज़ शरीफ़ सरकार ने मुशर्रफ के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाने के लिये सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था।

2014 में राजद्रोह के लिये दोषी ठहराये गये थे मुशर्रफ

दिसंबर 2013 में मुशर्रफ के विरुद्ध 3 नवंबर-2007 को देश में आपातकाल लागू करने और दिसंबर 2007 के मध्य तक संविधान को निलंबित करने के लिये राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया था और मुकदमा चलाया गया था, जिसमें 31 मार्च 2014 को उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया गया था। इससे पहले कि दोषी ठहराये जाने के बाद उन्हें सज़ा सुनाई जाती, वे अपीलीय मंचों पर दायर की गई याचिकाओं की सुनवाई में देरी होने तथा उच्च अदालतों व गृह मंत्रालय की मंजूरी लेकर 18 मार्च-2016 को पाकिस्तान से बाहर चले गये। अभी वे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के शहर दुबई में रह रहे हैं। मई-2018 में पाकिस्तान के गृह मंत्रालय की ओर से विशेष अदालत के आदेश पर मुशर्रफ का पाकिस्तान का पहचान पत्र और पासपोर्ट सस्पेंड कर दिया गया है। पिछले साल ही पाकिस्तान सरकार की ओर से विशेष अदालत को यह भी सूचित किया गया था कि इंटरपोल ने मुशर्रफ के प्रत्यर्पण को लेकर रेड वारंट जारी करने से इनकार कर दिया है। इस्लामाबाद उच्च न्यायालय ने मुशर्रफ तथा पाकिस्तान सरकार की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए विशेष अदालत को गत 28 नवंबर को फैसला सुनाने से रोक दिया था। इसलिये विशेष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने बयान जारी करके 17 दिसंबर 2019 को फैसला सुनाने की घोषणा की थी।

इससे पहले पिछले सप्ताह विशेष अदालत ने मुशर्रफ को 5 दिसंबर को अपना बयान रिकॉर्ड कराने का आदेश दिया था, परंतु मुशर्रफ ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा था कि वे काफी बीमार हैं और पाकिस्तान आकर बयान दर्ज नहीं करवा सकते हैं। पाकिस्तानी मीडिया में चल रही ख़बरों के अनुसार मुशर्रफ एक दुर्लभ किस्म की बीमारी अमिलॉइडोसिस से पीड़ित हैं। इस बीमारी में उनकी बची हुई प्रोटीन शरीर के अंगों में जमा हो रही है। इसके अलावा वे हार्ट और ब्लडप्रेशर का भी इलाज करवा रहे हैं। पिछले दिनों ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग की ओर से उनकी एक तस्वीर भी जारी की जा चुकी है, जिसमें वे बीमार और कमजोर दिखाई दे रहे थे।

ऐसी परिस्थितियों में अब मुशर्रफ को ऊपरी अदालत में अपील करने का अवसर  मिलेगा या नहीं, इसको लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पाकिस्तानी मीडिया के एक चैनल से बात करते हुए वहाँ के कानून के एक जानकार ने कहा कि जिस कानून के तहत मुशर्रफ को यह सज़ा दी गई है, उस फैसले को विस्तार से पढ़े बिना कोई भी टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। एक संभावना यह हो सकती है कि मुशर्रफ विशेष अदालत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं, परंतु विशेष अदालत ने अपने फैसले में मुशर्रफ के लिये ऐसी किसी अपील का अवकाश छोड़ा है या नहीं, यह भी फैसले को पढ़े बिना नहीं कहा जा सकता है। चूँकि इस धारा के तहत पहली बार ऐसी सज़ा दी गई है, इसलिये कानून के जानकारों के पास पूर्व का कोई उदाहरण भी उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार इस सजा के बाद अब मुशर्रफ के भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। ख़बरों में कहा जा रहा है कि अदालत ने फैसला देकर अपना काम कर दिया है, अब पाकिस्तान सरकार पर सब कुछ निर्भर करता है कि वह मुशर्रफ को किसी तरह से यूएई से अपने देश में लाकर उन्हें सज़ा दिलाती है या नहीं ?

भारत के लिये ‘आतंकी’ से कम नहीं है मुशर्रफ

भारत के दृष्टिकोण से देखें, तो मुशर्रफ का सैन्य और अधिनायक के रूप में पूरा कार्यकाल भारत को पीड़ा देने वाला रहा है। भारत यात्रा पर आकर आगरा में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के साथ शिखर वार्ता करने वाले तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ के पाकिस्तान लौटते ही भारत को कारगिल युद्ध 1999 का सामना करना पड़ा था, तो 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए भीषण आतंकवादी हमले के समय भी पाकिस्तान की शासनधुरा मुशर्रफ के हाथों में थी। यह वही मुशर्रफ हैं, जिन्होंने अपने देश में भी अत्याचारों की पराकाष्ठा लांघी थी और 2005 में परेड नामक सामयिक ने मुशर्रफ को तत्कालीन टॉप 10 क्रूर तानाशाहों में से एक बताया था। इस्लामाबाद की विशेष अदालत ने परवेज़ मुशर्रफ को अपने देश यानी पाकिस्तान में किए गए गुनाहों की सजा के रूप में फाँसी पर चढ़ाने का आदेश दिया है, परंतु मुशर्रफ भारत के भी बहुत बड़े गुनाहगार हैं। उन्होंने सेना में शामिल होने के बाद से लेकर राष्ट्रपति के कार्यकाल तक हर समय भारत विरोधी सोच को हवा दी और भारत विरोधी गतिविधियों में प्रवृत्त रहे।

सैयद मुशर्रफुद्दीन और बेग़म ज़रीन मुशर्रफ के पुत्र परवेज़ मुशर्रफ सुन्नी मुसलमान हैं। पिता ब्रिटिश सरकार में सिविल सर्विस में नौकरी करते थे। मुशर्रफ अपने पिता की 3 संतानों में से दूसरी संतान हैं। उनके बड़े भाई डॉ. जावेद रोम स्थित इकोनॉमिस्ट हैं और अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष के निदेशक हैं। उनके छोटे भाई डॉ. नावेद मुशर्रफ अमेरिका में एनेस्थियोलॉजिस्ट हैं। जब 1947 में विभाजन हुआ, तब मुशर्रफ की आयु केवल 4 वर्ष थी। उनके परिवार ने पाकिस्तान का चयन किया। पिता पाकिस्तानी सिविल सर्विस में थे। उनकी नियुक्ति तुर्की में हुई, तो परिवार भी 1949 में तुर्की के अंकारा में सैटल हो गया। 1957 में परवेज़ मुशर्रफ पाकिस्तान लौट आए थे।

सेना में रखा कदम और भिड़ गये भारत से

1961 में मुशर्रफ ने 18 वर्ष की आयु में काकुल स्थित पाकिस्तानी सैन्य अकादमी में प्रवेश लिया। 1964 में मुशर्रफ ने ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्हें आर्टिलरी रेजिमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात किया गया। मुशर्रफ ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस युद्ध में भले ही पाकिस्तान को शिकस्त मिली थी, परंतु पाकिस्तानी सेना में मुशर्रफ की कार्यकुशलता की प्रशंसा हुई थी और उनका कद बढ़ गया था। उन्होंने 1966-72 के दौरान पाकिस्तानी सेना के स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) में सेवाएँ दीं। बाद में उन्हें आर्मी कैप्टन और मेजर के रूप में प्रमोशन मिला। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में मुशर्रफ एएसजी कमांडो बटालियन के कम्पनी कमांडर थे। 1974 में मुशर्रफ लेफ्टिनेंट कर्नल और 1978 में कर्नल बनाये गये थे। 1980 में स्टाफ ऑफिसर बनाये गये थे।

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