इस मॉनसून करें महाप्रण : ‘इनके’ प्रारब्ध से जोड़ लीजिए अपने कर्म : कमाइए ‘5 मन’ के पुण्य और धोइए 5 मिनट में ‘पाप’ !

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 1 जुलाई, 2019 (YUVAPRESS)। मॉनसून आ चुका है। केरल से लेकर मुंबई-महाराष्ट्र और दक्षिण गुजरात से लेकर मध्य गुजरात व सौराष्ट्र तक बादल बरस रहे हैं। यद्यपि अहमदाबाद महानगर के लोग उमस से त्राहि-त्राहि हैं और झमाझम बरसात की आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई लोग तो बारिश के इतने दीवाने होते हैं कि बदरा छाते ही उनका मन पीयूष की तरह पीहू-पीहू करते हुए डोलने लगता है। कोई बारिश में भीगना चाहता है, कोई गर्मागर्म पकौड़े, तो अहमदाबाद-गुजरात में गर्मागर्म दालबड़े-गांठिया जैसे नमकीन (फरसाण) पर लोग टूट पड़ते हैं।

मॉनसून की मूसलाधार बरसात चार महीनों की भीषण तपन और उसके बाद की त्राहि-त्राहि कर देने वाली उमस से लोगों को भारी सुकून देती है। जब आसमान से बारिश की छोटी-बड़ी बूंदें बरसना आरंभ करती हैं, तब आप तो हर्ष और आनंद से विभोर हो जाते हैं। वैसे बरसात इंसान ही नहीं, समूची जीव सृष्टि को आनंदित कर देती है। पशु-पक्षी और प्राणी भी बारिश के आते ही भीषण गर्मी से मुक्ति का आनंद लेते हैं। इन सबके बीच क्या आपके मयूर की तरह नाचने वाले मन में यह स्फुरण भी होता है कि हम तो वर्षा के पानी का कुछ देर आनंद लेने के बाद अपने घरों में दुबक जाते हैं, परंतु उनका क्या, जिनके सिर पर छत नहीं होती ?

जी हाँ। हम जीव सृष्टि में व्याप्त प्राण लेने वाले उन सभी प्राणियों की बात कर रहे हैं, जो मानव नहीं हैं, परंतु चेतनशील हैं। प्राण लेने वालों में शामिल उद्विज खानि के प्राणी यानी पेड़-पौधे सहित वनस्पति सृष्टि तो धूप-आंधी-तूफान-बारिश-बर्फबारी हर मौसम में अपनी जगह पर स्थिर रहने को विवश है, क्योंकि वह जड़वत् चेतन है। हम यहाँ बात कर रहे हैं हमारे ही आसपास रहने वाले उन प्राणियों की, जो पशु-पक्षी की श्रेणी में आते हैं। फिर वह गाय, भैंस, कुत्ते-बिल्ली हों या फिर कौए-कबूतर-तीतर-चिड़ी आदि हों।

वास्तव में तो परम कृपालु परमात्मा ने इस समग्र जीव सृष्टि की रचना प्रारब्ध के आधीन ही की है। प्रत्येक योनि का जीव अपने प्रारब्धानुसार जीवन यापन करता है और कर्मों के चक्र में घूमता हुआ मरता है, फिर जन्म लेता है। यद्यपि एकमात्र मनुष्य ऐसी योनि है, जिसमें विवेक होता है। वह भी जीता तो प्रारब्ध (भाग्य) के आधीन ही है, परंतु अपने हर कर्म के साथ मैं (अहम्कार) जोड़ कर वह परमात्मा के लिखे विधान का उल्लंघन भी करने का प्रयास कर जाता है।

ख़ैर हमें बात मनुष्य के प्रारब्ध और कर्मों की नहीं करनी है। हमें बात करनी है झमाझम बारिश के बीच भीगे हुए और ठंड से ठिठुरते उन मूक-निरीह पशुओं के बारे में, जो पूर्णत: प्रारब्ध और प्रकृति के आधीन जीवन जीते हैं। इसीलिए ये पशु-पक्षी मनुष्य की तरह कोई वॉटरप्रूफ मकान या घोंसला या आसियाना तो नहीं बना सकते। ऐसे में कई बार आपने देखा होगा कि मूसलाधार बारिश के बीच कोई कुत्ता, बिल्ली, कोई पक्षी हमारे घर के आँगन के किसी ऐसे कोने में आकर बैठ जाता है, जहाँ वह भीगने से बच सके। आपने अब तक क्या किया होगा, वह प्रश्न बड़ा नहीं है। वह तो बीत चुका। हम तो यह चाहते हैं कि इस मॉनसून आप ऐसे पशु-पक्षियों के प्रारब्ध के साथ अपने कर्मों को जोड़ें और उन्हें अपने घर के सूखे आँगन में कुछ देर के लिए आसरा दें। बरसात रुकते ही ये पशु-पक्षी स्वयं आपके यहाँ से चले जाएँगे। उनके कुछ देर ठहरने से आपके घर का सूखा आँगन जो गंदा हुआ होगा, उसे साफ करने में मुश्किल से 5 मिनट का समय लगेगा, परंतु विश्वास मानिए कि तब तक आप 5 मन पुण्य कमा चुके होंगे।

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