आतंकियों में मोदी का ‘आतंक’ : 5 साल में मारे गए 929, कश्मीर में कोई कमान संभालने तक को तैयार नहीं !

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 29 मई, 2019। 2014 में देश में मोदी शासन आने से पहले कश्मीर आतंक के साये में जीने को मजबूर था। पूरा जम्मू-कश्मीर आतंकियों का अड्डा बनकर रह गया था। आतंकी जब चाहे, जहाँ चाहे, वहाँ अपनी आतंकी योजनाओं को अंजाम देते थे और पाकिस्तान में बैठे आतंक के आकाओं के भी हौसले इतने बुलंद थे कि वह कश्मीर को भारत से छीनने तक के सपने देखने लगे थे, उनकी डींगें सुनकर पाकिस्तान भी मन ही मन मुस्करा रहा था, मगर पीएम मोदी ने 5 साल में पाँसा पूरी तरह पलट दिया। अब आतंकी खुद मोदी से खौफ खा रहे हैं और स्थिति यह हो गई है कि कश्मीर में आतंकी संगठनों को कमान सँभालने के लिये कमांडर नहीं मिल रहे हैं।

मई-2014 में मोदी शासन की शुरुआत हुई थी और मई-2019 में शासन के 5 साल पूरे हुए। इन पाँच वर्षों में जम्मू-कश्मीर में 929 आतंकियों का सफाया किया गया। 2014 में 110, 2015 में 108, 2016 में 150, 2017 में 213 और 2018 में 257 आतंकियों को ढेर किया गया। जबकि 2019 के अभी तक के 5 महीने में 91 आतंकियों को ढेर किया गया है। इनमें हिजबुल मुज़ाहिद्दीन, जैशे-मोहम्मद, लश्करे-तैयबा, अंसार गज़ावत-उल-हिंद के 13 टॉप कमांडर शामिल हैं। 14 फरवरी-2019 को हुए पुलवामा आतंकी हमले के बाद से अभी तक 41 आतंकियों को ढेर किया गया है, जिनमें 25 जैश के थे। जबकि इस साल मारे गये 91 आतंकियों में जैश के लगभग 27 विदेशी और लश्करे-तैयबा के 19 विदेशी आतंकियों का सफाया किया गया है।

दरअसल घाटी के हालात देखते हुए पीएम मोदी ने जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था की कमान सेना के हाथों में सौंपी और उसे काम करने की पूरी स्वतंत्रता दी, जिसके फल स्वरूप सेना ने स्थानीय पुलिस और अर्ध सैनिक बलों को साथ लेकर ऑपरेशन ऑल आउट की शुरुआत की। इसमें भारतीय इंटेलिजंस ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और ‘खोजो और मारो’ की नीति के तहत आतंकियों पर चौतरफा शिकंजा कसा गया। घुसपैठ रोकने के लिये लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) पर निगरानी कड़ी की गई। आबादी में छुपे आतंकियों का घेराव किया गया जिससे उन पर दबाव बना और वह जंगल में भागे तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया।

चौतरफा दबाव का परिणाम यह हुआ कि आतंकियों में ही फूट पड़ने लगी और नई भर्तियाँ भी नहीं हो सकी। हिजबुल के आतंकियों पर अन्य आतंकी पोस्टर छपवाकर आरोप लगाने लगे कि वह सेना के साथ मिल गये हैं। पीएम मोदी ने लाल किले की प्राचीर से ‘न गाली से न गोली से कश्मीर समस्या हल होगी गले लगाने से’ का नारा देकर कश्मीरियों में विश्वास जगाया, जिसके परिणाम स्वरूप आतंक की ओर बढ़ने वाले युवाओं के कदम पीछे हटे और कई युवाओं ने सरेंडर किया। पत्थरबाजों को मिल रही फंडिंग पर नकेल कसने के लिये अलगाववादियों पर शिकंजा कसा।

इतना ही नहीं 2016 में उरी अटैक के बाद एलओसी पार पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक की और 2019 में पुलवामा अटैक के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में की गई एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान में खुद को सुरक्षित समझ रहे आतंक के आकाओं में भी मोदी का खौफ समा गया और उन्हें अण्डर ग्राउण्ड हो जाना पड़ा है। पाकिस्तान को भी पीएम मोदी ने दुनिया से अलग-थलग कर दिया, जिससे उसकी भी बोलती बंद हो गई है। इन कदमों से कश्मीर के हालात में तेजी से सुधार हुआ है और अब पीएम मोदी कश्मीर को विकास की मुख्य धारा में लाने के लिये उसे विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 और अनुच्छेद 35ए को हटाने का विचार कर रहे हैं ताकि कश्मीर में भी देश के अन्य भागों की तरह विकास के लाभ पहुँचाए जा सकें।

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