जो ‘कालिया’ ख़तरनाक ‘रशियन रूले’ गेम में खूँखार डाकू ‘गब्बर’ के हाथों बच गया, उसे कौन मार सकता है ?

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* केवल 7 मिनट के रोल ने बदली विजू खोते की ज़िंदगी

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 30 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। सोमवार सुबह बॉलीवुड से एक दु:खद समाचार आया। 54 वर्षों तक 300 से अधिक फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता विजू खोते (विजू खोटे) का आज निधन हो गया। वे 77 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। वैसे विजू खोते नाम से कदाचित आज की पीढ़ी उन्हें न पहचान सकती हो, तो ‘कालिया’ के नाम से तो अवश्य ही जानती होगी।

1975 में आई फिल्म ‘शोले’ तत्कालीन समय में बॉलीवुड की सबसे सफलतम् फिल्म बनी थी, क्योंकि इस फिल्म में एक्शन, इमोशन, ड्रामा, श्रेष्ठतम् डायलॉग से लेकर वह सब कुछ था, जो दर्शकों को आज भी बांधे रखता है। फिल्म में एक से बढ़ कर एक कलाकार थे और हर कलाकार का रोल चाहे छोटा या बड़ा रहा हो, परंतु सबने अपने उस रोल में अमिट छाप छोड़ी। फिल्म में जहाँ अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र की ‘जय-वीरू’ की जोड़ी प्रसिद्ध हुई, वहीं हेमा मालिनी ‘बसंती’, संजीव कुमार ‘ठाकुर’, अमज़द खान ‘गब्बर’, उसके गिरोह के सदस्य मैकमोहन ‘सांभा’, जगदीप ‘सूरमा भोपाली’ और विजू खोते ‘कालिया’ के रूप में सदा-सदा के लिए अमर हो गए।

‘शोले’ फिल्म को 44 वर्ष हो चुके हैं और इन अमर किरदारों में ठाकुर, गब्बर और सांभा इस दुनिया से विदा ले चुके हैं और आज एक और अमर किरदार ‘कालिया’ यानी विजू खोते का भी निधन हो गया, परंतु शोले का वह कालिया तो हमेशा अमर रहेगा। फिल्म शोले में अमज़द खान यानी गब्बर ने इस कालिया को मार डाला था, परंतु विजू खोते ने अपने छोटे-से रोल में ऐसी जान भरी थी कि वे कालिया के रूप में लोगों के जेहन में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।

‘गब्बर’ के रशियन रूले से बच गया था ‘कालिया’

फिल्म ‘शोले’ में विजू खोते ने कुल मिला कर केवल 7 मिनट का रोल किया था, परंतु इन 7 मिनटों ने विजू की ज़िंदगी बदल डाली और उन्हें ‘कालिया’ के रूप में सदा के लिए अमर कर दिया। फिल्म ‘शोले’ के एक दृश्य में जब ‘कालिया’ यानी विजू खोते और उनके तीन साथी जब ‘ठाकुर’ के गाँव रामपुर से बिना दाना-पानी लिए ख़ाली हाथ लौटते हैं, तब ‘गब्बर’ गुस्से से लाल-पीला हो जाता है। उस समय गब्बर ख़ाली हाथ लौटे अपने गिरोह के तीनों साथियों को एक पंक्ति में खड़ा करता है और उनके साथ जो बंदूक की गोलियों का जो खेल खेलता है, वह वास्तव में Russian roulette यानी रशियन रूले गेम का हिस्सा है। इस गेम के अंतर्गत ‘गब्बर’ अपनी बंदूक के 6 गोलियों वाले चैम्बर में 3 गोलियाँ भरता है और चैम्बर को घुमा देता है। अब न ‘गब्बर’ को और न ही बंदूक की नोक पर खड़े ‘कालिया’ सहित तीन साथियों को पता होता है कि बंदूक के चैम्बर के कौन-से तीन खाने खाली हैं और किन तीन खानों में गोलियाँ हैं ? ‘गब्बर’ चैम्बर घुमाने के बाद तीनों साथियों की कनपटी पर बंदूक रखता है और ट्रिगर दबाता है। पहला आदमी बच जाता है, दूसरा आदमी भी बच जाता है। फिर बारी आती है ‘कालिया’ की। ‘गब्बर’ कालिया के निकट आता है और उसकी कनपटी पर बंदूक रख कर डायलॉग बोलता है, ‘तेरा क्या होगा कालिया ?’ ‘कालिया’ कहता है, ‘सरदार, मैंने आपका नमक खाया है।’ ‘गब्बर’ कहता है, ‘तो अब गोली भी खा।’ इतना कह कर ‘गब्बर’ ट्रिगर दबाता है, पर गोली नहीं चलती। इस तरह ख़तरनाक रशियन रूले गेम में ‘गब्बर’ की गोली से ‘कालिया’ बच जाता है। यद्यपि फिल्म की कहानी के अनुसार ‘गब्बर’ उसके बाद ‘कालिया’ सहित तीनों को मार डालता है, परंतु फिल्म में अपनी मौत से पहले ‘कालिया’ अपने किरदार से अमर हो चुका था।

कौन थे विजू खोते ?

17 दिसम्बर, 1945 को जन्मे विजू खोते ने हिन्दी और मराठी फिल्मों में काम किया। उन्होंने मराठी फिल्म ‘या मालक’ (1964) से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और कई खलनायक व हास्य कलाकार के रूप में कई रोल किए। विजू ने 1975 में आई ‘शोले’ फिल्म से अपनी अमिट छाप छोड़ी, परंतु इसके अलावा उन्होंने कुर्बानी, कर्ज़, नगीना, क़यामत से क़यामत तक जैसी हिट फिल्मों में काम किया। उनकी अंतिम फिल्म ‘जानें क्यों दे यारों’ (2018) रही, परंतु इससे पहले 1994 में आई ‘अंदाज़ अपना अपना’ में भी उन्होंने रॉबर्ट के किरदार में यादगार भूमिका निभाई। विजू खोते अपने ज़माने की मशहूर अभिनेत्री शुभा खोते के बड़े भाई थे और उनसे 5 साल बड़े थे। विजू के पिता नंदू खोते भी मशहू स्टेज एक्टर तथा मूक फिल्मों के कलाकार थे। विजू की भाभी दुर्गा खोते भी बॉलीवुड अभिनेत्री व चरित्र अभिनेत्री थीं।

आप भी देखिए ‘शोले’ में ‘गब्बर’ द्वारा मारे जा रहे अमर ‘कालिया’ को :

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