दादी इंदिरा की ‘नाक’ की सीध में चल रहीं पोती प्रियंका के आँसू लाएँगे ‘आशा’ की आंधी ?

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विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 20 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस के ‘त्यागपत्री’ अध्यक्ष राहुल गांधी जहाँ विदेश दौरे पर निकल चुके हैं, वहीं लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद डिमोशन की बजाए प्रमोशन पाने वालीं प्रियंका गांधी वाड्रा पिछले दो दिनों से पूर्वी उत्तर प्रदेश की बजाए पूरे उत्तर प्रदेश में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मचाए हुए हैं।

लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस की दुर्गति के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद त्याग दिया है। हालाँकि उनके इस तथाकथित ‘त्याग’ में दूसरों से त्याग की आस छिपी हुई थी। राहुल के त्यागपत्र के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने हार का उत्तरदायित्व लेते हुए त्यागपत्रों की बाढ़ लगा दी। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले कांग्रेस में और राजनीति में प्रवेश करने वालीं प्रियंका गांधी वाड्रा को राहुल ने सबसे पहले तो एंट्री के साथ ही पार्टी महासचिव बना दिया और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंप दी। कांग्रेस के अन्य नेताओं से नाराज़गी जताने वाले राहुल गांधी ने एक तरफ प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाने की बात कही, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी होने के बावजूद बुरी तरह परास्त होने के बावजूद प्रियंका का प्रमोशन हो गया। अब प्रियंका पूरे उत्तर प्रदेश की प्रभारी हो गई हैं।

चलिए यहाँ तक तो ठीक था। यह कांग्रेस पार्टी का आंतरिक मामला था। बात तब समझ से परे हो गई, जब उत्तर प्रदेश में हुए सोनभद्र नरसंहार पर राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टियों समाजवादी पार्टी (सपा-SP) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा-BSP) से कहीं अधिक तीव्र प्रतिक्रिया कांग्रेस और प्रियंका की ओर से आई। सोनभद्र में ज़मीन विवाद में जो नरसंहार हुआ, वह किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता, परंतु प्रियंका ने इस नरसंहार पर बड़ा राजनीतिक ड्रामा क्रिएट कर दिया।

दिल्ली की गद्दी की रेस समाप्त हो जाने के बाद अब सभी राजनीतिक दलों ने अलग-अलग राज्यों पर नज़रें गड़ाना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में प्रियंका गांधी वाड्रा, जो उत्तर प्रदेश कांग्रेस महासचिव हैं, को सोनभद्र नरसंहार के रूप में अच्छा-खासा हथियार मिल गया। वैसे भी लोकसभा चुनावों के दौरान ही कांग्रेस ने अपनी यह नीयत साफ कर दी थी कि उत्तर प्रदेश में उसकी नज़र लोकसभा की 80 सीटों पर नहीं, अपितु विधानसभा की 432 सीटों पर यानी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 पर है। सो सोनभद्र नरसंहार के बहाने प्रियंका ने लगे हाथ मिशन उत्तर प्रदेश आरंभ कर दिया।

देश के बड़े-बड़े इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट-वेब मीडिया सभी ने प्रियंका गांधी को लगातार अड़तालीस घण्टों तक कवरेज दिया। गत बुधवार को सोनभद्र में ज़मीन विवाद में मारे गए आदिवासियों के परिजनों से मिलने के लिए प्रियंका शुक्रवार को वाराणसी पहुँचीं। वाराणसी से मिर्जापुर पहुँचते ही प्रशासन ने धारा 144 की बात करते हुए प्रियंका को सोनभद्र जाने से रोक दिया। इस पर प्रियंका अड़ गईं और मिर्जापुर के चुनार गेस्ट हाउस में यह कह कर डट गईं कि वे पीड़ितों से मिले बिना नहीं लौटंगी। इसके बाद पूरी कांग्रेस का फोकस उत्तर प्रदेश पर बन गया। राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार और भाजपा को घेरते हुए प्रियंका ने पूरी रात चुनार गेस्ट हाउस में बिताई। मीडिया में प्रियंका का बिना एसी वाले गेस्ट हाउस में रात्रि विश्राम करना भी ख़बर बन गया। आज आखिर प्रियंका सोनभद्र हिंसा के पीड़ित परिवारों से मिलीं और भावुक हो गईं। प्रियंका की आँखों से आँसू बह निकले।

प्रियंका ने तो सोनभद्र में आँसुओं का सैलाब ला दिया, परंतु लाख टके का प्रश्न यह उठ रहा है कि राजनीतिक विरोधी इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं और यह राजनीति में ग़लत भी नहीं है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि प्रियंका अपनी दादी इंदिरा गांधी के नाक-नक्श-ए-कदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश फतह करने का प्लान लेकर चल रही हैं। सोनभद्र को लेकर प्रियंका ने जिस रणनीति के साथ पूरा राजनीतिक खेल खेला और पीड़ितों के आँसुओं के साथ आँसू बहाए, उससे प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रियंका के ये आँसू उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए आशा की कोई आंधी लाने का काम करेंगे ?

प्रियंका की सोनभद्र नरसंहार पर रणनीतिक राजनीति पूरी तरह उनकी दादी इंदिरा गांधी से मेल खाती है। प्रियंका को लेकर वैसे भी कहा जाता है कि उनका चेहरा दादी इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता है, तो रणनीति में भी प्रियंका दादी की राह पर ही चल रही हों, ऐसा लगता है। प्रियंका ने सोनभद्र नरसंहार पर जो रणनीतिक आक्रामकता दिखाई, कुछ ऐसा ही 1977 में इंदिरा गांधी ने किया था। उस समय भी कांग्रेस पार्टी केन्द्र की सत्ता से बाहर थी और बिहार के बेलची गाँव में 11 दलितों की हत्या हुई थी। जब यह नरसंहार हुआ था, तब बिहार में बाढ़ के भी हालात थी। इसके बावजूद तमाम मुश्किलों की परवाह किए बिना इंदिरा गांधी हाथी पर सवार होकर बेलची नरसंहार के पीड़ितों से मिलने पहुँची थीं, क्योंकि बाढ़ और कीचड़ के कारण बेलची में न गाड़ी जा सकती थी और न ही पैदल चल सकने वाले हालात थे।

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