चीन और पाकिस्तान की कुटिलता से निपटेगा भारत का ‘कौटिल्य’ : शत्रुओं सावधान ! अब सर्जिकल-एयर स्ट्राइक नहीं, सीधी स्पेस स्ट्राइक होगी

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भारत ने अंतरिक्ष जगत में सोमवार को एक और इतिहास रच दिया। उरी आतंकी हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा आतंकी हमले के बाद हुई एयर स्ट्राइक को भूल जाइए। अब दुश्मन ने आँख उठा कर देखने की कोशिश की, तो भारत अब स्पेस स्ट्राइक करने का भी साहस कर सकता है।

वास्तव में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने सोमवार को श्रीहरिकोटा से 9.27 बजे भारतीय रॉकेट सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल (PSLV) C-45 के जरिए इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस के जरिए एक साथ 29 उपग्रहों को सफलतापूर्वक उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया। इनमें सबसे विशेष है EMISAT, जो एक इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सैटेलाइट है। यह एमिसैट अंतरिक्ष में भारत के आँख और कान की तरह काम करेगा। एमिसैट 9.44 बजे उसकी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया।

क्या है एमिसैट ?

एमिसैट को प्रक्षेपण रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिए किया गया है, जो अंतरिक्ष में भारत के दुश्मनों पर गिद्ध दृष्टि रखेगा। इसे इसरो और डीआरडीओ ने मिल कर बनाया है। इसका विशेष उद्देश्य पाकिस्तान से सटी भारतीय सीमा पर इलेक्ट्रॉनिक या किसी भी तरह की मानवीय गतिविधियों पर नज़र रखना है। एमिसैट सीमा रर रडार तथा सेंसर पर निगाह रखेगा, जिससे न केवल मानवीय, बल्कि संचार से जुड़ी किसी भी तरह के शत्रु षड्यंत्र का तुरंत पता चल जाएगा।

एमिसैट का क्या है चाणक्य ‘कौटिल्य’ से संबंध ?

ईसा पूर्व 375 से 283 के दौरान शासन करने वाले और अफग़ानिस्तान से लेकर असम तक फैले भारत वर्ष पर पैनी नजर रखने वाले मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री एवं सलाहकार तथा तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य चाणक्य का मानना था कि देश में सफलतापूर्वक शासन करने के लिए गुप्तचरों का प्रभावी नेटवर्क होना अत्यंत आवश्यक है। चाणक्य को कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता था। उनका कहना था कि गुप्तचर (जासूस) किसी भी राजा के आँख और कान होता है।

महान कूटनीतिज्ञ चाणक्य अर्था कौटिल्य के इसी विचार से प्रेरित होकर डीआरडीओ ने प्रोजेक्ट कौटिल्य शुरू किया और 8 वर्षों के परिश्रम के बाद एमिसैट उपग्रह तैयार हुआ, जिसका वज़न 436 किलोग्राम है। डीआरडीओ की हैदराबाद प्रयोगशाला में प्रोजेक्ट कौटिल्य के तहत एमिसैट बनाया गया है।

सैकड़ों किलोमीटर दूर से नज़र रखेगा एमिसैट

एमिसैट का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि सरकार ने इसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी साझा नहीं की है। विशेषज्ञों के अनुसार एमिसैट इज़राइल के प्रसिद्ध गुप्तचर उपग्रह ‘सरल’ पर आधारित है। एमिसैट और सरल दोनों ही सैटेलाइट एसएसबी-2 प्रोटोकॉल फॉलो करते हैं। यह प्रोटोकॉल नापाक पाकिस्तान और चालाक चीन जैसे शत्रुओं से घिरे भारत में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी क्षमता के लिए अत्यंत आवश्यक है। एमिसैट में रडार की ऊँचाई मापने के लिए ALTIKA डिवाइस लगा हुआ है, जिसे प्रोजेक्ट कौटिल्य के तहत विकसित किया गया है। एमिसैट धरती से सैकड़ों किलोमीटर की ऊँचाई पर रहते हुए भी धरती पर संचार प्रणालियों, रडार तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाले सिग्नल को पकड़ सकता है। यह धरती पर स्थित बर्फीली घाटियों-पहाड़ियों, वर्षा, तटवर्ती क्षेत्रों, जल एवं समुद्र की लहरों को बहुत आसानी से नापने में सक्षम है। युद्ध काल में शत्रु देश के रडार को ढूँढ कर नष्ट करना महत्वपूर्ण होता है, जिससे उस पर हवाई आक्रमण करते समय एयर डिफेंस सिस्टम उसके विमानों को निशाना बना सकें। एमिसैट यह काम बहुत ही कौशल्यपूर्वक कर सकता है। ऐसे में चीन और पाकिस्तान की कुटिल नीतियों से निपटेगी भारत की यह कौटिल्य नीति।

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