आखिर देश हित में लिए किये गये बलाव के विरोध में क्यों हैं लोग, जाने और समझें

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SC/ST Act - Supreme Court, Bharat Bandh, madhya pradesh

नई दिल्ली: SC/ST एक्ट में बदलाव को लेकर लोगों के प्रदर्शन और विरोध को पूरी तरह से समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि यह बदलाव है क्या। आखिर सुप्रीम कोर्ट को क्यों बदना पड़ा SC/ST Act । इस एक्ट को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 कहते हैं। कोई तो कारण और कोई तो वजह रही होगी जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट को ये फैसला लेना पड़ा।

दूसरी और तो हमारे राजनीतिक दल को सिर्फ अपने वोटबैंक की पड़ी है चाहे इस देश का कितना ही नुकसान क्यों न हो जाये, कभी कभी तो ये देखने को मिलता है कि कई राजनीतिक दल अपने वोटबैंक को बनाने के लिए किसी भी बवाल में आग में घी डालने का काम करती है ताकि वो वोटबैंक को कमा सके। जो कि गलत है। हमें खुद विचार करना होगा कि क्या कोई ऐसा कानून जिससे किसी भी एक व्यक्ति को बिना वजह के सजा मिल जाये, ऐसा कानून रहना चाहिए।

कानून तो सबके लिए बराबर होना चाहिए तो फिर बिन किसी वाद विवाद को समझे हमें उस विवाद में कुदना चाहिए या नहीं। आप खुद सोचिए कि हमें पहले पूरी जानकारी को सझना चाहिए या नहीं। चले इसके तह तक पहुंचते हैं की कोशिश करते हैं।

आखिर 1989 का SC/ST Act है क्या

SC/ST Actअनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 को 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पास किया गया था, जिसे 30 जनवरी 1990 से पूरे भारत में शुरू किया गया। यह SC/ST Act उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू हो जाता हैं जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं होता हैं तथा कोई व्यक्ति जो इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं। इस एक्ट के तहत 5 अध्याय एवं 23 धाराएँ शामिल हैं।

SC/ST Act के तहत अपराध दण्डित इस प्रकार हैं –

आर्थिक बहिष्कार – अगर कोई व्यक्ति किसी भी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति से व्यापार करने से इनकार कर देता है तो इसे आपराधिक दण्ड माना जायेगा और इसमें सजा का प्रावधान है।

सामाजिक बहिष्कार – यदि कोई व्यक्ति किसी भी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के साथ संपर्क में आने से मना करता है या उसे किसी अन्य समूहों से अलग रखने की कोशिश करता है तो आपराधिक दण्ड माना जायेगा।

SC/ST Act भारत बंदअनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुध्द कियें जाने वाले कुछ अपराध – किसी को जुते की माला पहनाना, वन अधिकारों से वंचित रखना, सिंचाई के सुविधा लेने से रोकना, कब्र खोदने के लिए बाध्य करना, मानव या पशु कंकाल को निपटाने और लाने तथा ले जाने के लिए बाध्य करना, सिर पर मैला ढोने की प्रथा का उपयोग और अनुमति देना, महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित करना, जादू-टोना अत्याचार को बढ़ावा देना, जातिसूचक गाली देना, चुनाव लड़ने से मना करना, महिलाओं के वस्त्र हरना करना, किसी व्यक्ति को घर से बाहर निकालना, आवास छोड़कर जाने के लिए बाध्य करना, धार्मिक भावनाऔं को ठेस पहुंचाना, यौन दुर्व्यवहार करना, छूवा-छूत और दुर्व्यवहार भाषा का उपयोग करना आदि।

SC/ST एक्ट के तहत सजा का प्रावधान

1989 के SC/ST Act इसमें दोषी व्यक्ति को 6 महीने से 5 साल तक की सजा का प्रावधान हैं। क्रूरतापूर्ण अत्याचार के लिए मृत्युदंड का सजा दिया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति यदि किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के खिलाफ झूठी गवाही देता है या गढ़ता है तो उसे इस अपराध में मृत्युदंड या आजीवन कारावा तथा जुर्मानें सहित कारवाही हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति किसी किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के घर या मकान को किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा नष्ट करता है तो उसे आजीवन कारावास या मृत्युदंड दिया जा सकता है। इस अधिनियम के अनुसार यदि कोई सकारी व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जानजाति का व्यक्ति नहीं है वो अगर जानबूझ कर इस अधिनियम को पालन करने में लापरवाही करता है या वह दंड का भागी होता है तो 6 से 1 साल तक की सजा हो सकती है। SC/ST Act के अन्य अधिनियम के तहत साजा का प्रावधान जैसे – SC/ST एक्ट धारा 14, 21, 5, 6, 7, 11, 12 आदि। इस एक्ट के तहत दोषी को तुरंत गिरफ्तारी की जायेगी और उसके बाद कारवाही।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST एक्ट में बदलाव

SC/ST Act का देश में काफी दुरुपयोग होने लगा था इसलिए सुप्रीम कोर्ट इस एक्ट में बदलाव किया जो इस प्रकार है। यदि इस एक्ट के तहत किसी को दोषी ठहराया जाता है तो एफआईआर दर्ज होने के बाद तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जायेगी। सबसे पहले डीएसपी स्तर के अधिकारी द्वारा इसकी जांच की जायेगी। यदि आरोप सही है तो उस पर कारवई की जायेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बदलाव को जारी करते समय यह कहा कि जब यह कानून बन रहा होगा तो उस समय यह विचार नहीं किया गया होगा कि इसका दुरुपयोग भी हो सकता है। अभी तक हमारे देश में ऐसे कई मामले आ चुके हैं जिसमें इसका दुरुपयोग हुआ है और एक निर्दोष व्यक्ति को सजा भुगतनी पड़ी, जो की गलत है।

यदि कोई सरकारी व्यक्ति भी इस अधिनियम का दुरुपयोग करता हुआ पाया गया तो उसके गिरफ्तारी के पीछे उसके विभाग का अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यदि कोई भी व्यक्ति इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय करवाई और कोर्ट के अवमानना का सामना करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST एक्ट में बदलाव क्यों सहीं है?

हमारे देश में बहुत से ऐसे मामले सामने आ चुके थें जिसमें इस SC/ST Act के कारण निर्दोष व्यक्ति को सजा मिली और बाद में पता चला कि जो आरोप व्यक्ति पर लगाया गया था वह तो उसने किया ही नहीं तो ऐसे में उसे सजा क्यों मिली, उसे क्यों अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका नहीं दिया गाया।

साल 2016 में एनसीआरबी की रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 मामलों सामने आई थी और इनमें से 935 मामले झूठी पाई गईं। जब इतने मामले झूठे पाये जा रहे हैं तो क्या इसमें बदलाव करना उचित नहीं था इसका फैसल मैं आप पर छोड़ता हूं।

हम भी मानते हैं कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को सजा मिलनी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि वह भी एक भारत का नागरिक है जिस प्रकार से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति भारत का नागरिक है। हमें अपने आप से खुद सवाल करना चाहिए कि जो निर्दोष व्यक्ति को सजा मिली भले ही चाहे वह अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का न हो, क्या वह किसी भी मायने में सही है? मेरे ख्याल से नहीं क्योंकि हमारा कानून भी किसी निर्दोष को सजा देने से मना करता है। निर्दोष व्यक्ति को सजा दिलाना तो उसी अपराध में आया ना जिस अपराध में दोषी व्यक्ति सजा मिली।

मान लो की निर्दोष व्यक्ति कोई अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति होता तो क्या उसे सजा मिलनी चाहिए थी, मेरे भाई जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति है मैं उसका तहे दिल से सम्मान करता हूं वह भी भारत का नागरिक है और जिस प्रकार से एक आम नागरिक। तो फिर हमें सही और गलत का फर्क समझना होगा और जो कानून गलत है उसे अगर कोई हटाता है तो वह सही है। सबको पता है कि सही आखिर सही होता है और गलत गलत।

SC/ST एक्ट में बदलाव का ताजा मामला

भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST एक्ट में किये गये बदलाव के कारण देशभर में दलित संगठनों ने बंद का ऐलान किया। इसके बाद केंद्र सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को महाराष्ट्र के एक केस को लेकर SC/ST Act में बदलावकर एक नई गाइडलाइन जारी की थी। जिसका जिक्र हमने ऊपर कर चुके है।

SC/ST एक्ट में बदलाव का ताजा मामला

देश में SC/ST एक्ट के विरोध में हिंसक हुआ प्रदर्शन क्या यह सही था?

प्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST Act में बदलाव के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों ने आज देशभर में भारत बंद का ऐलान किया था और पूरे देश में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। यहा तक की कई जगपर पर ट्रेन रोकने की भी घटना सामने आ चुकी है। कई जगह पर हिंसक झड़प भी देखने को मिल रही है। अभी अभी मुरैना में एक व्यक्ति की मौत हो गई। हिंसा तेज होने के बाद पुलिस ने यहां पर कर्फ्यू लग दी है। देश में कई जगहों से हिंसक प्रदर्शन की खबर मिल रही है।

उधर राजस्थान में दलित संगठनों और करणी सेना के बीच हिंसक झड़प की खबरे आई है। वहां पर लगभग 25 लोग जख्मी हो चुके हैं। मध्यप्रदेश में भीम सेना और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई। वहा पर कई दुकानों को आग लगा दी गई। गोलाबारी की भी खबरे मिली है। रेलवे ट्रेक को जाम कर दिया गया। हिंसा को देखते हुए ग्वालियर के 3 जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया है। पंजाब में भी यही हाल है। बिहार में भी कई संगठनों ने बंद का समर्थन किया है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में भी SC/ST Act में बदलाव को लेकर काभी प्रदर्शन हुआ। ओडिशा से भी ट्रेन को रोकने की घटना सामने आ रही हैं। रांची में भी पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई।

अपनी बात को कहने का क्या कोई दूसरा तरीका नहीं है क्या?

SC/ST Act में हुए बदलाव के कारण हो रहें प्रदर्शन और विरोध की वजह से देश के सरकारी संपत्तियों का काफी नुकसान हो रहा है जो कि सही नहीं है ये संपत्तियां भी हमारे द्वारा टेक्स के दिये गये कुछ रूपये की होंगी तो फिर हम अपनी संपत्तियों को क्यों नुकसान पहुंचा रहे हैं। दोस्तों हमें सोचना होगा कि क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं है अपनी बात को कहने की। हमे अपनी बात को शांति पूर्व रखना चाहिए न कि हिंसक रूप अपनाकर।

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