विद्रोह और मर्यादा की सीमा लांघता ‘मोदी विरोध’ : क्या जनता को ऐसे ‘निरंकुश’ नेताओं को क्षमा करना चाहिए ?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्राय: यह कहते हैं, ‘मुझे जितनी गालियाँ देनी है, दो, परंतु देश का हित सर्वोपरि होना चाहिए।’ इस समय लोकसभा चुनाव 2019 का प्रचार अभियान चल रहा है और ऐसे में कुछ नेताओं की जीभ फिसल रही है और कोई विद्रोह, तो कोई मर्यादा की सीमा लांघ रहा है। इन नेताओं के वक्तव्यों से अब यह जनता को ही तय करना होगा कि क्या वे ऐसे निरंकुश नेताओं को क्षमा करेंगे।

मोदी विरोधी नेताओं की वैसे देश में कोई कमी नहीं है। यह सूची 2001 से तैयार होना आरंभ हुई थी और आज 18 वर्षों में इस सूची में हजारों नाम जुड़ चुके हैं और जुड़ते जा रहे हैं, परंतु हम इस समय जिन दो नेताओं की बात कर रहे हैं, वे दोनों जिम्मेदार नेता हैं और उनसे इस तरह के निरंकुश वक्तव्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। फिर भी उन्होंने ऐसे वक्तव्य दिए। ये दो नेता हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के संस्थापक फारुक अब्दुल्ला। पहले बात फारुक की ही कर लेते हैं।

फारुक को उनकी रक्षा करने वाली सेना पर नहीं है विश्वास

पाकिस्तान के भेजे गए आतंकवादियों के साये में रहने वाले कश्मीरियों की दिन-रात रक्षा-सुरक्षा में जुटे भारतीय सेना के तीनों अंगों को सलाम करने की बजाए फारुक अब्दुल्ला ने आज F-16 पर जो बयान दिया, उससे लगता है कि फारुक को अमेरिकी मैगज़ीन फॉरेन पॉलिसी (FP) पर अधिक भरोसा है और भारतीय वायुसेना (IAF) पर नहीं है। एफपी ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत के इस दावे को ग़लत ठहराया था कि एयर स्ट्राइक के बाद हुए पाकिस्तानी हमले के जवाब में भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एफ-16 विमान को मार गिराया था। इसके जवाब में आईएएफ कह चुकी है कि एफपी के दावा गलत है, क्योंकि हमारे पास एफ-16 विमान को मार गिराने के प्रमाण हैं, परंतु फारुक अब्दुल्ला को भारत की वायुसना पर नहीं, अपितु अमेरिक मैगज़ीन पर अधिक भरोसा है और उन्होंने आज इसे लेकर मोदी पर हमला करते हुए कहा कि मोदी ने झूठ बोला। उन्होंने मोदी को हिटलर तक की संज्ञा दे डाली।

ऐसी भाषा बोल कर प्रधानमंत्री बनेंगे राहुल ?

अब बात करते हैं राहुल गांधी की। राहुल गांधी देश का अगला प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए हुए हैं, परंतु दो दिनों से उनकी जिह्वा उनके नियंत्रण से बाहर हो गई है। मोदी विरोध की तपिश में राहुल ने मर्यादाओं की सभी सीमाएँ लांघ दी हैं। राहुल ने शुक्रवार को एक रैली में कहा था, ‘यह विचारधारा की लड़ाई है। जहाँ भी जाते हैं पीएम (नरेन्द्र मोदी), वहाँ किसी न किसी की बुराई करते हैं। मोदीजी के गुरु कौन हैं ? आडवाणीजी। शिष्य गुरु के सामने हाथ भी नहीं जोड़ता। स्टेज से उठा कर फेंक दिया आडवाणीजी को। जूता मारके आडवाणीजी को उतारा स्टेज से और हिन्दू धर्म की बात करते हैं। हिन्दू धर्म में कहाँ लिखा है कि गुरु का अपमान करना चाहिए।’ राहुल ने यही अमर्यादापूर्ण भाषा शनिवार को भी एक सभा में दोहराई।

राहुल कहाँ से लाए यह बात ?

राजनीतिक विश्लेषकों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि राहुल गांधी मोदी और आडवाणी को लेकर यह यह बात किस आधार पर कह रहे हैं। यह सही है कि मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाते ही सबसे पहले आडवाणी ही नाराज़ हुए थे। इसके बाद न तो आडवाणी को कोई भी पद नहीं दिया गया। इतना ही नहीं, इस बार तो उनका चुनावी टिकट भी काट दिया गया। इसके बावजूद आडवाणी ने कभी पार्टी की मर्यादा नहीं तोड़ी और आज तक वे भाजपा में ही हैं। आडवाणी ने विद्रोह तो नहीं किया। ये भाजपा का आंतरिक मामला है। इस पर राहुल को इतना गहराई में जाने की क्या आवश्यकता थी। क्या मोदी विरोध के नाम पर मर्यादा की हर सीमा लांघने के लिए स्वयं स्वतंत्र समझते हैं राहुल ?

क्या राहुल ने नहीं किया था मनमोहन का अपमान ?

भाजपा पर आरोप लगाते समय राहुल गांधी कदाचित वह दिन भूल गए, जब उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष होते हुए भी एक प्रधानमंत्री के बिल को फाड़ दिया था। क्या राहुल ने तब अपने वरिष्ठ नेता डॉ. मनमोहन सिंह का सरेआम अपमान नहीं किया था। इतना ही नहीं, पूरा देश जानता है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी को मनमोहन सिंह को केवल नाम के लिए पीएम बनाया था। सारी सरकार तो सोनिया-राहुल ही चला रहे थे। क्या यह मनमोहन जैसे वरिष्ठ अर्थशास्त्री और राजनेता का अपमान नहीं था ?

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