पढ़िए ‘तथाकथित’ नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी के ‘मोदी विरोधी’ चरित्र का कच्चा चिट्ठा

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विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 16 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। पिछले 4 महीने 23 दिनों यानी 23 मई, 2019 को भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी में बुरी तरह पिटने वाली कांग्रेस के लिए 14 अक्टूबर, 2019 का दिन मानो कोई संजीवनी बूटी लेकर आया, जब भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक अभिजीत बनर्जी को ‘तथाकथित’ नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई। यहाँ तथाकथित क्यों लिखा है, उसका रहस्योद्घाटन आगे करेंगे, परंतु स्वीडन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में दिए जाने वाले नोबेल पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं में अभिजीत का नाम आते ही कांग्रेस में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और यह लहर क्यों दौड़ी, उसका रहस्योद्घाटन अगले 24 घण्टों में ही हो गया, जब अभिजीत ने फरवरी-2016 से जारी अपनी ‘मोदी विरोध’ की नीति को नोबेल पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की सूची में नाम आते ही आगे बढ़ाया। अभिजीत ने अपने नाम के साथ नोबेल जुड़ते ही अपने पहले मीडिया इंटरव्यू में जो बातें कहीं, उसका सीधा संकेत यही था कि अभिजीत ‘मोदी विरोध’ यानी कांग्रेस समर्थक की मानसिकता से अब तक उबर नहीं पाए हैं, जबकि नरेन्द्र मोदी को देश की जनता ने एक बार नहीं, अपितु दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में चुना है।

पहले बात कर लेते हैं ’तथाकथित’ शब्द प्रयोग की। अभिजीत के लिए तथाकथित नोबेल पुरस्कार विजेता शब्द प्रयोग इसलिए करना पड़ा, क्योंकि वास्तव में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला ही नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभिजीत बनर्जी को अच्छी तरह जानते हैं, क्योंकि अभिजीत ने कभी भी मोदी सरकार के किसी कार्य की प्रशंसा नहीं की। अभिजीत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में ‘अफज़ल हम शर्मिंदा हैं-तेरे क़ातिल जिंदा हैं’ और ’भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’ जैसे राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले ‘टुकड़े-टुकड़े’ गिरोह के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह के तहत मुक़दमा दर्ज करने से लेकर नोटबंदी तक मोदी सरकार की जम कर आलोचना कर चुके हैं। ऐसे में नोबेल के साथ नाम जुड़ते ही अभिजीत को मानो पंख लग गए, परंतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ही TWEET में अपने विरोधियों और पूरे विश्व का यह भ्रम तोड़ दिया कि अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार मिला है।

अभिजीत बनर्जी को नहीं मिला ‘नोबेल’ ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने धुर-विरोधी होने के बावजूद अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार समिति की ओर से ग़रीबी उन्मूलन में उल्लेखनीय योगदान करने के लिए पुरस्कृत किए जाने की घोषणा होते ही बधाई दी। स्वाभाविक है कि अभिजीत भारतीय मूल के हैं और इस बात के लिए हर भारतीय को गौरव की अनुभूति होनी ही चाहिए। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्वीट कर अभिजीत को बधाई दी, परंतु मोदी के इस ट्वीट से यह भी सुस्पष्ट हो गया कि अभिजीत को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है।

मोदी ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘‘अभिजीत बनर्जी को अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान में 2019 का ‘सिवर्जेस रिक्सबैंक पुरस्कार’ से सम्मानित किए जाने पर बधाई। उन्होंने गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।’’ इस ट्वीट में स्पष्ट उल्लेख है कि अभिजीत बनर्जी को सिवर्जेस रिक्सबैंक पुरस्कार मिला है, न कि नोबेल पुरस्कार और यही अकाट्य सत्य भी है। मोदी ने इस ट्वीट के जरिए अभिजीत का कांग्रेसी प्रोपेगैंडा ध्वस्त कर दिया और अभिजीत को इस वास्तविकता की अनुभूति करा दी कि उन्हें ‘सिवर्जेस रिक्सबैंक पुरस्कार’ मिला है, जिसे हम अर्थशास्त्र के नोबेल के नाम से जानते हैं। यह अल्फ्रेड नोबेल स्मारक पुरस्कार है, मूल नोबेल पुरस्कार नहीं। पीएम मोदी ने नोबेल पुरस्कार की अन्य श्रेणियों और नोबेल अर्थशास्त्र पुरस्कार के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से सामने रखा है।

उद्देश्य ग़रीबी उन्मूलन है, तो निशाने पर व्यक्ति क्यों ?

यह अच्छी बात है कि अभिजीत बनर्जी का उद्देश्य भारत सहित पूरी दुनिया से ग़रीबी को ख़त्म करना है, परंतु प्रश्न यह उठता है कि यदि उद्देश्य उच्च है, तो अभिजीत एक पार्टी विशेष का राजनीतिक प्रोपेगैंडा चलाने वाला निम्न कार्य क्यों कर रहे हैं ? यह मान भी लिया जाए कि देश की अर्थ व्यवस्था बुरे दौर से गुज़र रही है, तो भी इसके लिए अभिजीत बनर्जी सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या उनकी पूरी सरकार पर निशाना साध कर उस कांग्रेस की सहायता क्यों कर रहे हैं, जिसे जनता ने 4 महीने 23 दिनों पहले ही बुरी तरह और लगातार दूसरी बार नकार दिया ? यदि देश की जनता को कांग्रेस पार्टी में कोई ऐसा शानदार नेता नज़र आता, जो देश को अर्थ व्यवस्था सहित हर क्षेत्र में नई ऊँचाइयों पर ले जाने में सक्षम हो, तो जनता लोकसभा चुनाव 2014 में देश के बड़े अर्थशास्त्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध जनादेश क्यों देती ? अभिजीत बनर्जी क्या यह नहीं जानते कि फरवरी-2016 में जिस जेएनयू विवाद में उन्होंने मोदी सरकार की कार्रवाई की आलोचना की थी और नवंबर-2016 में जिस नोटबंदी को लेकर उन्होंने मोदी सरकार पर सवाल खड़े किए थे, उसी मोदी सरकार को जनता ने 2019 में 2014 से बड़ा बहुमत दिया है ? क्या देश की अर्थ व्यवस्था को लेकर पूरी मोदी सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के हस्तक्षेप, सत्ता के केन्द्रीयकरण को ज़िम्मेदार ठहरा कर अभिजीत बनर्जी मोदी को यह सिखाना चाहते हैं कि पूर्ववर्ती कांग्रेस/यूपीए सरकारों की तर्ज पर भ्रष्टाचारियों, राष्ट्र विरोधियों, भारत विरोधी नारे लगाने वालों, पाकिस्तान परस्त लोगों, कश्मीर से धारा 370 हटाने के साहसी निर्णय करने जैसे कार्य पिछले 70 वर्षों की तरह टालते रहना चाहिए ?

जब तब नहीं मिला ‘न्याय’, तो अब कैसे मिलेगा ?

अभिजीत बनर्जी की भारतीय अर्थ व्यवस्था पर की गई टिप्पणी से कांग्रेस में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। कांग्रेस पार्टी में स्वयं को अर्थशास्त्र के बड़े-बड़े जानकार मानने वाले नेता सक्रिय हो गए। डॉ. मनमोहन सिंह तो प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करने वाले हैं, तो सुप्रीम कोर्ट में ‘राम मंदिर विवाद’ को चुनावी राजनीति के लिए लम्बा खिंचवाने की कवायद में लगे रहने वाले कपिल सिब्बल भी कोर्ट की दलीलों से ऊपर उठ कर मोदी सरकार को अर्थशास्त्र पर ज्ञान बाँटने लगे, परंतु यहाँ कांग्रेसियों को यह क्यों नहीं समझ में आता कि जिस अभिजीत बनर्जी की बनाई ‘न्यूनतम् आय योजना’ (NYAY-न्याय) को मई-2019 में देश की जनता ने न्याय नहीं दिया, वह अभिजीत बनर्जी कांग्रेस को अब क्या और कैसे ‘न्याय’ (राजनीतिक लाभ) दिलाएँगे ? मोदी सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसे राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करते हुए कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा की मर्यादा लांघ जाने वाली कांग्रेस को लगता है कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 से पहले उसे अभिजीत नामक ब्रह्मास्त्र मिल गया, परंतु देश की जनता के मन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की मंशाओं पर कोई संदेह होता, तो वह कांग्रेस की ’अभिजीत निर्मित’ न्याय को ठुकरा कर मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनाती।

‘व्यक्ति विरोध’ की ‘अंधाधुन’ में राष्ट्र विरोधियों का साथ ?

मान लेते हैं कि अभिजीत बनर्जी महान अर्थशास्त्री हैं, परंतु नरेन्द्र मोदी को पहचानने के लिए ’अर्थशास्त्र’ नहीं, अपितु ’भारत शास्त्र’ की आवश्यकता होती है। मोदी ने जब से देश की सत्ता संभाली है, उनकी जिह्वा से देश-विदेश में केवल और केवल ’भारत-भारत’ का रटन सुनाई देता रहा है, परंतु अभिजीत पर तो मानों ’व्यक्ति विरोध’ की ’अंधाधुन’ (अंधी धुन) सवार है। यह बात इसलिए दावे के साथ कही जा सकती है, क्योंकि अभिजीत ने पहली बार मोदी सरकार की आलोचना जेएनयू विवाद को लेकर की थी। एक अर्थशास्त्री के रूप में अभिजीत अर्थ व्यवस्था के मुद्दे पर मोदी सरकार की नीतियों की ’अराजनीतिक’ आलोचना करें, यह तो समझ में आता है, परंतु वही अभिजीत यदि जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वालों पर कार्रवाई करने की भी आलोचना करें, तो अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि अभिजीत को भारत सरकार से नहीं, अपितु नरेन्द्र मोदी यानी व्यक्ति से आपत्ति है, अन्यथा वे जेएनयू विवाद में कूदने का काम नहीं करते। क्या अभिजीत को पता है कि फरवरी-2016 में जेएनयू में कौन-से नारे लगे थे ? चलिए, हम अभिजीत और आपको भी याद दिला देते हैं कि वे कौन-से नारे थे, जिनके चलते मोदी सरकार को राष्ट्रद्रोह का मुक़दमा दर्ज करने पर विवश होना पड़ा।

ये थे वो नारे, जो राजधानी में भारत का चीरहरण कर रहे थे :

‘हम क्या चाहते ? आज़ादी’
‘हम लेके रहेंगे, आज़ादी’
‘गो इंडिया, गो बैक’
‘संग बाज़ी वाली आज़ादी (पत्थर फेंकने की आज़ादी)’
‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’
‘कश्मीर की आज़ादी तक जंग रहेगी’
‘भारत की बर्बादी तक आज़ादी’
‘भारत के मुल्क को एक झटका और दो’
‘भारत को एक रगड़ा और दो’
‘हम छिन के लेंगे आज़ादी, लड़के लेंगे आज़ादी’
‘तुम कितने अफज़ल मारोगे, हर घर से अफज़ल निकलेगा’
‘अफज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’
‘अफज़ल तेरे खून से इनक़लाब आएगा’
‘कितने मक़बूल मारोगे, हर घर से मक़बूल निकलेगा’
‘इंडियन आर्मी को दो रगड़ा’

क्या इन नारों में अभिजीत को राष्ट्र द्रोह या राष्ट्र विरोध नज़र नहीं आता। नोबेल के साथ नाम जुड़ने के बाद भी अभिजीत ने इस बात को दोहराया कि जेएनयू में उन्होंने भी 1983 में आंदोलन किया था और 10 दिन तिहाड़ जेल में बिताए थे, परंतु तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने राष्ट्र द्रोह का मुक़दमा दर्ज नहीं किया था। प्रश्न यह उठता है कि क्या अभिजीत ने 1983 के उस आंदोलन में क्या इस ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग द्वारा लगाए गए नारे लगाए थे ? एक महान अर्थशास्त्री, बंगाल की भूमि के सपूत और भारतीय मूल का होने के बावज़ूद अभिजीत को इन नारों में राष्ट्र द्रोह नहीं दिखाई देता ? यदि फिर भी वे ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के लोगों के विरुद्ध कार्रवाई को ग़लत बताते हैं, तो स्पष्ट है कि अभिजीत का लक्ष्य व्यक्ति विरोध यानी मोदी विरोध है।

पत्थरों ने बनाया पहाड़, पत्थरबाज़ हुए पस्त

अभिजीत बनर्जी कदाचित नरेन्द्र मोदी को अभी तक भी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। नरेन्द्र मोदी ने अपने कई इंटरव्यू में कई बार कहा है, ‘मुझ पर लोगों ने जितने पत्थर फेंके, मैंने उन्हीं पत्थरों को सीढ़ी बना लिया।’ मोदी का यह कथन उनके एक साधारण कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने से सत्य भी सिद्ध हो चुका है। मोदी वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात दंगों के बाद से ही विरोधियों के पत्थरों को झेलते आ रहे हैं और यही पत्थर उनके लिए मील के पत्थर सिद्ध होते रहे हैं। इन्हीं पत्थरों से मोदी ने गुजरात में तीन-तीन बार विधानसभा चुनाव जीते। यही वे पत्थर थे, जिनके दम पर मोदी 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बने। मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए तो कांग्रेस सहित वे तमाम राजनीतिक दल एकजुट हो गए, जिनकी राजनीतिक विचारधारा में आपसी विरोधाभास था। इन सभी ने मोदी पर ख़ूब पत्थर फेंके, परंतु मोदी के लिए ये सारे पत्थर दोबारा प्रधानमंत्री बनने की सीढ़ी सिद्ध हुए और पत्थरबाज़ कांग्रेस सहित कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल पस्त हो गए। मैं यहाँ उन बड़े-बड़े ‘पत्थरबाज़ों’ के नाम नहीं गिनाना चाहता, क्योंकि देश की जनता उन ‘पत्थरबाज़ों’ को भली-भाँति जानती थी और है, तभी तो सभी को जनता ने घर बैठा दिया और मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बना दिया। अब जबकि अभिजीत रूपी ब्रह्मास्त्र से कांग्रेस फूली नहीं समा रही है, तब 24 अक्टूबर को यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि जिन अभिजीत की ‘न्याय’ को देश की जनता ने कूड़े में फेंक दिया था, उन अभिजीत के ‘मोदी विरोधी’ अर्थज्ञान का महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता कैसा ‘न्याय’ करेगी और कांग्रेस को भी एहसास हो जाएगा कि जनता मोदी के साथ है या मोदी विरोध के नाम पर राष्ट्रवाद तथा राष्ट्रहित की मर्यादा लांघ देने वालों के साथ ?

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