बस या बकासुर ? तीन साल में केवल 10 राज्यों में ही 34,872 यात्रियों को लील गईं बस दुर्घटनाएँ !

विशेष रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 10 जुलाई, 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। हमारे देश में बस दुर्घटना कोई नई बात नहीं है। दो दिन पहले ही उत्तर प्रदेश में यमुना एक्सप्रेस वे पर हुए बस एक्सिडेंट में 29 लोगों की जान चली गई, तो हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों से तो बस दुर्घटनाओं के समाचार निरंतर आते ही रहते हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि अंतत: केन्द्र और राज्य सरकारें मिल कर इन बस दुर्घटनाओं को रोकने की दिशा में कोई गंभीर कदम क्यों नहीं उठातीं ? क्या सरकारें आम जनता की जान का कोई मोल ही नहीं मानती ? क्या मुआवजा भर दे देना ही सरकारों का कर्तव्य मात्र है ? क्या ऐसी परिस्थिति का निर्माण नहीं किया जा सकता, जिसमें बस दुर्घटनाओं को टाला जा सके ? यह सही है कि पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है, परंतु कुछ तो कदम उठाए ही जा सकते हैं।

इन प्रश्नों के उत्तर कदाचित कोई सरकार नहीं देगी, क्योंकि वैसे भी दुर्घटना तो दुर्घटना ही होती है। दुर्घटना के बारे में यह आम धारणा होती है कि होनी का कौन टाल सकता है ? परंतु अब हम जो आँकड़े देने जा रहे हैं, वह सरकारों को ‘होनी को कौन टाल सकता है’ वाक्य के भरोसे बैठे रहने की बजाए झकझोरने का काम कर सकते हैं, यदि सरकारें चाहे तो। ऐसा नहीं है कि हम जो यहाँ आँकड़े देने जा रहे हैं, उनसे सरकारें अनभिज्ञ हैं, वरन् ये आँकड़े स्वयं सरकार की ओर से जारी किए गए हैं। इन सरकारी आँकड़ों को देख कर मन में सहज ही प्रश्न उठ जाता है कि भारत में चलने वाली बस बस है या बकासुर। अब बकासुर को तो जानते ही होंगे। महाभारत में बकासुर नामक असुर था, जो हर चीज़ लील जाने को आतुर रहता था। बकासुर का अंत तो भीम ने कर दिया, परंतु हमारे देश में बकासुर का रूप धारण कर चुकी बसों को मानव प्राणों को लीलने से कौन रोकेगा ?

भयावह आँकड़ें सरकारों को क्यों नहीं झकझोरते ?

नई-नई तकनीकों और सुविधाओं से सज्ज बसें अब पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आरामदायक और सुविधाजनक हो गई हैं, परंतु दुर्घटनाओं का क्या ? ऐसा नहीं है कि बसों में केवल यात्री सुविधाएँ ही बढ़ी हैं, सुरक्षा सुविधाओं को भी लगातार पुख्ता किया जाता रहा है, परंतु इसके बावजूद भारत में बस दुर्घटनाओँ के तीन साल के आँकड़े इतने भयावह हैं कि इन्हें पढ़ने के बाद आप बस यात्रा से तौबा ही कर लेंगे। केन्द्र सरकार के आँकड़ों के अनुसार हमारे देश में 2015 से 2017 यानी तीन वर्षों की अवधि में 1 लाख 11 हजार 464 बस दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें 34 हजार 872 यात्रियों की मृत्यु हो गई। इन आँकड़ों को छोटी अवधियों में बाँटा जाए, तो हमारे देश में बस दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष 11 हजार से अधिक, प्रतिमाह लगभग 1 हजार और प्रतिदिन लगभग 34 लोगों की मौत हो रही है। अब बताइए कि ये बस है या बकासुर ? प्रश्न यह उठता है कि इतने भयावह आँकड़ें अंतत: केन्द्र और राज्य सरकारों को क्यों नहीं झकझोरते ?

तमिलनाडु में सर्वाधिक बस दुर्घटनाएँ और मौतें

सरकारी आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 से 2017 के दौरान सर्वाधिक 20 हजार 576 बस दुर्घटनाएँ और 6 हजार 68 मौतें तमिलनाडु में हुईं। 8,219 बस दुर्घटनाओं और 4,501 मौतों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा। इसी प्रकार कर्नाटक में 10,944 बस दुर्घटनाओं में 2,628 लोग मारे गए। केरल में 14 हजार 453 बस दुर्घटनाओं में 2,310 मौतें, राजस्थान में 4,610 बस दुर्घटनाओं में 2,219 मौतें, मध्य प्रदेश में 9,669 बस दुर्घटनाओं में 1,981 मौतें, आंध्र प्रदेश में 4,967 बस दुर्घटनाओं में 1,914 मौतें, बिहार में 3,084 बस दुर्घटनाओं में 1,914 मौतें, महाराष्ट्र में 8,023 बस दुर्घटनाओं में 3,615 मौतें और पश्चिम बंगाल में 3,615 बस दुर्घटनाओं में 1,464 मौतें हुईं।

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