‘क्रांतिकारी कनाई’ : माँ भारती के गद्दार पर बरसाई गोलियाँ और हँसते-हँसते झूल गए फाँसी के फंदे पर

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 30 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भारत अब से ठीक 8 दिन बाद यानी 7 सितम्बर, 2019 को इतिहास रचने वाला है, जब चंद्रयान 2 चंद्र के दक्षिण ध्रुव पर लैण्ड करेगा। पूरा भारत वर्ष इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने को आतुर है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों के इस चमत्कार को LIVE देखने वाले हैं, जब चंद्रयान 2 से लैण्डर विक्रम चंद्र के दक्षिण ध्रुव पर उतरेगा। भारत के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि चंद्र के दक्षिण ध्रुव पर पहुँचने वाला भारत दुनिया का पहला देश बनने जा रहा है।

यद्यपि हम आज चंद्रयान 2 के बारे में कोई और विशेष जानकारी नहीं देने जा रहे। चंद्रयान 2 का उल्लेख करने का उद्देश्य केवल इतना ही है कि जो भारत आज चंद्र की ओर उड़ान कर रहा है, उसके निर्माण की नींव में बलिदानों के अनेक स्तंभ पड़े हुए हैं। 15 अगस्त, 1947 से पहले लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने सिरों की अंतिम निशानी माँ भारती के चरणों में न धरी होती, तो कदाचित आज भी भारत अंग्रेजों की दासता भुगत रहा होता और इसरो या अंतरिक्ष में उड़ान की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। माँ भारती को अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने वाले सैकड़ों बलिदानियों में एक नाम कनाईलाल दत्त का भी शामिल है।

छोटी उम्र में किया बड़ा काम

क्रांतिकारी कनाईलाल दत्त

हम स्वतंत्रता आंदोलन और उससे जुड़े इतिहास की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे चित्त में शहीद भगत सिंह से लेकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, खुदीराम बोस जैसे कई लड़ाकूओं और बलिदानियों के नाम उभर आते हैं, परंतु क्या आपने कनाईलाल दत्त के बारे में सुना है ? कनाईलाल दत्त भी ऐसे ही वीर योद्धाओं में एक थे, जिनके सीने में अंग्रेजों के विरुद्ध ज्वाला धधकती थी। कनाईलाल दत्त की आज 131वीं जयंती है। इसीलिए हम उन्हें याद कर रहे हैं। 10 नवम्बर, 1908 को फाँसी के फंदे पर झूल जाने वाले क्रांतिकारी कनाईलाल दत्त ने अपनी 20 वर्ष की अल्पायु में कई बड़े काम किए, परंतु स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उन्हें उतनी शिद्दत से याद नहीं किया जाता, जिसके वे अधिकारी हैं।

चंद्रनगर में हुआ ‘चंद्रोदय’

चंद्रनगर में स्थापित कनाईलाल दत्त की प्रतिमा

कनाईलाल दत्त का जन्म 30 अगस्त, 1888 को ब्रिटिश साम्राज्याधीन भारत के बंगाल स्थित हुगली जिले के चंद्रनगर में हुआ था। पिता चुन्नीलाल दत्त ब्रिटिश भारत सरकार की सेवा में मुंबई में नियुक्त थे। 5 वर्ष की आयु में कनाईलाल मुंबई आ गए और उनकी आरंभिक शिक्षा हुई, परंतु उनका मन तो बंगाल में था। इसीलिए उन्होंने मुंबई से चंद्रनगर जाकर हुगली कॉलेज में दाखिल लिया और ग्रेजुएशन किया। यह वह दौर था, जब अंग्रेजों ने बंगाल के विभाजन का निर्णय किया था। 1905 में बंगभंग के विरुद्ध पूरे बंगाल में आंदोलन की आग फैल चुकी थी और इसकी आँच क्रांतिकारी कनाईलाल को भी झुलसा रही थी। इसी दौरान वे प्रोफेसर चारुचंद्र राय के सम्पर्क में आए, जिन्होंने बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के लिए युगांतर पार्टी बनाई थी। कनाईलाल ने अन्य क्रांतिकारियों की सहायता से गोली चलाना और निशाना साधना भी सीख लिया। यही कारण था कि कनाईलाल हुगली से ग्रेजुएशन की परीक्षा उत्तीर्ण कर कोलकाता आ गए और बंगभंग विरोधी आंदोलन कर रहे बारीन्द्र कुमार के दल में शामिल हो गए। इसी दौरान कनाईलाल इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के सम्पर्क में भी आए। बंगाल के विभाजन के विरुद्ध कनाईलाल दत्त ने अरविंद घोष और बारीन्द्र कुमार के साथ मिल कर अंग्रेजों के विरुद्ध ज़ोरदार अभियान छेड़ा। इससे खिन्न अंग्रेज सरकार ने कनाईलाल दत्त को हुगली कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री नहीं प्रदान की।

क्रांतिकारियों के दुश्मन किंग्सफोर्ड पर हमला

ब्रिटिश अधिकारी

1905 में जब बंगाल में विभाजन के विरुद्ध क्रांति चल रही थी, तब ब्रिटिश जज मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड कोलकाता के चीफ प्रेसिडेंट था। किंग्सफोर्ड भारतीय क्रांतिकारियों को अपमानित और दंडित करने के लिए बहुत बदनाम था। उसने बंगाल विभाजन के विरुद्ध चल रहे अनेक आंदोलनकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को अपमानित व दंडित किया। बंगाल के लोगों में किंग्सफोर्ड के विरुद्ध भारी आक्रोश था। यही कारण है कि ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड को जनाक्रोश से बचाने व सुरक्षा की दृष्टि से उसे मुज़फ्फरपुर में सेशन जज के रूप में स्थानांतरित कर दिया। किंग्सफोर्ड कोलकाता से तो चला गया, परंतु उसके दमन चक्र को क्रांतिकारी भूले नहीं। इसीलिए क्रांतिकारियों ने अपने बीच से प्रफुल चाकी और खुदीराम बोस को किंग्सफोर्ड की हत्या करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। चाकी और बोस ने किंग्सफोर्ड की रेकी की और 30 अप्रैल, 1908 को किंग्सफोर्ड की हत्या के इरादे से यूरोपियन क्लप से बाहर निकल रही एक बग्घी पर बम फेंका, परंतु क्रांतिकारियों का यह दुर्भाग्य था कि उस बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं था, बल्कि दो यूरोपीय महिलाएँ थीं, जो मारी गईं।

गद्दार को ‘चक्रव्यूह’ बना कर किया ढेर

क्रांतिकारियों के आक्रमण से अंग्रेज दमनकारी अधिकारी किंग्सफोर्ड बच गया, क्योंकि उसे पहले से ही उस पर होने वाले आक्रमण की सूचना मिल गई थी। किंग्सफोर्ड पर हमले के आरोप में 2 मई, 1908 को जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उनमें कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस भी शामिल थे। अब क्रांतिकारियों के सीने में माँ भारती से गद्दारी करने वाले और किंग्सफोर्ड को बचाने वाले नरेन गोस्वामी से प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी, क्योंकि इस मामले में नरेन ने न केवल किंग्सफोर्ड के लिए मुखबिरी की, अपितु वह सरकारी गवाह भी बन गया। क्रांतिकारियों ने नरेन को गद्दारी की सजा देने के लिए रिवॉल्वर का बंदोबस्त किया। कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस दोनों उस समय जेल में थे। पहले तो दोनों ने बीमारी का नाटक किया और जेल के अस्पताल में भर्ती हो गए। क्रांतिकारियों ने जेल के अस्पताल में कनाईलाल व सत्येन तक रिवॉल्वर पहुँचाई। अस्पताल से ही सत्येन ने नरेन को संदेश भेजा, ‘मैं जेल के जीवन से ऊब गया हूँ और तुम्हारी ही तरह सरकारी गवाह बनना चाहता हूँ।’ नरेन इस बात से प्रसन्न था कि उसे एक और साथी मिल गया। वह उत्साहपूर्वक सत्येन से मिलने जेल के अस्पताल पहुँचा। फिर क्या था, नरेन को देखते ही पहले सत्येन ने और फिर कनाईलाल दत्त ने उस पर रिवॉल्वर से गोलियों की बरसात कर दी। गद्दार नरेन वहीं ढेर हो गया। नरेन की हत्या के आरोप में कनाईलाल दत्त और सत्येन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

अफसोस नहीं रहा होगा फाँसी पर लटकते वक़्त

कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस के विरुद्ध नरेन की हत्या का मुकदमा चला और अदालत ने दोनों को फाँसी की सजा सुनाई। कनाईलाल को दिए गए फ़ैसले में लिखा गया कि उन्हें अपील करने की इज़ाजत नहीं होगी। कनाईलाल ऊपरी अदालत में अपील नहीं कर सके और 10 नवम्बर, 1908 को उन्हें कोलकाता में फाँसी के फंदे पर लटका दिया गया। मात्र 20 वर्ष की आयु में कनाईलाल दत्त उस अपराध के लिए फाँसी के फंदे पर लटक कर शहीद हो गए, जिसमें उन्होंने भारत से गद्दारी करने वाले की हत्या की थी। हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि कनाईलाल के मन में फाँसी को लेकर तनिक भी खेद नहीं होगा, अपितु इस बात का संतोष होगा कि उन्होंने शहादत से पहले भारत से ग़द्दारी करने वाले नरेन को नर्क में पहुँचा दिया।

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