सनातन संक्रांति : ‘अ’ और ‘नि:’ का सुनो आर्तनाद, हो जाएगा श्याम का शंखनाद !

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 19 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। आज गुरुवार या बृहस्पतिवार है। इस शब्द में समाविष्ट गुरु का अर्थ है, अंधकार से ज्ञान की ओर ले जाना। गु अर्थात् अंधकार और रु अर्थात् प्रकाश। सप्ताह के सातों दिनों में गुरुवार सबसे महत्वपूर्ण दिवस है, क्योंकि ब्रह्मांड के नौ ग्रहों में गुरु सर्वाधिक भारी ग्रह है। गुरु धर्म व शिक्षा का कारक ग्रह है। भारतीय वैदिक, सनातन, प्राचीन और आधुनिक धर्म-संस्कृति में भी गुरुवार का बहुत महत्व है, क्योंकि इस पूरी सृष्टि में ईश्वर का यदि कोई साक्षात् स्वरूप है, तो वह गुरु है। गुरु का अर्थ कोई देहधारी व्यक्ति से नहीं है। गुरु अर्थात् तत्ववेत्ता। वह, जिसने अपने अस्तित्व के मूल तत्व को जान लिया है, गुरु है। गुरु की विशेषता यह भी है कि उसकी दृष्टि में कोई शिष्य नहीं होता, क्योंकि गुरु एक ऐसा अस्तित्व होता है, जो उसके समक्ष एक शिष्य के रूप में प्रस्तुत होने वाले हर व्यक्ति को गुरु ही बनाना चाहता है।

मैंने गुरु और गुरुवार का यह महत्व इसलिए बताया, क्योंकि yuvapress.com की ओर से आज से ‘सनातन संक्रांति’ नामक स्तंभ आरंभ होने जा रहा है और इसके लिए मैंने सनातन संक्रांति स्तंभ के मूल आधार गुरु के दिन यानी गुरुवार का चयन किया है। एक देह के रूप में मैं कोई कृष्ण नहीं हूँ, जो हमारे पाठकों के बीच वेदों-उपनिषदों या श्रीमद् भगवद गीता के उपदेश देने जा रहा हूँ। हाँ, जो भी व्यक्ति मुझे मेरी देह से परे जानता होगा, वह निश्चित ही मुझमें बसे मूल तत्व को पहचान लेगा। मैं उसी मूल तत्व, जिसे हम आत्मा-परमात्मा भी कहते हैं, के आधार पर ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ आरंभ करने जा रहा हूँ।

क्या है ‘सनातन संक्रांति’ और इसका उद्देश्य ?

सबसे पहले जानते हैं संक्रांति क्या है ? हमारे देश में साधारणत: सूर्य के मकर राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है, परंतु संक्रांति का मूल अर्थ है नि:सर्ग का उत्सव। संक्रांति शब्द में क्रांति शब्द भी समाहित है। क्रांति का अर्थ है किसी ध्येय प्राप्ति के लिए पूर्ण निष्ठा से जुट जाना। संक्रांति का अर्थ है किसी में स्वयं को संक्रमित (प्रवेश कराना) करना। अब सनातन का अर्थ समझ लीजिए। सनातन का शाब्दिक अर्थ परम्परानुसार, परम्परानिष्ठ। सनातन अर्थात् जिसका कोई आरंभ नहीं और न ही कोई अंत है। सनातन अर्थात् ‘है’। यह ‘है’ ही सनातन है। सनातन अर्थात् वह परम् सत्य, जो सदैव था, है और रहेगा। सनातन का न कोई आदि है और न ही कोई अंत, क्योंकि वह परम् सत्य है। ऐसा परम् सत्य, जिसे जानने के लिए प्रत्येक मनुष्य का जन्म हुआ है। जब महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा, ‘मैं जो तुझे ज्ञान दे रहा हूँ, वह परम्परा से चला आ रहा है।’ तब अर्जुन ने प्रश्न किया, ‘तो आज पुन: यह ज्ञान देने की क्यों आवश्यकता पड़ी ?’ उत्तर में कृष्ण परमात्मा बोले, ‘आज आधुनिक युग (द्वापर युग) में यह ज्ञान विलुप्त होता जा रहा है। इसीलिए मैं तुझे पुन: यह ज्ञान दे रहा हूँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे फिर से समझ सकें और अपने मानवीय जीवन के परम लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त कर सकें।’ मुझे भी 5 हजार वर्ष पूर्व कृष्ण परमात्मा द्वारा कही गई बात सत्य लगती है। आधुनिक विज्ञान युग में आज मानव जाति विशेषकर युवा वर्ग अपने मूल अस्तित्व यानी तत्व से विमुख होता जा रहा है और इसीलिए मैं समस्त मानव जाति का सनातन में पुन: संक्रमण करने के उद्देश्य से ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ आरंभ कर रहा हूँ। ‘सनातन संक्रांति’ के माध्यम से मैं समस्त मानव जाति को परम् सत्य, सदा रहने वाले और आदि-मध्य-अंत से रहित परम तत्व यानी परमात्मा में संक्रमित करने के लिए मार्गदर्शन देने का प्रयास करूँगा।

‘अ’ और ‘नि:’ से ‘सनातन संक्रांति’ का शुभारंभ

अब शीर्षक पर आते हैं। संस्कृत और हिन्दी भाषा में 52 अक्षर बताए गए हैं, जिनसे करोड़ों शब्दों की रचना होती है, परंतु आज मैं ‘सनातन संक्रांति’ के इस प्रथम भाग में आपको दो अक्षरों ‘अ’ और ‘नि:’ से निकलने वाले शब्दों से परिचित कराऊँगा। ये दो अक्षर ‘अ’ और ‘नि:’ अपने से निकलने वाले हर शब्द के माध्यम से आर्तनाद करते हैं। आर्तनाद का अर्थ है पुकार, चीत्कार। यदि हम इन दो अक्षरों से निकलने वाले शब्दों का आर्तनाद सुन लें, तो हमारे जीवन में ‘श्याम’ का शंखनाद होकर ही रहेगा। यहाँ श्याम का अर्थ केवल वह जगद्गुरु श्री कृष्ण परमात्मा नहीं है, जिन्होंने गीता का उपदेश दिया, अपितु उस तत्व से है, जो श्याम में निहित था, आपमें और मुझमें भी है। ‘अ’ और ‘नि:’ से निकलने वाला हर शब्द हमें स्वयं की ओर प्रयाण करने में सहायता कर सकता है। जीवन में बड़ी-बड़ी भौतिक उपलब्धियों को हम अक्सर आश्चर्य और चमत्कार मान लेते हैं, परंतु क्या आप जानते हैं कि दुनिया का एकमात्र चमत्कार और आश्चर्य क्या है ? यह चमत्कार और आश्चर्य है व्यक्ति का स्वयं को जान लेना। पूरी सृष्टि की जानकारी रखने वाला भी भीतर से परिपूर्ण नहीं हो सकता, जब तक कि वह स्वयं को नहीं जान लेता और ‘अ’ तथा ‘नि:’ से निकलने वाले शब्द हमें सभी भौतिक चमत्कारों से बड़े और सर्वोपरि चमत्कार तथा आश्चर्य से अवगत करा सकते हैं।

क्या है ‘अ’ का आर्त ?

सबसे पहले जीव सृष्टि के सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य की ही बात करते हैं। हर मनुष्य स्वयं की पहचान अपने नाम और रूप से देता है। गुणों की पहचान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि लोग स्वयं ही जान जाते हैं कि वह मनुष्य गुणवान है या दुर्गुणी, परंतु तनिक सोचिए कि हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं, तो हमारी पहचान केवल हमारे उस नाम, रूप व गुण से ही होगी, जो कि देह पर लगी उपाधियाँ हैं ? नहीं, क्योंकि इस देह ने तो एक दिन जन्म लिया है और एक दिन नष्ट भी हो जाएगा। हमारी वास्तविक पहचान है इस देह को संचारित व संचालित करने वाला तत्व, जो हमारे भीतर ही होता है, परंतु हम जीवन भर उसे जान नहीं पाते। इस तत्व को परिभाषित करना हो, तो उसके लिए ‘अ’ और ‘नि:’ शब्दों का ही सहारा लेना होता है। उदाहरण के लिए, जब तक हम जानते नहीं हैं कि वह तत्व क्या है, तब तक उसे अज्ञात कहा जाता है। उस अज्ञात तत्व को अनादि, अनंत, अविकारी, अविनाशी, अवर्णनीय, अकथ्य, अकथनीय, अरूपी, अकर्मण्य, अकर्मी, अकल्प, अकाट्य, अकूत, अकूट, अक्रिय, अक्षत, अक्षर, अक्षय, अक्षुण्ण, अक्षुब्ध, अक्षोभ्य, अखंड, अद्वैत, अगण्य, अलख, अगुणी, अचल, अच्युत, अविचल, अचिंतनीय, अचिंत्य, अछिन्न, अजड़, अजर, अमर, अजलित, अटल, अटूट, अतर्क्य, अतुल्य, अद्भुत, अदलीय, अद्वितीय, अधिष्ठान, अनन्य, अनिरुद्ध, अनामी, अनुपम, अनुरक्त, अनूठा, अपरिवर्तनीय, अपरिवर्तनशील, अपर्याय, अपार्थ, अप्रतिम, अबंध, अबाध, अभंगी, अभाष्य, अभिनव, अभेद, अमर्त्य, अलक्षण, अवध्य, अशोष्य, अवाक्, अविच्युत, असाधारण, अस्तित्व जैसे शब्दों के माध्यम से जाना जाता है, परंतु उसे देखा नहीं जा सकता, उसका केवल और केवल अनुभव किया जा सकता है। ‘अ’ से निकले ये सभी शब्द चीत्कार कर रहे हैं समस्त मानव जाति के लिए कि अपने भीतर चित्त में बैठे उस आत्मा को जानना ही उसका धर्म है। मनुष्य का और कोई धर्म नहीं है। न वह हिन्दू है, न मुसलमान, न सीख है या न ईसाई-पारसी-यहूदी आदि। मनुष्य का एकमात्र धर्म है स्वयं को जानने के लिए किया जाने वाला उसका कर्म। यह कर्म ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है। मार्ग कोई भी हो सकता है।

क्या है ‘नि:’ का नाद ?

अब बात करते हैं ‘नि:’ अक्षर की। ‘नि:’ से बनने वाले हजारों शब्द उस नाद की तरह है, जो मनुष्य को उस आत्मा को जानने का मार्ग दिखाते हैं, क्योंकि ‘नि:’ का अर्थ ही होता है नकारना। ‘नि:’ जब किसी शब्द के साथ जुड़ जाता है, तो उसमें समाहित ‘ह’ अक्षर ‘र्, स्, श्, ष्,’ आदि में परिवर्तित हो जाता है। इसीलिए जब मैं ‘नि:’ से निकले शब्दों के बारे में बताऊँगा, तो उनमें से कई शब्दों में ‘ह’ अक्षर ‘र्, स्, श् ष्,’ में परिवर्तित हो जाएगा। उदाहरण के लिए विरोध से पहले यदि ‘नि:’ लगेगा, तो वह शब्द बनेगा ‘निर्विरोध’। अब आइए जानते हैं ‘नि:’ से निकले शब्दों को, जिनमें नि:सृत, नि:स्पृह, नि:स्वार्थ, निःशब्द, निःशस्त्र, निःशोध्य, निःसंग, निःसंदेह, निःसीम, निःस्पृह, निःस्वार्थ, निर्गंध, निर्गुण, निर्ग्रंथ, निरावयवी, निर्घात, निर्दंभ, निर्दल, निर्दोष, निर्द्वन्द्व, निर्धार, निर्धार्य, निर्प्रश्नीय, निर्बंध, निर्बाध, निर्भय, निर्भीक, निर्भ्रम, निर्भ्रांत, निर्मम, निर्ममत्व, निर्मर्याद, निर्मल, निर्माता, निर्मात्रिक, निर्मायक, निर्मोही, निर्लेप, निर्लोभी, निर्वाक्, निराधार, निर्विकार, निर्विवाद, निर्विषय, निर्वैर, निर्व्याज, निर्व्याधि, निर्हेतु, निष्कंटक, निष्कंप, निष्कपट, निष्क्रिय, निष्चेष्ट, निष्ठित, निष्पंद, निष्पक्ष, निष्पुरुष, निष्पौरुष, निस्तब्ध, निस्पंद, निस्पृह, निस्यंद, निस्स्वाद, निश्चल, निशंक, निशब्द, निश्चिंत, निश्चय, निश्चयी, निश्चल, निश्छल, निश्चित, निश्चेष्ट, निश्छेद, निश्रम, निश्रेणी, निश्शंक, निश्शील, निश्शेष शामिल हैं। ‘नि:’ से निकले सभी शब्द अपने अर्थ में परम तत्व परमात्मा की प्राप्ति के लिए आवश्यक गुणों को समाए हुए हैं। उदाहरण के लिए निराधार। साधारणत: व्यवहार में निराधार शब्द प्रयोग किसी आधारहीन, दुर्बल, नि:सहाय व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है, परंतु परमात्मा वास्तव में निराधार है। यहाँ निराधार से तात्पर्य है, जिसे किसी के आधार की आवश्यकता नहीं है। परमात्मा स्वयं आधार है। इसी प्रकार निर्मम शब्द प्रयोग ममता विहीन व्यक्ति के लिए किया जाता है, परंतु यहाँ निर्मम शब्द का अर्थ है मम भाव से रहित। निर्गुण शब्द भी अक्सर हम लोग गुण रहित व्यक्ति के लिए प्रयुक्त करते हैं और ऐसे व्यक्ति को कभी-कभी हम हेय दृष्टि से भी देखते हैं। व्यावहारिक भाषा में निर्गुण शब्द दुर्गुण का पर्याय बन चुका है, परंतु यहाँ निर्गुण शब्द का अर्थ है सत्व, रज, तम गुणों से रहित परमात्मा। परमात्मा विलक्षण है। इसीलिए उसके अवर्णनीय, अकथनीय और निर्गुण, निराकार वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए ऊपर दिए गए और छूट गए ऐसे ही अनेक शब्दों के माध्यम से हमें स्वयं परमात्मा की तरह बनने की प्रेरणा मिल सकती है। इन शब्दों के गूढ़ार्थ को समझने के लिए बस आवश्यकता होती है एक गुरु की।

जारी रहेगी ‘सनातन संक्रांति’ की अश्खलित श्रृंखला

yuvapress.com के सान्निध्य में आज गुरुवार से आरंभ हुई ‘सनातन संक्रांति’ की यह अश्खलित श्रृंखला आगे भी जारी रहेगी। आगे इस श्रृंखला में आपको उन प्रश्नों के उत्तर अवश्य मिलेंगे, जो इस आलेख को पढ़ने के बाद आपके मन में जन्म लेंगे। ‘अ’ और ‘नि:’ से निकले शब्द केवल इतने ही नहीं हैं, जितने कि इस आलेख में दर्शाए गए हैं। कई शब्द और भी हैं। इस आलेख में उल्लेखित अक्षरों, शब्दों और वाक्यों के निहितार्थ को आगे की श्रृंखलाओं में परत दर परत खोला जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति को उस विज्ञानयुक्त ज्ञान (SCIENTIFI KNOWDEGE) की ओर ले जाय जाएगा, जिसके समक्ष दुनिया की हर जानकारी (INFORMATION) वामन सिद्ध होगी। इस वैज्ञानिक ज्ञान को जान लेने के बाद व्यक्ति के लिए इस सृष्टि में जानने योग्य कुछ नहीं बचेगा। क्या है वह ज्ञान ? इस प्रश्न और ऐसे ही अनेक प्रश्नों के उत्तर आगे की श्रृंखलाओं में अवश्य देने का प्रयास किया जाएगा।

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस प्रथम भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

(गुरु अर्पण)

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