सनातन संक्रांति : हे ‘भारत’ ! तुम्हारा ‘पूरब’ तो ‘पश्चिम’ हो गया..!

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 5 दिसम्बर, 2019 (युवाPRESS)। वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS आज फिर एक बार अपने साप्ताहिक स्तंभ ‘सनातन संक्रांति’ के साथ सत्य-सनातन मार्ग की ओर लौटने का आह्वान करने जा रहा है। गत 19 सितंबर, 2019 से आरंभ हुए ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ का आज भाग 12 है। पिछली 11 कड़ियों में हमने वास्तविक धर्म, वास्तविक कर्म से लेकर मोक्ष तक के विषयों पर विमर्श किया, परंतु आज की 12वीं कड़ी हैदराबाद में घटी अमानवीय और नृशंस घटना से उपजे प्रश्नों को समर्पित है, जो ईश्वर की सबसे अनपुम कृति मानव समाज को झकझोर रहे हैं। समाचार माध्यमों में इस घटना को लेकर चर्चाओं और तर्क-कुतर्कों का असीमित दौर चल पड़ा, जिसका परिणाम कदाचित कुछ भी नहीं आया और न ही आएगा, क्योंकि सभी समाचार माध्यम भारत की सत्य-सनातन धर्म परम्परा पर नहीं, अपितु लोकरुचि और व्यवसाय पर आधारित हैं, परंतु युवाPRESS भारत ही नहीं, पूरे विश्व को प्रताड़ित करने वाली हर समस्या का समाधान देने में सक्षम सत्य-सनातन धर्म के माध्यम से समूची मानव जाति को उच्च शिखर पर ले जाने का मार्ग दिखाएगा।

‘सनातन संक्रांति’ के भाग 12 का शीर्षक बहुत कुछ कहता है। वास्तव में सत्तर के दौर में जहाँ स्वतंत्र भारत नवयौवन व ऊर्जा से भरपूर था, वहीं 200 वर्षों की अंग्रेज़ी दासता और पश्चिम संस्कृति के आक्रमण से प्रभावित नई पीढ़ी में 23 वर्ष पूर्व तक लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति की कांति धुंधला रही थी। यही कारण था कि 1970 में भारतीय सिनेमा जगत से ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी फिल्म निकली। भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 के बाद देश में किसानों के साथ-साथ जवानों का भी महत्व समझाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार को ‘जय जवान-जय किसान’ नारे को सार्थक करने वाली फिल्म बनाने का सुझाव दिया। मनोज कुमार ने 1967 में फिल्म ‘उपकार’ बनाई और पहली बार इस फिल्म में मनोज कुमार ने अपना नाम ‘भारत’ रखा। किसान और जवान दोनों की गाथा के साथ देशभक्ति से ओतप्रोत ‘उपकार’ फिल्म ने सफलता के ऐसे आयाम छुए कि मनोज कुमार पूरे देश में ‘भारत कुमार’ के नाम से विख्यात और स्थापित हो गए। उपकार के बाद भी पाँच और फिल्मों में मनोज कुमार का नाम ‘भारत’ रहा और सभी फिल्में देशभक्ति पर आधारित थीं और सभी सुपरहिट भी रहीं। यही कारण है कि आज भी बॉलीवुड ही नहीं, पूरे देश में में मनोज कुमार को ‘भारत कुमार’ के नाम से ही जाना जाता है।

क्या ‘भारत’ का ‘पूरब’ अब भी ‘पूरब’ है ?

यद्यपि उपकार सहित कुल छह फिल्मों में मनोज कुमार का नाम भारत था, परंतु सबसे अधिक ध्यान ‘पूरब और पश्चिम’ के ‘भारत’ ने खींचा। जैसा कि इस फिल्म का नाम ही था ‘पूरब और पश्चिम’, मनोज कुमार ने फिल्म में ‘भारत’ की भूमिका में देशवासियों को पूरब और पश्चिम की संस्कृति का अंतर समझाने का प्रयास किया। ‘पूरब और पश्चिम’ फिल्म में ‘भारत’ यानी मनोज कुमार ब्रिटेन में जा बसे और पश्चिमी संस्कृति के रंग में रंग चुके भारतीय मूल के परिवार को भारतीय धर्म-संस्कृति, परम्परा और मूल्यों का महत्व समझाते देखे गए। फिल्म में ‘भारत’ की भूमिका निभा रहे मनोज कुमार ने लंदन में भारतीय मूल के लोगों के बीच ‘भारत की बात सुनाता हूँ…’ गीत गाकर भारत की भव्य सांस्कृतिक गरिमा का बखान किया और वहाँ बसे भारतीयों ही नहीं, अपितु ब्रिटेन के लोगों के मन में भी भारत को लेकर व्याप्त भ्रांतियों और भ्रमों को गौरवशाली ढंग से दूर किया। फिल्म के शीर्षक के अनुसार ही लंदन में इस ‘भारत’ ने भारत की सांस्कृतिक जड़ों की परतें खोलीं और यह दर्शाने का प्रयास किया कि पूरब यानी भारत की संस्कृति भले ही प्राचीन हो, पुरातन हो, परंतु आधुनिकता व अशांति को जन्म देने वाली पाश्चात्य संस्कृति से कहीं ऊपर है। भारतीय संस्कारों में व्यवहार से लेकर सदाचार और स्व-धर्म से लेकर मुक्ति तक के सिद्धांत विद्यमान हैं। फिल्म चूँकि 3 घण्टे से भी कम अवधि की होती है, अतएव संभव है कि ‘पूरब और पश्चिम’ फिल्म गोरों के समक्ष भारतीय सत्य-सनातन धर्म, संस्कृति और संस्कारों का विस्तार से ज्ञान नहीं दे सकी, परंतु इस पूरी फिल्म का निष्कर्ष यही था कि भौतिक सुख-सुविधा, देह व उसके सुख को ही सब कुछ मानने वाली, आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता की पराकाष्ठा लांघ देने वाली पश्चिमी संस्कृति की तुलना में भारतीय संस्कृति श्रेष्ठ है, जहाँ व्यक्ति को धर्म-संस्कार-संस्कृति सामाजिक मर्यादाओं से जोड़ कर रखते हैं, परंतु प्रश्न यह उठता है कि 1970 में बॉलीवुड के ‘भारत’ ने लंदन-ब्रिटेन में जिस ‘पूरब’ का बखान किया था, वह ‘पूरब’ भारत में अब भी जीवित है ?

अनियंत्रित पब्लिक मीडिया

‘सनातन संक्रांति’ की 12वीं कड़ी जब बॉलीवुड फिल्म को आधार बना कर ही लिखी जा रही है, तो अब हम आपको ये भी बता देते हैं कि ‘पूरब और पश्चिम’ फिल्म को 49 वर्ष यानी लगभग 5 दशक बीत चुके हैं। यह एक बहुत बड़ा और लम्बा काल खंड है। 1970 के भारत में जहाँ अंग्रेजी दासता से मुक्ति की नई-नई तरावट थी, वहीं 2019 का भारत सत्य-सनातन-धर्म-संस्कृति के मामलों में 70 के दशक से कई दशक नहीं, अपितु कई शताब्दी पीछे जा चुका है। कहते हैं कि जब महाभारत के युद्ध के दौरान जब कृष्ण परमात्मा गीता का महान उपदेश देते हैं, तब उपदेश देने से पूर्व ही वे यह स्पष्ट कर देते हैं, ‘हे अर्जुन ! यह परम्परा (सनातन) का ज्ञान है, जो मैंने (देहधारी कृष्ण नहीं, अपितु परमात्म रूपी तत्व) ने सबसे पहले सूर्य को दिया था। सूर्य ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को दिया था।’ अर्जुन पूछते हैं, ‘हे माधव ! आज पुन: इस ज्ञान को देने की क्यों आवश्यकता पड़ी ?’ उत्तर में कृष्ण परमात्मा कहते हैं, ‘आधुनिक युग (द्वापर) में लोग इस ज्ञान को भूल चुके हैं। इसीलिए मैं इसे दोहरा रहा हूँ।’ कलियुग के 2019 के भारत के साथ भी कुछ यही और ऐसा ही हो रहा है। भारत अपनी मूल सनातन संस्कृति से विमुख होता जा रहा है और इस विमुखता के दोषी हम सभी भारतीय हैं, जो अपनी संतानों को परंपरागत और धरोहरीय ज्ञान से वंचित रख रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी भौतिक संसाधनों को जुटाने, प्राप्त भौतिक संसाधनों में सुख की तलाश में स्व-धर्म यानी निज धर्म से भटक रही है। ऐसा नहीं है कि देश में धर्म और संस्कार का उन्मूलन हो गया है, परंतु विडंबना यह है कि धर्म स्थान बढ़ रहे हैं, धार्मिक लोग बढ़ रहे हैं, परंतु धर्म सिमट रहा है। संस्कारों में सींचा जाने वाला वास्तविक धर्म आधुनिक तथाकथित ज्ञान-विज्ञान के बोझ तले दब रहा है। आधुनिक भौतिक संसाधनों में युवा पीढ़ी पर सीधा प्रभाव डालने वाला सशक्त माध्यम है पब्लिक मीडिया (PUBLIC MEDIA)। 70 या उससे पहले दौर में जहाँ केवल सिनेमा घर और फिल्में ही पब्लिक मीडिया के दायरे में आते थे, वहीं आज पब्लिक मीडिया ने कम्प्यूटर, टेलीविज़न, मोबाइल से लेकर हर जगह अपनी पैठ बना ली है और इस पब्लिक मीडिया में ज्ञानी-अज्ञानी सभी अपना दिमागी कूड़ा उड़ेल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पब्लिक मीडिया में सब बुरा ही बुरा है। बॉलीवुड से लेकर टीवी चैनलों, न्यूज़ चैनलों पर अच्छी-अच्छी जानकारियाँ भी आती हैं, परंतु कुछ लोग बुरी बातें ही ग्रहण करते हैं और हैवानियत की हद लांघ जाते हैं। आज के दौर में कुछ फिल्में युवा पीढ़ी को नई-नई जानकारियाँ भी दे रही हैं, तो कुछ फिल्में भारत के भव्य इतिहास को उजागर कर रही हैं, परंतु इसके उलट अधिकांश पब्लिक मीडिया में केवल ऐसी प्रेरक फिल्में ही नहीं परोसी जातीं, अपितु कारोबार बढ़ाने वाले ऐसे कार्यक्रम भी परोसे जाते हैं, जिनसे युवा पीढ़ी अपनी राह से भटक रही है। मोबाइल फोन ने तो युवा पीढ़ी को मानो दिग्भ्रमित किया है। लोगों को निकट लाने वाले इस संसाधन ने दिलों को दूर किया है। आवश्यकता है इन भौतिक संसाधनों के सदुपयोग की, परंतु यह सद्बुद्धि देगा कौन ? क्योंकि बच्चे मोबाइल में व्यस्त हैं, तो माता-पिता भी उसी काम में लगे हुए हैं।

अधिनियम नहीं, अधिष्ठान से ही रुकेगी असुर वृत्ति

हैदराबाद की घटना के बाद देश भर में आक्रोश फूट पड़ा। टीवी चैनलों पर ज़ोर-शोर से चर्चाएँ छिड़ गईं। संसद में सांसदों ने बड़े-बड़े भाषण दिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की और कड़े से कड़ा क़ानून (अधिनियम) बनाने मांग की, परंतु ‘सनातन संक्रांति’ की वैचारिक क्रांति का निष्कर्ष है कि दुष्कर्मियों को दंडित करने के लिए विश्व के अनेक देशों में कठोर से कठोर यातनापूर्ण अधिनियम विद्यमान हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या कोई देश यह दावा कर सकता है कि कठोर अधिनियम के बाद उनके देश में सभी महिलाएँ सुरक्षित हैं ? वास्तव में भारतीय सनातन धर्म संस्कृति के दृष्टिकोण से गंभीरता व गूढ़तापूर्वक विचार किया जाए, तो कोई भी अधिनियम किसी को ‘धार्मिक’ नहीं बना सकता, क्योंकि बाह्य जगत में ‘धार्मिकों’ की श्रेणी में वे लोग आते हैं, जो मंदिरों में जाते हैं, तीर्थ यात्राएँ करते हैं, तीर्थ स्थानों पर जाते हैं, विभिन्न विधि-विधान से पूजा-पाठ आदि क्रियाएँ करते हैं, परंतु भारतीय अध्यात्म ज्ञान परम्परा का उद्घोष है कि कोई अधिनियम नहीं, अपितु अधिष्ठान के माध्यम से ही किसी भी व्यक्ति के मन को पूर्णत: शुद्ध किया जा सकता है। अधिष्ठान का अर्थ है देहरूपी चोले के पीछे रहा तत्व। वही अधिष्ठान है, जिस पर देह का आरोप हुआ है। हर व्यक्ति केवल और केवल अधिष्ठान के कारण देह के रूप में व्यक्त है और इसीलिए वह व्यक्ति कहलाता है, परंतु जो व्यक्ति स्वयं के अधिष्ठान स्वरूप को जान कर यह समझ लेता है कि देह केवल चोला है, वह देह से धर्म या अधर्म कर ही नहीं सकता, क्योंकि अधिष्ठान अव्यक्त है और अव्यक्त कभी कर्ता नहीं हो सकता। भारतीय वैदिक-सत्य-सनातन संस्कृति हर मानव को अधिष्ठान का अनुष्ठान करने का संदेश देती है। इतना ही नहीं, हमारी संस्कृति हमें उस अधिष्ठान यानी स्वयं को जानने के लिए किसी अधिष्ठान ज्ञाता व्यक्ति (सद्गुरु) की शरण में जाने का भी संदेश देती है, क्योंकि ज्ञाता के बिना ज्ञान संभव नहीं है। भारतीय युवा पीढ़ी यदि देह को छोड़ देह को धारण करने वाले अधिष्ठान की ओर लौटे, तो असुर वृत्ति जड़ से समाप्त हो जाएगी।

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