सनातन संक्रांति : ‘धार्मिक सिरफुटव्वल’ से मुक्ति दिलाए वही सच्चा धर्म…

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* प्रत्यक्ष को सम्मान नहीं, परोक्ष को कर रहे पूजा

* परंतु अपरोक्ष के अतिरिक्त नहीं है कोई दूजा

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 12 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। संतों की भूमि भारत कभी भी संतों से रिक्त नहीं रही। समय-समय पर समय की आवश्यकता के अनुसार परमात्मा ने स्वयं को प्रकट करने के लिए संतों के रूप में अवतार लिया और आज भी ले रहे हैं। आज भी भारत की माताएँ एक से बढ़ कर एक प्रकट परमात्मा स्वरूप संतों को जन्म दे रही हैं। विशाल भारत देश में कोने-कोने में संतों का अवतरण अनावरत रूप से हो रहा है और आगे भी होता रहेगा, क्योंकि यही परमात्मा की सबसे बड़ी विशेषता और विवशता भी है कि वह स्वयं को प्रकट करने के लिए संतों के अवतरण पर निर्भर है।

यद्यपि हम बात संतों की कर रहे हैं, इसलिए आपको यह पहले संत की परिभाषा बता देना चाहेंगे। संत वह होते हैं, जो आपके मन को कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं, द्वंद्वों, भ्रांतियों, भेदों, भयों के आवेग से मुक्त कर दें और आपके मन को शांत कर दें। मन को आत्मीय शांति देने वाला ही संत होता है। इसलिए जिस किसी व्यक्ति में, चाहे उसका देश-वेश कैसा भी हो, आपको आवेगों को शांत करने के गुण दिखाई दें, उसे आप नि:संकोच होकर संत मान लीजिएगा और जो आपकी मनोकामनाएँ पूरी करने का वादा और दावा करते हों, उन्हें भूल कर भी संत मानने की भूल न करना।

वैचारिक क्रांति के सूत्रधार युवाPRESS के ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ के भाग 13 में आज हम समग्र देश में धर्म के नाम पर हो रहे ‘प्रपंच’ पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे। गत 19 सितंबर, 2019 से आरंभ हुए ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ की 13वीं कड़ी में हम आपको यह बताने जा रहे हैं कि देश में धर्म और भक्ति के नाम पर जिस तरह का अंधाधुंध छाया हुआ है, वह मनुष्य के मन को शांत करने के स्थान पर अशांत कर रहा है। इस कड़ी में हम यह समझाने का प्रयास करेंगे कि धर्म और भक्ति के नाम पर देश में किस तरह करोड़ों रुपए का व्यय कर ‘प्रपंच और आडंबर’ किए जा रहे हैं, जो किसी को भी स्थायी शांति प्रदान नहीं कर रहे हैं।

धार्मिकों की भीड़ के बीच धर्म लुप्त !

हमारे देश में जनसंख्या के साथ-साथ धर्मस्थानों, मंदिरों, मठों, मस्जिदों, गिरजाघरों और कई तरह की नई-नई धार्मिक परम्पराएँ तीव्र गति से बढ़ रही हैं। धर्मस्थानों या तीर्थस्थानों पर लोगों की भारी भीड़ देखी जा रही है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हमारा पूरा देश ‘धार्मिक प्रवृत्ति’ का बन गया है। राम, कृष्ण, शिव, सहस्त्रों देवी-देवताओं के मंदिरों में भगवान के दर्शन के लिए लम्बी-लम्बी कतारें लगी हुई हैं। ऐसा दृश्य देख कर मन में प्रश्न उठता है कि अंतत: घर से कई किलोमीटर दूर यात्रा करके ये धार्मिक प्रवृत्ति के लोग इन धर्मस्थानों में क्या ‘लेने’ के लिए पहुँचे हैं ? वस्तुत: धर्मस्थानों पर उमड़ती यह तथाकथित धार्मिकों की भीड़ कामनाओं की दौड़ का परिणाम है। धार्मिकों की भीड़ के बीच वास्तविक धर्म लुप्त हो चुका है। जो वास्तविक धर्म जानता है, वह कभी भी इस तरह के प्रपंच में नहीं पड़ता, परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है।

धर्म-भक्ति कैसे किसी को माथाफोड़ी में डाल सकते हैं ?

आज धर्म और भक्ति के नाम पर पूरे देश में बड़े महानगरों, छोटे नगरों से लेकर गाँव-गाँव में अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। कार्यक्रम शब्द में ही कार्य निहित है। अब जब कार्य ही करना है, तो क्रम का बंधन क्यों ? कार्य और क्रम का बंधन होते ही धर्म लुप्त हो जाता है, क्योंकि धर्म या भक्ति कभी भी किसी को माथाफोड़ी में डालने का काम नहीं कर सकते। हमारे देश में हुए सहस्त्रों संतों और महापुरुषों ने कहा है कि उस धर्म और भक्ति के माध्यम से कभी भी वास्तविक ईश्वर-इष्ट देव की प्राप्ति नहीं हो सकती, जिसमें क्रियाओं का अंबार हो। आज समाज में विशेष रूप से घरों से लेकर धर्म स्थानों, मंदिरों, मस्जिदों तक में जिस प्रकार वास्तविक धर्म-भक्ति के अज्ञान के अंधकार में डूबे लोग जो-जो भी क्रिया-कार्य-क्रम कर रहे हैं, वे वास्तविक परमात्मा या ईश्वर से कोसों दूर हैं, क्योंकि धर्म और भक्ति कोई क्रिया-कार्य-क्रम के दायरे में आती ही नहीं है। यदि धर्म और भक्ति के नाम पर आप तरह-तरह की क्रियाएँ कर रहे हैं, तो यह स्पष्ट रूप से समझ लें कि आपकी धर्म और भक्ति की न दिशा और न ही दशा उचित है। वास्तव में धर्म और भक्ति कुछ करने या कुछ पाने के लिए की जाने वाली क्रिया नहीं, अपितु एक अवस्था है। धर्म वह है, जो आपको अपने निज-धर्म से जोड़े और भक्ति वह है, जो आपको अपने निज-स्वरूप की ओर ले जाए। धर्म और भक्ति के माध्यम से बाह्य वृत्तियों को निज स्वरूप में स्थित करना होता है, न कि वृत्तियों को विभिन्न क्रिया-क्रलापों में जोड़ कर प्रवृत्ति रूपी प्रपंच में पड़ना।

द्वंद्व से मुक्त धर्म-भक्ति कराती है अपरोक्षानुभूति

आपने अपने शिक्षा काल में विशेष रूप से मातृभाषा विषय में अक्सर द्वंद्व शब्द सुना होगा। द्वंद्व का अर्थ ही होता है दो विरोधाभासी शब्द, जैसे सुख-दु:ख, आशा-निराशा, राग-द्वेष, लाभ-हानि, मान-अपमान आदि। इन्हीं शब्दों की कड़ी में आपने प्रत्यक्ष का विरोधाभासी शब्द अप्रत्यक्ष या परोक्ष पढ़ा होगा, परंतु क्या आपने अपरोक्ष शब्द के बारे में सुना, जाना या समझा है। यदि हाँ, तो यह जानने का प्रयास किया है कि प्रत्यक्ष-परोक्ष के द्वंद्व से परे अर्थात् अपरोक्ष क्या है और क्यों वह द्वंद्व में शामिल नहीं अर्थात् निर्द्वंद्व है ? वास्तव में हमारे साथ ‘अन्याय’ यह हुआ और हो रहा है कि हम परम्पराओं को आगे बढ़ाने वाले द्योतक मात्र बन कर रह गए हैं। इसीलिए विधि-विधान, यात्रा, दर्शन, भोग, चढ़ावा, यज्ञ, अनुष्ठान आदि को ही धर्म व भक्ति मान चुके हैं। यही कारण है कि प्रत्यक्ष संतों को न परख पाते हैं, न सम्मान कर पाते हैं और न ही उनसे कुछ अर्जित कर पाते हैं, क्योंकि हम परोक्ष अर्थात् ‘हो चुके’ महापुरुषों की प्रतीकोपासना में डूबे रहते हैं, परंतु वास्तविक धर्म और भक्ति वह है, जो आपको ‘बोझिल’ क्रिया-कलापों और ‘सिरफुटव्वल, माथाफोड़ी तथा आडंबरों’ से मुक्त कराए और यह तभी संभव है, जब आप प्रत्यक्ष और परोक्ष से परे अपरोक्ष की अनुभूति करें।

कौन है अपरोक्ष और क्या है अपरोक्षानुभूति ?

अब आप सोच होंगे कि यह अपरोक्ष क्या है, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष से परे है ? यह अपरोक्ष आप, मैं और हम स्वयं हैं। उदाहरण से समझिए। यदि कोई व्यक्ति गुड़ दिखाए और फिर खाकर उसके स्वाद का वर्णन करे, तो वर्णन सुनने वाले के लिए गुड़ प्रत्यक्ष है और स्वाद परोक्ष (अप्रत्यक्ष), परंतु वर्णन सुनने वाला स्वयं गुड़ खाए और उसका स्वाद की अनुभूति करे, तो वही प्रत्यक्ष गुड़ और परोक्ष स्वाद अपरोक्षानुभूति में बदल जाता है। जब आप स्वयं गुड़ खाकर उसका स्वाद जानें, तभी आप भी दावे के साथ कह पाएँगे कि गुड़ मीठा है। धर्म और भक्ति में भी इंसान को यही करना है। गुड़ रूपी प्रत्यक्ष संतों या सद्गुरुओं के सान्निध्य में जाकर परोक्ष रूपी आत्मा अर्थात् स्वयं को जानने का मार्गदर्शन प्राप्त करें और जब जान लें कि उस स्वयं को जान लें, उसे ही अपरोक्षानुभूति कहा जाता है। इसीलिए सभी धर्म-शास्त्रों तथा संतों-ज्ञानियों-महापुरुषों ने स्पष्ट उद्घोष किया है कि ईश्वर, भगवान, देवी-देवता का कभी भी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता। ईश्वर अनुभूति का विषय है, दर्शन का नहीं और यह अनुभूति निर्मल चित्त में ही होती है। मल-विक्षेप-आवरण दोष दूर होने के बाद ईश्वर की अपरोक्षानुभूति यानी चित्त में अनुभूति होती है। एक बार अपरोक्षानुभूति हो जाने के बाद वही ईश्वर व्यक्ति को कण-कण में व्यापक दिखाई देने लगता है, जहाँ उसके लिए इस संसार में उसे उसके अतिरिक्त कोई द्वितीय दिखाई ही नहीं देता। यह एक अवस्था होती है, जो सद्गुरु के सान्निध्य में ही प्राप्त की जा सकती है।

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस प्रथम भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

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