सनातन संक्रांति : ठाकुर का नहीं हुआ होगा पुनर्जन्म, क्योंकि धर्म युद्ध में प्राण देने वाला छूट जाता है इस चक्रव्यूह से…

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 19 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। सनातन धर्म, वैदिक धर्म, वेद-वेदांत, पुराणों, उपनिषदों से लेकर श्रीमद् भागवद गीता सहित कोई भी धर्म ग्रंथ उठा लीजिए। प्रत्येक धर्म ग्रंथ चीख-चीख कर कहता है कि जब तक हमारे मन में इच्छाएँ हैं, तब तक आपका पुनर्जन्म निश्चित है। हम यह बात इसलिए समझ सकते हैं, क्योंकि हम मनुष्य हैं। शेष 83 लाख 99 हजार 999 योनियों के जीव यह बात नहीं समझ सकते। वे केवल अपने पूर्व जन्मों के कर्मों को काट रहे हैं। हाँ, उनके साथ एक प्लस पॉइंट यह है कि वे नए कर्म नहीं बना रहे और ईश्वर की कृपा तथा कर्मफल के अनुसार कभी न कभी हमारी तरह मनुष्य योनि को प्राप्त होंगे। दूसरी तरफ हमारे पास तो तीन प्लस पॉइंट हैं। पहला यह कि हम अच्छे कर्म करके पुण्यगति को प्राप्त होकर पुन: मनुष्य बनें। दूसरा यह कि हम बुरे कर्मों में फँसे रहें और 83 लाख 99 हजार 999 योनियों में से किसी एक योनि को प्राप्त हों। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्लस पॉइंट हमारे पास यह है कि हम इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाएँ। यह अवसर केवल मनुष्य योनि को ही प्राप्त और सुलभ है। चयन हमें करना है कि हमें सुख-दु:ख, राग-द्वेष, हर्ष-शोक-विषाद, मान-अपमान जैसे द्वंद्वों से भरे जन्मों के चक्रव्यूह में घूमते रहना है या फिर इससे मुक्त हो जाना है।

युवाPRESS के साप्ताहिक स्तंभ ‘सनातन संक्रांति’ के भाग 14 में आज हम जन्म-मृत्यु के चक्रव्यूह से मुक्त होने के मार्ग की चर्चा करेंगे और ऐसे ही एक वास्तविक पुरुष का परिचय भी कराएँगे, जो कदाचित राष्ट्र के लिए बलिदान देने के साथ-साथ जन्म-मृत्यु के चक्रव्यूह से मुक्त भी हुआ। वास्तव में जन्म-मृत्यु का कारण हमारी इच्छाएँ हैं, हमारी क्रियाएँ हैं, हमारे सकाम कर्म हैं। बस, निष्काम कर्म करना आरंभ कर दीजिए। आन पड़ा कर्म कीजिए। सहज कर्म कीजिए। जैसे आप सहजतापूर्वक गहरी नींद में सो जाते हैं। जैसे साँसें सहजतापूर्वक आवागमन करती हैं। जैसे सहजतापूर्वक हम नींद से जाग जाते हैं। हमारे जीवन के सारे कार्य इसी तरह सहज हों, राग-द्वेष, पाप-पुण्य जैसी कामनाओं के जैसे द्वंद्वों से मुक्त हों, तो निष्काम कर्म करना अत्यंत आसान हो जाएगा।

गत 19 सितंबर, 2019 से आरंभ हुए ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ की आज 14वीं कड़ी है और संयोग से आज ठाकुर रोशन सिंह का 92वाँ बलिदान दिवस भी है। सामान्य अवधारण यही है कि आत्म-ज्ञान, आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति का मार्ग अध्यात्म कोई ऐसा मार्ग है, जहाँ जप-तप-पूजा-पाठ-मंत्र-यम-नियम आदि करने पड़ते हैं, जहाँ भगवा धारण करना पड़ता है, जहाँ संन्यासी बनना पड़ता है, जंगल-हिमालय की गोद में चले जाना पड़ता है। यह सब भ्रांति है। महान संत ओशो तो यहाँ तक कहते थे, ‘मैं ऐसे संन्यासी देखना चाहता हूँ, जो खेतों में हल चलाते हों, गृहस्थ जीवन में सारे कर्तव्य-कर्म करते हों।’ वास्तव में संत उसे ही कहा जाता है, जो संसार में रह कर निर्लिप्त हो। ठाकुर रोशन सिंह भी एक ऐसे ही संन्यासी थे, जो कर्म से क्रांतिकारी थे, परंतु धर्म से निज-स्वरूप में स्थित थे।

मृत्यु से पहले मुक्त हो चुके थे ठाकुर

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दृष्टिकोण से देखें, तो ठाकुर रोशन सिंह महान क्रांतिकारी थे, परंतु उनकी मानसिक भूमिका को देखते हुए आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विचार करने पर सहज ही अनुभूति होती है कि ठाकुर रोशन सिंह न केवल क्रांतिकारी थे, अपितु संन्यासी क्रांतिकारी थे। ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसंबर, 1927 को तत्कालीन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की मलाका जेल में फाँसी के फंदे पर लटका दिया गया था। अंग्रेज़़ी हुक़ूमत के दृष्टिकोण से ठाकुर काकोरी ट्रेन लूट कांड के अपराधी थे और इसीलिए उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई थी। उस समय ठाकुर की आयु मात्र 35 वर्ष थी, परंतु इसके पश्चात् भी उन्हें उन नवयुवकों को मिली फाँसी की सजा पर था, जिन्होंने अभी अपना जीवन पूरी तरह जिया भी नहीं है। ठाकुर रोशन सिंह की इस सुदृढ़ मनोदशा का कारण उनकी मुक्त दशा थी। जो पहले ही मुक्त हो चुका हो, उसे कोई फाँसी भला कैसे मृत्यु की सजा दे सकती है। ठाकुर की ऊँची आध्यात्मिक मानसिक भूमिका का उनके एक पत्र से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फाँसी से 13 दिन पूर्व यानी 6 दिसंबर, 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल की काल कोठरी से ठाकुर रोशन सिंह ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा, ‘एक सप्ताह के भीतर ही फ़ाँसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज़ हरगिज़ न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना ज़रूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए। ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। इस बीच ईश्वर भजन का ख़ूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की ज़िंदगी जीने के लिए जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की…।’ पत्र समाप्त करने के पश्चात् उसके अंत में ठाकुर रोशन सिंह ने अपना शेर भी लिखा, ‘..ज़िंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन ..वरना कितने ही यहाँ रोज़ फ़ना होते हैं..।’

जब योगी की भाँति फाँसी के फंदे पर चढ़ गए ठाकुर

इस पत्र से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि ठाकुर रोशन सिंह मुक्त दशा को प्राप्त हो चुके थे। यदि सनातन धर्म में मोहमुक्ति को ही पुनर्जन्म से मुक्ति कहा जाता है, तो फाँसी के फंदे पर झूलने से पहले ठाकुर रोशन सिंह इसी दशा में थे और निश्चित रूप से उन्होंने पुनर्जन्म के चक्रव्यूह से मुक्ति पा ली होगी। काकोरी कांड को लेकर फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद ठाकुर रोशन सिंह को मलाका जेल में रखा गया। उन्हें फाँसी देने में अंग्रेजों ने 8 महीने लगा दिए, ताकि वे उनके साथ अमानुषी व्यवहार कर सकें। जब फाँसी की पूर्व रात्रि यानी 18 दिसंबर, 1927 को ठाकुर कुछ घण्टे ही सोए। वे तनिक भी व्याकुल नहीं थे। अविचलित थे। ईश्वर भजन कर रहे थे। फाँसी की तारीख़ यानी 19 दिसंबर, 1927 की सुबह ठाकुर रोशन सिंह ने यथानियम ध्यान किया, गीता पाठ किया और फिर पहरेदार से कहा, ‘चलो।’ पहरेदार आश्चर्य से ठाकुर को देखने लगा। कदाचित उसके मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि यह कोई आदमी है या देवता ? उन्होंने अपनी काल कोठरी को प्रणाम किया और श्रीमद् भगवद् गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फाँसी घर की ओर चल दिए। फाँसी के फंदे को चूमा, फिर जोर से तीन बार ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष किया। ‘वेद मंत्र’ का जाप करते हुए वे 19 दिसम्बर, 1927 को फंदे से झूल गए। उस समय वे इतने निर्विकार थे, जैसे कोई योगी सहज भाव से अपनी साधना कर रहा हो।

कौन थे ‘संन्यासी’ क्रांतिकारी ठाकुर ?

ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी, 1892 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर स्थित नबादा में हुआ था। माता कौशल्या देवी व पिता ठाकुर जंगी सिंह सहित पूरा परिवार आर्य समाज से अनुप्राणित था। पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े ठाकुर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और बरेली तथा शाहजहाँपुर के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को इससे जोड़ने में अद्भुत योगदान दिया। आर्य समाजी पारिवारिक विरासत से सम्पन्न ठाकुर हिन्दू धर्म, आर्य संस्कृति, भारतीय स्वाधीनता और क्रांति के विषय में सदैव पढ़ते व सुनते रहते थे। ईश्वर पर उनकी आगाध श्रद्धा थी। हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेज़ी इन सभी भाषाओं को सीखने के वे बराबर प्रयत्न करते रहते थे। स्वस्थ, लम्बे, तगड़े सबल शारीर के भीतर स्थिर उनका हृदय और मस्तिष्क भी उतना ही सबल और विशाल था। असहयोग आंदोलन के बाद ठाकुर ने क्रांति का पथ चुना और रामप्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में आए, जो काकोरी कांड में कर्ताओं में से एक थे। काकोरी कांड में ठाकुर भी शामिल थे और इसीलिए उन्हें 26 सितंबर, 1925 को ग़िरफ़्तार किया गया था। अंग्रेजों ने ठाकुर को जेल में डाल दिया। इस दौरान उन्हें अंग्रेजों का मुखबिर बनने की पेशकश की गई, परंतु राष्ट्रप्रेमी ठाकुर राष्ट्रद्रोही कैसे बन सकते थे ? ठाकुर रोशन सिंह ‘ॐ’ मंत्र के अनन्य उपासक थे। यही कारण है कि ठाकुर रोशन सिंह का पूरा जीवन आध्यात्मिक था। मरते वक्त वे जिस दशा में थे, वह दशा हर व्यक्ति अपने कर्तव्य-कर्मों को करते हुए पा सकता है। ठाकुर ने अपने कर्तव्य-कर्म यानी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते हुए अध्यात्म की वह साधना की, जो उन्हें मुक्ति दिला गई।

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस प्रथम भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा। (गुरु अर्पण)

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