सनातन संक्रांति : हे राम ! हम INDIANS होकर भी ‘उल्टे पेड़’ के नीचे ‘सोए’ हुए हैं !

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 17 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। ‘सनातन संक्रांति’ आज गुरुवार को पाँचवीं कड़ी की ओर अग्रसर है। गत 19 सितम्बर, 2019 गुरुवार से आरंभ हुए युवाPRESS के ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ का उद्देश्य प्रत्येक भारतीय ही नहीं, अपितु प्रत्येक वैश्विक नागरिक को सनातन शब्द के वास्तविक अर्थ तक ले जाना है। सनातन शब्द का वास्तविक अर्थ है, वह जो सदा था, सदा है और सदा रहेगा, वही सनातन है। वह, जिसका न कोई आरंभ है और न ही कोई अंत, वही सनातन है। शेष ‘सभी’ आदि और अंत वाले हैं। ‘सनातन संक्रांति’ का उद्घोष वर्तमान आधुनिक-वैज्ञानिक युग की आपाधापी में उलझ चुके लोगों का उसी ‘सनातन’ में ‘संक्रमण’ (प्रवेश) कराने का है।

‘सनातन संक्रांति’ की आज की 5वीं कड़ी में हम एक ऐसे पेड़ का विवरण देने जा रहे हैं, जो किसी भूमि में नहीं उगता या उग सकता, क्योंकि भूमि पर लगे हर पेड़ की जड़ भूमि के भीतर होती है। भारतीय सनातन धर्म में वानस्पतिक योनि को उद्भिज कहा गया है। उद्+भिद् (भूमि फाड़ कर) और क्विप+जन् (उत्पन्न होना) अक्षरों से मिल कर बने उद्भिज का अर्थ होता है, जो भूमि को चीर कर पृथ्वी की सतह पर आए और स्वयं का विस्तार करे, जैसा कि सभी पेड़-पौधा-लता करते हैं। स्पष्ट है कि उद्भिज योनि की उत्पत्तियों यानी पेड़-पौधों-लताओं का मूल (जड़) भूमिगत होता है, जबकि तना, शाखाएँ, पत्तियाँ, पुष्प व फल आदि पृथ्वी की सतह पर होती हैं, परंतु हम जिस पेड़ की बात करने जा रहे हैं, उसका वर्णन जानने के बाद आप उसे उद्भिज नहीं कह पाएँगे, अपितु ‘उल्टा पेड़’ कहेंगे, क्योंकि यह पेड़ भूमि को चीर कर नहीं उगा है, बल्कि महाकाश से इसकी उत्पत्ति हुई है। इसीलिए हम इसे ऊर्ध्विज कह सकते हैं। आप सोच रहे होंगे कि यह महाकाश क्या है ? महाकाश हमें दिखाई देने वाला कोई साधारण आकाश नहीं है। वास्तव में आकाश एक रिक्त स्थान है, जिसमें खोखलापन है। जिसमें खोखलापन होता है, उसमें कोई भी वस्तु समा सकती है। उदाहरण के लिए मिट्टी का एक खाली घड़ा ही ले लीजिए। इस घड़े के भीतर जो खालीपन/खोखलापन या अवकाश है, वही आकाश है, परंतु यह घड़ा जहाँ है, वह स्थान भी खोखला ही होगा, तभी तो घड़ा वहाँ है। बस, जिस प्रकार घड़े के भीतर का अवकाश आकाश कहलाता है, उसी प्रकार घड़ा जिस अवकाश में है, उस अवकाश को महाकाश कहा जाता है अर्थात् महाकाश वह है, जो स्वयं में आकाश को भी समाए हुए है।

पुन: लौटते हैं ‘उल्टे पेड़’ पर। इस पेड़ को ‘उल्टा पेड़’ इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि इसका मूल (जड़) भूमि में नहीं, अपितु महाकाश में है। श्रीमद् भगवद गीता में अध्याय 15 ‘पुरुषोत्तम योग’ के श्लोक 1 और 2 में इस ‘उल्टे पेड़’ का श्री कृष्ण परमात्मा ने उल्लेख किया है। यद्यपि श्री कृष्ण ने अपने श्लोक में जिस पेड़ की परिकल्पना प्रस्तुत कर अर्जुन को जगत से लेकर जगत+नाथ यानी जगन्नाथ का वर्णन किया है, उस पेड़ को ‘ऊर्ध्व मूलम्’ की संज्ञा दी है। ऊर्ध्व मूलम् अर्थात् ऐसा पेड़, जिसकी जड़ ऊपर (महाकाश में) है, जबकि तना, शाखा, पत्तियों, पुष्पों और फलों आदि के रूप में उसका विस्तार भूमि पर है। प्रकृति में विद्यमान व दृश्य पेड़ों से पूर्णत: विपरीत होने के कारण ही हमने इस पेड़ को ‘उल्टा पेड़’ कहा है। पहले आपको ये बता देते हैं कि श्रीमद् भगवद् गीता में जगद्गुरु (जगत्+गुरु) श्री कृष्ण परमात्मा ने ऊर्ध्व मूलम् के विषय में क्या कहा है।

श्री भगवान उवाच् :

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

अनुवाद : (ऊर्ध्वमूलम्) ऊपर को पूर्ण परमात्मा आदि पुरुष परमेश्वर रूपी जड़ वाला, (अधःशाखम्) नीचे को तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु व तमगुण शिव रूपी शाखाओं वाला, (अव्ययम्) अविनाशी (अश्वत्थम्) विस्तारित पीपल का वृक्ष है, (यस्य) जिसके (छंदांसि) जैसे वेद में छंद हैं, ऐसे संसार रूपी वृक्ष के भी विभाग छोटे-छोटे भाग या टहनियाँ व (पर्णानि) पत्ते (प्राहुः) कहे हैं, (तम्) उस संसार रूपी वृक्ष को (यः), जो (वेद) इसे विस्तार से जानता है (सः), वह (वेदवित्) पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी है।

श्री भगवान उवाच् :

अधः, च, ऊध्र्वम्, प्रसृताः, तस्य, शाखाः, गुणप्रवृद्धाः,
विषयप्रवालाः, अधः, च, मूलानि, अनुसन्ततानि, कर्मानुबन्धीनि, मनुष्यलोके।।2।।

अनुवाद : (तस्य) उस वृक्ष की (अधः) नीचे (च) और (ऊर्ध्वम्) ऊपर (गुणप्रवृद्धाः) तीनों गुणों ब्रह्मा-रजगुण, विष्णु-सतगुण, शिव-तमगुण रूपी (प्रसृता) फैली हुई (विषयप्रवालाः) विकार- काम क्रोध, मोह, लोभ अहंकार रूपी कोपल (शाखा:) टहनियाँ ब्रह्मा, विष्णु, शिव (कर्मानुबन्धीनि) जीव को कर्मों में बाँधने की (मूलानि) जड़ें मुख्य कारण हैं (च) तथा (मनुष्यलोके) मनुष्यलोक (स्वर्गलोक-नर्कलोक-पृथ्वीलोक) में (अधः) नीचे – नर्क, चैरासी लाख योनियों में ऊपर स्वर्ग लोक आदि में (अनुसन्ततानि) व्यवस्थित किए हुए हैं। (2)

घोर आश्चर्य : अस्वस्थ ‘उल्टे पेड़’ पर लटकी दुनिया

कृष्ण परमात्मा ने गीता में अर्जुन के समक्ष इन दोनों श्लोकों के माध्यम से स्पष्ट संकेत दिया है कि ‘उल्टे पेड़’ का मायारूपी विस्तार अस्वस्थ है, नश्वर है, जबकि मूल यानी जड़ शाश्वत है। कृष्ण परमात्मा अर्जुन का आह्वान करते हैं, अर्जुन को ललकारते हैं, ‘हे अर्जुन ! इस अस्वस्थ वृक्ष को तो वैराग्य रूपी खड़ग (तलवार) से एक ही झटके में काट दे और शाश्वत जड़ तक पहुँच जा।’ कृष्ण परमात्मा का यह उद्घोष केवल अर्जुन के लिए नहीं, अपितु समग्र मानव जाति के लिए है। आज पूरी दुनिया इस अस्वस्थ ‘उल्टे पेड़’ पर लटक गई है और शाश्वत जड़ से भटक गई है। कृष्ण परमात्मा का स्पष्ट उद्घोष है कि संसार में विद्यमान, परंतु अदृश्य इस ‘उल्टे पेड़’ में माया और मायापति (परमात्मा) दोनों हैं, परंतु भौतिक सुखों के पीछे अंधी दौड़ लगा रहे लोग कृष्ण परमात्मा के बताए अस्वस्थ ‘उल्टे पेड़’ के तने, टहनियों, पत्तों, पुष्पों, फलों में उलझ गए हैं और यह ऐसे उलझ गए हैं कि इस ‘उल्टे पेड़’ की ऊपर की ओर व्याप्त शाश्वत जड़ की ओर कभी ध्यान ही नहीं दे पाते। कृष्ण का उद्घोष है कि जो मनुष्य इस ऊर्ध्व मूलम् पेड़ के तना, शाखा, टहनियों, पुष्पों-फलों से लिपटा रहेगा, वह कभी भी ऊर्ध्व मूल तक नहीं पहुँच सकेगा, जो एकमात्र शाश्वत है। वैसे यह पूरा ‘उल्टा पेड़’ शाश्वत बताया गया है, क्योंकि यह आदि-अनादि से चला आ रहा है और अनंत तक रहेगा, परंतु जो व्यक्ति ‘उल्टे पेड़’ के दृश्यमान व अस्वस्थ विस्तार (भागों) को वैराग्य रूपी खड़ग से एक ही झटके में काट देगा, वही इसकी शाश्वत जड़ को प्राप्त हो पाएगा।

हम ‘INDIAN’ होकर भी ‘सोए’ क्यों रहें ?

‘उल्टे पेड़’ के माध्यम से कृष्ण परमात्मा ने समस्त विश्व को उसकी महाकाश तक फैली शाश्वत जड़ तक जाने का मार्ग दिखाया है, परंतु वर्तमान युग विशेषकर पश्चिमी संस्कृति के रंग में रंगे भारत सहित समूचे विश्व के लोग केवल और केवल इस ‘उल्टे पेड़’ के मायावी रूप में उलझे हुए हैं, जबकि उस माया के सर्जनहार मायापति अर्थात् इस ‘उल्टे पेड़’ की शाश्वत जड़ तक जाने की आवश्यकता है। एक इंडियन यानी भारतीय होने के नाते क्या हमें इस बात पर गर्व नहीं करना चाहिए कि मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य अर्थात् मुक्ति, मोक्ष, जीवनमुक्त दशा, ज्ञान प्राप्ति, आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर से एकाकार होने का महान उपदेश हमारी भारतीय भूमि पर स्वयं भगवान विष्णु ने कृष्ण का अवतार लेकर हम तक पहुँचाया ? क्या हमें गीता के इस 15वें अध्याय के इन 2 श्लोकों को अपने जीवन में नहीं उतारना चाहिए, जो हमें मायापति ईश्वर के नश्वर मायावी साम्राज्य से निकाल कर स्वयं मायापति तक पहुँचने का आदेश देते हैं ? पूरी दुनिया तो इस ‘उल्टे पेड़’ के नीचे सोई हुई है अर्थात् माया रूपी विकारों, आकर्षणों, सुख-दु:खादि द्वैतों में खोई हुई है, परंतु हम भारतीय होकर भारतीय भूमि पर स्वयं हमारे आराध्य भगवान श्री कृष्ण के बताए ‘उल्टे पेड़’ की अस्वस्थ, बाह्य व मायावी छाया में क्यों सोए हुए हैं ? क्या एक भारतीय होने के नाते हमें इन 2 श्लोकों को आधार बना कर इस ‘उल्टे पेड़’ की ऊपर रही जड़ तक पहुँचने के लिए पुरुषार्थ नहीं करना चाहिए ? आज की दुनिया को देख कर आश्चर्य होता है, तो भारतीयों की अपनी सनातन संस्कृति से विमुखता को देख कर घोर आश्चर्य होता है कि हम हमारी ही धरती पर अपने ही आराध्य भगवान श्री कृष्ण के बताए ‘उल्टे पेड़’ की शाश्वत जड़ को जानने का प्रयास तो क्या, उस ओर ध्यान देने का समय भी नहीं निकालते।

क्या है ‘उल्टे पेड़’ की जड़ और कैसे पहुँचा जाए उस तक ?

इस ‘उल्टे पेड़’ की जड़ को जानने का अर्थ है स्वयं को जान लेना। दुनिया भर की जानकारियों का बोझा ढोते हुए स्वयं को ‘ज्ञानी’ कहलाने वाला हर व्यक्ति तब तक ‘अज्ञानी’ और ‘अपूर्ण’ है, जब तक कि वह स्वयं को जान नहीं लेता। भारतीय सनातन धर्म में मानव जीवन के जो चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं, उनमें से केवल अर्थ और काम ही ऐसे पुरुषार्थ हैं, जो एक निश्चित आयु में करने होते हैं, जबकि धर्म और मोक्ष ऐसे पुरुषार्थ हैं, जिनके लिए कोई आयु सीमा नहीं होती, क्योंकि धर्म वह है, जो मनुष्य जन्म लेने के साथ ही धारण कर लेता है। इस धर्म से तात्पर्य वर्तमान युग में प्रचलित हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी, जैन आदि सम्प्रदायों से नहीं, अपितु स्व-धर्म से है। मनुष्य सहित सभी प्राणी जन्म लेने के साथ ही श्वास लेने का प्रथम कर्म करते हैं और जीवन यापन के बाद श्वास छोड़ने का अंतिम कर्म करतें है, क्योंकि यही सबका धर्म है और जन्म से मृत्यु के बीच जो जीवनकाल है, उसमें भी सभी प्राणी जो अच्छे-बुरे जो कर्म करते हैं, वही उनका धर्म होता है। इसके अतिरिक्त और कोई धर्म इस समग्र ब्रह्मांड में नहीं है। इसी प्रकार मोक्ष प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करने की भी कोई आयु नहीं होती। साधारणत: यह भ्रांति है कि धर्म, अर्थ और काम के बाद अंतकाल (मृत्यु से पूर्व) मोक्ष पुरुषार्थ कर लेंगे, परंतु वास्तविकता यह है कि चारों पुरुषार्थों का प्रथम और अंतिम लक्ष्य मोक्ष है और धर्म, अर्थ व काम पुरुषार्थ करते हुए ही मोक्ष पुरुषार्थ भी करना चाहिए, न कि मृत्यु के समय। इसीलिए भारतीय भूमि पर जन्मे अधिकांश विवेकशील पुरुषों और संतों ने मोक्ष पुरुषार्थ के लिए कोई निश्चित आयु निर्धारित नहीं की। जिसका जिस आयु में विवेक जागा, उसने उसी आयु में मोक्ष पुरुषार्थ आरंभ कर दिया। कृष्ण परमात्मा ने ‘उल्टे पेड़’ की मोक्ष रूपी जिस जड़ की परिकल्पना प्रस्तुत की है, वह स्वयं आप हैं, मैं हूँ। हमें स्वयं को ही जानना है। स्वयं से साक्षात्कार ही ‘उल्टे पेड़’ की जड़ है। ‘उल्टे पेड़’ की जड़ यानी मूल तत्व को जानने वाले को ही वास्तविक ‘ज्ञानी’, ‘मुक्त’, ‘मोक्ष प्राप्त’, ‘संत’, ‘जीवनमुक्त पुरुष’, ‘ब्रह्मविद्’, ‘ब्राह्मण’, ‘तत्ववेत्ता’, ‘तत्वज्ञानी’ आदि कहा जाता है। एक और भ्रांति दूर करना चाहेंगे कि यह मोक्ष कोई वस्तु नहीं है, अपितु अवस्था है और यह केवल जीवित मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है। यदि जीते-जी मोक्ष दशा प्राप्त नहीं कर पाए, तो मृत्यु के बाद पुनर्जन्म अवश्यंभावी है। मृत्यु के बाद किसी को मोक्ष नहीं मिलता। इतना ही नहीं मृतक के परिजनों द्वारा मृतक की आत्मा की ‘तथाकथित शांति’ के लिए किए जाने वाले किसी भी लौकिक कर्मकांड से भी मृतक को मोक्ष मिलना असंभव है। अत: परम आनंद स्वरूप इस मोक्ष दशा को प्राप्त करना है, तो आज ही इस ‘उल्टे पेड़’ की सभी अस्वस्थ शाखाओं को एक झटके में काट दीजिए। इसके साथ ही आपका मोक्ष पुरुषार्थ आरंभ हो जाएगा। इसके लिए न तो संन्यासी बनना है, न घर-द्वार छोड़ना है, न हिमालय की गुफा में बैठना है और न ही किसी भी रंग का कोई चोला धारण करना है। केवल एक ज्ञानी पुरुष की शरण लेनी है, जो आपको यह मुक्ति पद दिलाएगा और शेष जीवन परम आनंद से भर देगा।

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस प्रथम भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

(गुरु अर्पण)

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