सनातन संक्रांति : क्या है वह कर्म, जो ‘कुछ’ न करते हुए भी ‘कर्मयोगी’ बनाता है ?

Written by

मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 26 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। yuvapress.com की ओर से 19 सितंबर, 2019 गुरुवार से आरंभ की गई ‘सनातन संक्रांति’ की श्रृंखला अब अगले चरणों की ओर अग्रसर होने जा रही है। पहली कड़ी में ‘सनातन संक्रांति’ ने प्रत्येक मनुष्य के जीवन के प्रथम, अंतिम और परम् लक्ष्य के विषय में प्रकाश डालने का प्रयास किया गया था। यद्यपि अभी भी किसी के मन में मानव जीवन के प्रथम, अंतिम और परम् लक्ष्य को लेकर कोई संशय रह गया हो, तो पुन: स्मरण करा देना चाहूँगा कि मानव जीवन का यह प्रथम, अंतिम और परम् लक्ष्य है मोक्ष। यह भी स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो मरने के बाद प्राप्त की जा सके। मोक्ष, मुक्ति या जीवनमुक्ति एक दशा, एक अवस्था का नाम है। इस दशा को प्राप्त करना ही मोक्ष है, जो केवल और केवल जीते-जी ही प्राप्त की जा सकती है।

आज गुरुवार यानी गुरु का दिन है और ‘सनातन संक्रांति’ की श्रृंखला अगली कड़ी की ओर बढ़ रही है। आज की इस दूसरी कड़ी का विषय है कर्म, जो क्रियाकलापों से परे होता है, जो कर्मयोगी बनाता है और जो मानव जीवन के परम् लक्ष्य मोक्ष दशा तक ले जाता है। भारतीय वैदिक धर्म में मानव जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। पहले आप यह समझ लीजिए कि पुरुषार्थ किसे कहते हैं ? साधारण व्यवहार में पुरुषार्थ को लोग परिश्रम, प्रयास आदि से जोड़ कर देखते हैं, परंतु यह वास्तविकता नहीं है। पुरुषार्थ में पुरुष शब्द समाहित है। इसका यह अर्थ नहीं है कि यहाँ बात केवल पुरुषों के लिए की जा रही है। पुरुषार्थ यानी स्वयं को पुरुष सार्थक करना है। अब पुरुष कौन है ? इसका उत्तर है, जीव सृष्टि में विद्यमान मानव सहित कोई भी प्राणी पुरुष नहीं है। प्रत्येक प्राणी प्रकृति है, जो पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से निर्मित है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस समस्त पृथ्वी पर पुरुष कोई नहीं, अपितु सभी प्रकृति (जिसे आप स्त्री-मादा भी कह सकते हैं) हैं। 5 महाभूतों से बने सभी प्रकृति रूपी प्राणी जिसके कारण, जिस तत्व के आधार पर, जिस तत्व के बल और जिस तत्व के माध्यम से सक्रिय हैं, चेतनाशील हैं, वह तत्व ही पुरुष है।

इस पूरे वृत्तांत का सार यही है कि समस्त ब्रह्मांड में पुरुष एकमात्र वह तत्व है। उस तत्व का कोई नाम, रूप या आकार नहीं है। फिर भी इसकी अनुभूति की जा सकती है और यह अनुभूति करने का सामर्थ्य 84 लाख योनियों में से एकमात्र मानव योनि के जीवों को ही प्रदान किया गया है। यह सत्य है कि केवल मानव ही इस पुरुष रूपी तत्व की अनुभूति करने में समर्थ है, परंतु उससे भी बड़ा सत्य, आश्चर्य और विशिष्टता यह है कि मानव इस पुरुष रूपी तत्व को पंचमहाभूत से बने अपने शरीर, उसमें विद्यमान 5 इंद्रियों या उन इंद्रियों को प्रेरित करने वाले मन के माध्यम से नहीं जान सकता, परंतु हाँ ये सभी उस पुरुष को जानने के साधन अवश्य बन सकते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि अंतत: उस पुरुष यानी तत्व को जाने कैसें ? इसीलिए भारतीय सनातन धर्म में मानव जीवन का परम लक्ष्य उस पुरुष को जानना निर्धारित किया है और इसीलिए उसे जाने के लिए किए जाने वाले कर्म को पुरुषार्थ कहा गया है। सनातन धर्म में उस पुरुष को जानने के लिए 4 पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताए गए हैं। आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि इन चारों पुरुषार्थों में कर्म का तो कोई उल्लेख नहीं है, परंतु आप कल्पना कीजिए कि कोई भी पुरुषार्थ कर्म बिना हो सकता है ?

क्या अंतर है क्रिया और कर्म में ?

अब आज के युग की बात करते हैं। मैकाले शिक्षा पद्धति में आजीविका को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। हर स्कूल-कॉलेज की शिक्षा और मिलने वाली डिग्रियों को पाने का उद्देश्य केवल अच्छा व्यवसाय, अच्छा रोजगार का साधन पाना बन गया है। यह शिक्षा पद्धति अवश्य ही विज्ञान से भरपूर है, परंतु इसमें ज्ञान का कोई स्थान नहीं है और न ही जीवन जीने की कला सिखाने का कौशल। इसीलिए तो आज के फास्ट युग का हर व्यक्ति मानव न रहते हुए रुपए कमाने वाली मशीन बन गया है। धन-सम्पत्ति और भौतिक सुखों की दौड़ में हर व्यक्ति अपने हर कार्य को निर्धारित लक्ष्य यानी फल प्राप्ति के उद्देश्य से ही कर रहा है, परंतु भारतीय सनातन धर्म अंग्रेजी के एक वाक्य ‘WORK IS WORSHIP’ अर्थात् ‘कार्य ही पूजा’ से प्रेरित है, परंतु यह कार्य है क्या, जो पूजा कहलाए ? सृष्टि में कार्य तो हर कोई करता है, जो या तो पापयुक्त होता है या फिर पुण्ययुक्त यानी अच्छा कार्य और बुरा कार्य। अब हम पापयुक्त और बुरे कार्य को तो पूजा कह नहीं सकते, तो क्या अच्छे यानी पुण्यशाली कार्य को पूजा कहा जाए ? अवश्य, पुण्ययुक्त कार्य को पूजा कहा जा सकता है और हर व्यक्ति को जीवन में पुण्ययुक्त, पुण्यशाली या अच्छे कार्य करने की ही सलाह दी जाती है। इसी सलाह पर चलते हुए लोग एक ओर जहाँ आजीविका के लिए व्यवसाय-रोजगार आदि करते हैं, वहीं मन की शांति के लिए अपने-अपने धर्म में बताई गई विधियों के अनुसार पूजा-पाठ करते हैं, मंदिर-मस्जिद में जाते हैं, यज्ञ-अनुष्ठान करते हैं, तीर्थ यात्राएँ करते हैं, भजन-भक्ति-संकीर्तन करते हैं, मंदिरों में भगवान की मूर्तियों के दर्शन करते हैं, फूल-मालाएँ पहनाते हैं, प्रसादी-चढ़ावा चढ़ाते हैं, दान करते हैं आदि.. आदि..। इस पूरे कार्यकलाप को व्यक्ति कर्म समझता है, परंतु वास्तविकता यह है कि ये सारी क्रियाएँ हैं। ये हमारे जीवन का हिस्सा हैं, क्योंकि ये सब कुछ हमें विरासत में मिला है। यद्यपि ये सारी क्रियाएँ उत्कृष्ट हैं, इनमें कोई बुराई नहीं है, परंतु इसे कर्म तभी कहा जा सकता है, जब ये क्रियाएँ करते हुए व्यक्ति के मन में प्रतिक्रिया के रूप में कुछ पाने की इच्छा न हो। जिस तरह शरीर के भीतर साँसों का आवागमन स्वत: होता है, जिस तरह हम दैनिक दिनचर्या (नित्यकर्म से लेकर निद्रा तक) करते हैं, जिसे करने के लिए हमें कोई आयास-प्रयास नहीं करना पड़ता और न ही ही हमारी कोई आकांक्षा होती है, वे सभी क्रियाएँ कर्म हैं। जिस भी कार्य के पीछे कुछ प्राप्ति का उद्देश्य है, वह कर्म नहीं, क्रियाकलाप है।

क्रिया के कर्म बनते ही अस्तित्व उभर आता है

अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या किया जाए, जो क्रिया तक सीमित न रह कर कर्म बन जाए ? इसका सीधा-सा उत्तर है अनासक्त भाव से कार्य करना चाहिए। अब यह अनासक्ति क्या है, यह समझिए। आपने साधारण व्यवहार में शक्ति, सशक्त, सशक्तीकरण जैसे शब्द सुने होंगे, परंतु आसक्त शब्द से परिचय नहीं हुआ होगा। आसक्ति का अर्थ होता है किसी के साथ स्वार्थ सहित संलग्न होना, जिसे हम मोह, लगाव आदि भी कह सकते हैं। आज के युग में हर व्यक्ति प्रत्येक कर्म आरंभ करने से पहले उसके भविष्य में मिलने वाले फल के प्रति आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति ही उसके कर्म को क्रिया बना देती है। उदाहरण के लिए, एक युवक-युवती विवाह करते हैं। तब तक वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, परंतु धीरे-धीरे यह प्रेम स्वार्थपूर्ण आसक्ति में बदल जाता है। अब तक यह युवक-युवती केवल दम्पति हैं, परंतु उनके परस्पर मिलन से जब संतान पैदा होती है, तो यह दम्पति उसमें आसक्त हो जाता है। वह यह नहीं समझ पाता कि दुनिया में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति अपना प्रारब्ध (भाग्य) लेकर ही आता है। वह इस संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए जी-जान से जुट जाता है। यहाँ तक कि संतान की भलाई के लिए कभी-कभी माता-पिता अनुचित कर्म करने तक से नहीं हिचकिचाते। यह क्या है ? यह आसक्ति है। वास्तव में इस दम्पति का शुद्ध कर्म यह है कि वह संतान का लालन-पालन-पोषण करे, उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करे, परंतु वह उसका भाग्यविधाता बनने का प्रयास करता है, जिसमें मोह, स्वार्थ और आसक्ति होती है। यदि इस मोह, स्वार्थ और आसक्ति से रहित होकर संतान के लिए एक माता-पिता के रूप में प्राप्त कर्तव्य ही निभाया जाए, तो वही क्रिया कर्म बन जाता है। कुल मिला कर फल की इच्छा से मुक्त होकर कार्य करना चाहिए। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि कोई भी कार्य लक्ष्यहीन हो। लक्ष्य अवश्य होना चाहिए, परंतु उस लक्ष्य के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इंसान के हाथ में केवल कर्म है, फल नहीं। यदि नि:स्वार्थ और निष्काम भाव से हर कर्म किया जाए, तो वही कर्म आपका धर्म बन जाएगा, वही कर्म आपको अर्थ प्रदान करेगा, वही कर्म आपको काम प्रदान करेगा और अंतत: वही कर्म आपको मोक्ष, मुक्ति, जीवनमुक्त दशा भी प्रदान करेगा अर्थात् आपका व्यक्तित्व समाप्त हो जाएगा और अस्तित्व उभर आएगा।

‘कुछ नहीं करने’ का भाव अपनी ओर लाएगा

मानव जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल आधार कर्म है, परंतु हम कर्म करते हुए मानव जीवन के लक्ष्य यानी उस पुरुष रूपी तत्व को भूल जाते हैं तथा केवल और केवल बाहर दौड़ लगाते हैं। यदि नि:स्वार्थ, निष्काम, अनासक्त भाव से कर्म का आरंभ किया जाए, तो वही कर्म हमारी बाह्य दौड़ को समाप्त कर हमें अपनी ओर खींच ले आएगा। इसके लिए न तो भगवा पहन कर संन्यास धारण करने की आवश्यकता है और न ही हिमालय की गोद में बैठने की। घर-परिवार-कुटुम्ब-कबीले के साथ निर्लेप होकर रहते हुए कर्म किया जाए, तो वही कर्म भक्ति में परिवर्तित हो जाता है और भक्ति ही उस पुरुष रूपी तत्व की ओर ले जाती है, जो हमारे भीतर ही है। जीवन का हर कार्य करते हुए भक्ति की जा सकती है। इसके लिए न तो मंदिरों की दौड़ लगाने की आवश्यकता है, न तीर्थ यात्राओं, गंगा स्नान आदि क्रियाएँ करने की आवश्यकता है। अपने कार्य को पूजा बना लीजिए, उसे निष्काम भाव से कीजिए, वही गीता में उपदेशित शुद्ध कर्म है। शेष सभी क्रियाएँ हैं। यदि आपने जीवन के हर कार्य को यह करने की यह पद्धति सीख ली, तो आपकी बाह्य दौड़ स्वत: समाप्त हो जाएगी। आप हर कर्म करते हुए भी अकर्ता-अकर्मण्य रह सकेंगे। लोगों को दिखाई देगा कि आप कार्य कर रहे हैं, परंतु आप भीतर से भली-भाँति जानते होंगे कि आप कोई कार्य नहीं कर रहे हैं। आप सब कुछ करते हुए भी यह अनुभूति करेंगे कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं। सब हो रहा है। जब ‘सब हो रहा है’ का भाव परिपक्व हो जाएगा, तो आपको यह पूरा संसार उस पुरुष रूपी तत्व की लीला ही लगेगा। जब किसी कार्य के पीछे आपका कोई स्वार्थ ही नहीं होगा, किसी फल की इच्छा ही नहीं होगी, तो उस कार्य का परिणाम आपको सुखी या दु:खी नहीं करेगा। आप क्रियाओं में उलझेंगे नहीं, अपितु सुलझे हुए कार्य करेंगे और आपका हर कार्य उत्तम कर्म होगा। यह स्थिति प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए केवल निष्काम, नि:स्वार्थ, अनासक्त भाव से अपने हर कार्य, हर क्रिया को शुद्ध कर्म में परिवर्तित कर दीजिए। इस तरह आप क्रियाकलापों से ऊपर उठ कर एक कर्मयोगी बन जाएँगे और एक कर्मयोगी के रूप में किया गया आपका हर कर्म आपको अपने भीतर ले जाएगा, जहाँ उस पुरुष रूपी तत्व का निवास है और यही शुद्ध कर्म एक दिन उस सद्गुरु से मिलवा देगा, जो आपको यह बता देगा कि आप कौन हैं ?

पाठकों के प्रश्नों का स्वागत

‘सनातन संक्रांति’ नामक यह स्तंभ निरंतर ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाएगा और आगे भी इसमें मानव जीवन के कई गूढ़ रहस्यों और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति तक के मार्ग को दिखाने के प्रयास किए जाएँगे। इस द्वितीय भाग में जो बातें कही गई हैं, उसे लेकर किसी भी पाठक के मन में कोई प्रश्न हो, तो उसका युवाप्रेस.कॉम स्वागत करता है। हर पाठक के हर प्रश्न का गुरु कृपा से सटीक उत्तर देने का प्रयास किया जाएगा। पाठक इस आलेख से जुड़े या अध्यात्म से जुड़े किसी भी प्रश्न को इन ई-मेल आईडी founder@iksharma.com, iksharmadotcom@gmail.com, kanhaiyyaa@gmail.com अथवा वॉट्सएप नंबर 9998953281 पर भेज सकते हैं। उनके प्रश्नों का ‘सनातन संक्रांति’ की अगली श्रृंखलाओं में उत्तर देने का पूर्ण निष्ठा से प्रयास किया जाएगा।

(गुरु अर्पण)

Article Categories:
News

Comments are closed.

Shares