सनातन संक्रांति : क्या है वह SUPREME TRUTH, जो PROVED है, परंतु SCIENCE की समझ से परे है ?

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मंथन : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 3 अक्टूबर, 2019 (युवाPRESS)। युवाPRESS के ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ की आज तीसरी कड़ी है। गत 19 सितंबर, 2019 गुरुवार यानी गुरु के दिवस से आरंभ किए गए ‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ में आज हम हमारी प्रत्यक्ष आँखों से दिखाई देने वाले विश्व या सृष्टि और यंत्रों के माध्यम से देखे जा सकने वाले अंतरिक्ष सहित ज्ञात और अज्ञात सम्पूर्ण ब्रह्मांड (ENTIRE UNIVERSE) में व्याप्त एक ऐसे सर्वोच्च सत्य (SUPREME TRUTH) के बारे में बताने जा रहे हैं, जो एक चमत्कार है। यह सर्वोच्च सत्य शत प्रतिशत प्रमाणित (PROVED-CERTIFIED) भी है, परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणों को ही मानने वाले विज्ञान (SCIENCE) की समझ से परे है। यह एक ऐसा सर्वोच्च सत्य है, जो शत प्रतिशत स्व-प्रमाणित है। यह सर्वोच्च सत्य ऐसी वस्तु (उसे वस्तु भी नहीं कहा जा सकता) है, जिसकी अनुभूति भले ही विज्ञान नहीं कर सकता, परंतु यदि कोई वैज्ञानिक (SCIENTIST) चाहे, तो उसके लिए इस सर्वोच्च सत्य की अनुभूति सुलभ है। हम आए दिन एक-दूसरे को आश्चर्य में डालने के लिए सरप्राइज़ देते हैं, परंतु जो इस सर्वोच्च सत्य से साक्षात्कार कर लेता है, उसके लिए पूरे विश्व ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड में कोई आश्चर्य नहीं रह जाता। एक वास्तविकता यह भी है कि इस सर्वोच्च सत्य का सांसारिक और व्यावहारिक सत्य-असत्य (TRUE-UNTRUE) और पाप-पुण्य (SINFUL-VIRTUE) से दूर-दूर तक संबंध नहीं है। इतना ही नहीं, इस सर्वोच्च सत्य को जानने के बाद व्यक्ति सुख-दु:ख, लाभ-हानि, हर्ष-शोक (विषाद), पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, अच्छा-बुरा जैसे प्रत्येक द्वंद्व (DUALITY) से मुक्त होकर केवल निर्द्वंद्व आनंद (NON-DUALITY HAPPINESS) को प्राप्त होता है। ऐसी द्वंद्व रहित आनंद की दशा को प्राप्त व्यक्ति जीवन-व्यवहार में आने वाले किसी भी सुख से न हर्ष को प्राप्त होता है और न ही दु:ख से शोक में डूब जाता है।

83,99,999 योनियों को नहीं, केवल मानव को मिला अधिकार

‘सनातन संक्रांति’ स्तंभ की इस तीसरी कड़ी की प्रस्तावना पढ़ कर आपके मन में प्रश्नों का झंझावात उत्पन्न हुआ होगा, परंतु प्रश्नों की यह आंधी उत्तरों के मिलते ही शांत सागर में परिवर्तित हो जाएगी। सबसे पहले आपको सर्वोच्च सत्य यानी सुप्रीम ट्रूथ की व्याख्या बता देते हैं। इस सर्वोच्च सत्य की कई तरह से व्याख्याएँ की जा सकती हैं, परंतु कोई भी व्याख्या उस सर्वोच्च सत्य को बदल नहीं सकती। बात वेदों से ही आरंभ करते हैं। हमारी सनातन-वैदिक-धर्म संस्कृति में चार वेद हैं और चारों वेदों के चार महावाक्य हैं, जो उन वेदों से बने उपनिषदों से लिए गए हैं। इनमें यजुर्वेद का महावाक्य है, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हुँ’, जो बृहदारण्यक उपनिषद (1/4/10) से लिया गया है। सामवेद का महावाक्य है, ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् ‘वह ब्रह्म तु है’, जो छान्दोग्य उपनिषद (6/8/7) से लिया गया है। अथर्ववेद का महावाक्य है, ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’अर्थात् ‘यह आत्मा ब्रह्म है’, जो माण्डूक्य उपनिषद (१/२) से लिया गया है। ऋग्वेद का महावाक्य है, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ अर्थात् ‘वह प्रज्ञाँ ही ब्रह्म है’, जो ऐतरेय उपनिषद (१/२) से लिया गया है। इसी प्रकार सामवेद का महावाक्य है, ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्मम्’ अर्थात् ‘सर्वत्र ब्रह्म ही है’, जो छान्दोग्य उपनिषद (३/१४/१) से लिया गया है। वेदों के ये चारों महावाक्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त उस सर्वोच्च सत्य, सर्वोच्च सत्ता और सर्वोच्च सत्ताधीश को इंगित करते हैं, जिसके कारण पूरा ब्रह्मांड सक्रिय (ACTIVE) है, परंतु वह सर्वोच्च सत्य की सक्रियता किसी पर आधारित नहीं है। वह स्वयं सिद्ध है और उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उस सर्वोच्च सत्य को इस पूरे ब्रह्मांड में विचरण करने वाली 84 लाख योनियों में से केवल मानव योनि में जन्म लेने वाला प्राणी यानी मानव ही जान सकता है। शेष 83 लाख 99 हजार 999 योनियों के प्राणियों को उस सर्वोच्च सत्य को जानने का अधिकार नहीं मिला है, फिर वह निम्न कोटि की योनियों के प्राणी यानी जंतु-कीट-कीड़े-मकोड़े हों या उच्च कोटि के प्राणी यानी इंद्रादि देवता हों या देहमुक्त भूत-प्रेत योनि के प्राणी हों। एकमात्र मानव के अतिरिक्त उस सर्वोच्च सत्य को कोई नहीं जान सकता।

वेदों के चार महावाक्यों का उद्घोष, ‘अपनी ओर आओ’

उपरोक्त दूसरे पैरेग्राफ ने आपके मन के प्रश्नों में और प्रश्न जोड़ दिए होंगे, परंतु धैर्य रखें। अब हम उत्तर पर ही आ रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न जो आपके मन में उठ रहा है, ‘क्या है वह सर्वोच्च सत्य ?’ का उत्तर वैसे तो चार वेदों के चार महावाक्यों में दे दिया गया है। ये चारों महावाक्य स्पष्ट उद्घोषणा कर रहे हैं कि वह सर्वोच्च सत्य मैं, आप, हम सब ही हैं। हमारे अतिरिक्त कोई नहीं है। ये चारों महावाक्य हमें उस सर्वोच्च सत्य को जानने, समझने, अनुभूति करने के लिए भीतर की ओर आने का निर्देश देते हैं। यद्यपि यह बातें लिखने और पढ़ने में जितनी सहज व सरल हैं, उतनी वास्तव में समझने में सहज और सरल नहीं है। इसीलिए इन महावाक्यों का सार समझाने का प्रयास करते हैं। सबसे पहले बात करते हैं यजुर्वेद के महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ अर्थात् ‘मैं ब्रह्म हुँ’ की। इस महावाक्य को जो व्यक्ति पढ़ता है, उसे यह महावाक्य स्वयं से यह कहने को कहता है, ‘मैं ब्रह्म हूँ’। सबसे पहले यह जान लीजिए कि ब्रह्म क्या है ? ब्रह्म का उस ब्रह्मा या उनके साथ पूजे जाने वाले विष्णु-महेश से कोई लेना-देना नहीं है। ब्रह्म को हम विद्युत के उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि आज के विज्ञान के युग में विद्युत यानी बिजली से चहुँओर प्रकाश फैलता है, परंतु क्या हम उस विद्युत को देख पाते हैं ? नहीं, परंतु वह हर तार (वायर) में विद्यमान होती है, जिसके कारण बल्ब जलता है और प्रकाश फैलता है। ठीक इसी तरह ब्रह्म का अर्थ हुआ चेतना। यह चेतना ही ब्रह्म है और यह चेतना कहीं बाहर नहीं होती, हमारे भीतर ही होती है। उस चेतना के कारण हम सक्रिय हैं, श्वासोच्छवास सहज है, देह कार्यरत् है, अविद्यमान मन, बुद्धि और चित्त निरंतर सक्रिय हैं, तो ‘मैं हूँ’ का अहम् भाव भी उसी चेतना के कारण है, जो दिखाई नहीं देती। बस, उस चेतना को जानना, उसकी देह से परे वास्तविक अनुभूति करना ही सर्वोच्च सत्य को जानना है। इसी प्रकार सामवेद का महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ अर्थात् ‘वह ब्रह्म तु है’, अथर्ववेद का महावाक्य ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’अर्थात् ‘यह आत्मा ब्रह्म है’, ऋग्वेद का महावाक्य ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ अर्थात् ‘वह प्रज्ञाँ ही ब्रह्म है’ और सामवेद का महावाक्य है ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्मम्’ अर्थात् ‘सर्वत्र ब्रह्म ही है’ भी खुलेआम उद्घोषणा करते हैं कि उस सर्वोच्च सत्य को जानने के लिए बाहर नहीं, अपितु भीतर दौड़ लगाने की आवश्यकता है।

जहाँ अर्जुन-सा विषाद नहीं, कृष्ण-सा आनंद रह जाता है

अब आज के युग में हर व्यक्ति बिना लाभ (लक्ष्य) वाला कोई काम नहीं करता। इसीलिए कदाचित आप भी सोच रहे होंगे कि उस ब्रह्म यानी सर्वोच्च सत्य को जानने से क्या लाभ होगा और यदि लाभ होगा, तो उसे जानने की विधि क्या है ? पहले प्रश्न का उत्तर है उस सर्वोच्च सत्य यानी ब्रह्म यानी स्वयं को जानने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आपके मन से लाभ का विचार ही नष्ट हो जाएगा। इससे एक कदम आगे कहा जाए, तो उस ब्रह्म की अनुभूति करने के बाद आपके पास मन ही नहीं बचेगा, जिसमें लाभालाभ के विचार उत्पन्न होते हैं। आप उस स्थितप्रज्ञ दशा को प्राप्त करेंगे, जहाँ आपको दुनिया का कोई भी द्वंद्व स्पर्श तक नहीं कर सकेगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि आप इस धरती निष्क्रिय हो जाएँगे। वास्तव में आप निर्द्वंद्व, अद्वैत (एक एवं अद्वितीय) और जीवनमुक्त हो जाएँगे, जिसे लोग मुक्ति या मोक्ष कहते हैं। यह एक अवस्था है, जो आपको एक ऐसे संसार से मुक्त कर देती है, जिसे गीता में स्वयं भगवान कृष्ण ने ‘अशुभ’ कहा है। यद्यपि कृष्ण परमात्मा संसार को अशुभ बता रहे हैं, परंतु उस संसार को नहीं, जिससे आपका संबंध नहीं है। यहाँ कृष्ण परमात्मा उस संसार की बात कर रहे हैं, जो आपको जीवन भर ‘सुख-दु:ख’, ‘लाभ-हानि’, ‘हर्ष-शोक’, ‘मान-अपमान’, ‘पाप-पुण्य’, ‘धर्म-अधर्म’, ‘अच्छा-बुरा’ से लेकर ‘जीवन-मृत्यु’ जैसे द्वंद्वों के चक्र में उलझाए रखता है। द्वंद्वयुक्त यह संसार ही अशुभ है, परंतु जो व्यक्ति उस सर्वोच्च सत्य यानी ब्रह्म यानी आत्मा की अनुभूति कर लेता है, वह इन सभी द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है और उसके पास केवल और केवल द्वंद्व रहित यानी निर्द्वंद्व आनंद ही रहता है। वह आठों प्रहर उस आनंद में रहता है, जिसका कोई विरोधाभासी शब्द नहीं है। हाँ, यही आनंद की स्थिति आगे चल कर परमानंद की ओर ले जाती है, जहाँ आपके लिए पूरा संसार ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड केवल और केवल ईश्वर रह जाता है और आपके मन में केवल और केवल परोपकार और जन-कल्याण की भावना शेष रह जाती है। हाँ, यह भ्रांति मत पाल लीजिएगा कि इस स्थितप्रज्ञ या जीवनमुक्त दशा को प्राप्त करने वाला व्यक्ति हिमालय की गुफा में जाकर बैठ जाता है। ऐसा व्यक्ति घर में एक गृहस्थ के रूप में प्रत्येक पारिवारिक दायित्व-कर्तव्य कर्म उसी तरह करता है, जैसे कि एक साधारण व्यक्ति करता है, परंतु सर्वोच्च सत्य के ज्ञाता व्यक्ति को संसार की कोई भी अस्थिरता अस्थिर नहीं कर सकती। वह हर स्थिति में ईश्वर की लीला देखता है तथा केवल और केवल आनंद की ही अनुभूति करता है। उसे सुख स्पर्श नहीं कर सकता, तो दु:ख के स्पर्श करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है ?

सुलभ-प्रमाणित, पर विज्ञान की से परे है सर्वोच्च सत्य

अब आते हैं शीर्षक पर, जिस पर चर्चा करते हुए हम उस सर्वोच्च सत्य को जानने की युक्ति भी बताने का प्रयास करेंगे। गीता में कृष्ण परमात्मा ने कहा है कि उस सर्वोच्च सत्य, ब्रह्म, स्वयं को जानना अत्यंत सुलभ और सरल है। जिस क्षण व्यक्ति मन का रवैया बदल ले, उसी क्षण व्यक्ति के लिए ब्रह्मज्ञान के द्वार खुल जाते हैं। कुरुक्षेत्र में अपनों-परायों के जिस द्वंद्व के कारण अर्जुन विषादग्रस्त हो गया था, उस द्वंद्व से परे जाकर ही किसी भी व्यक्ति को संपूर्ण शांति मिल सकती है और सर्वोच्च सत्य का एक पर्याय शांति भी है। वास्तव में हम आधुनिक संचार-क्रांति युग में अपने अतिरिक्त अपने आस-पास के हर व्यक्ति को जानते हैं या जानने का प्रयास करते हैं, इंटरनेट पर जाकर तरह-तरह की जानकारियाँ जुटाते हैं, परंतु कभी भी हम स्वयं को जानने की दिशा में अग्रसर नहीं होते, जबकि गीता में भगवान कृष्ण ने स्पष्ट उद्घोषणा की है कि जिसने स्वयं को जान लिया, उसके लिए इस पूरे ब्रह्मांड में जानने योग्य कुछ नहीं रह जाता, क्योंकि वह व्यक्ति पूर्णत: ईश्वराधीन हो जाता है और उसके हर कार्य स्वयं साक्षात् परमात्मा (प्रतीकों में दिखाई देने वाले भगवान या देवी-देवता नहीं, बल्कि स्वयं का आत्मा) करते हैं। इस सर्वोच्च सत्य को जानने के लिए आवश्यकता होती है एक ऐसे सद्गुरु की, जो स्वयं इस सर्वोच्च सत्य को जानता हो। आपको ऐसे सद्गुरु की खोज में निकलने या भटकने की आवश्यकता नहीं है। आपको केवल वेदांत, उपनिषदों और गीता आदि ग्रंथों में दर्शाए गए ऐसे सद्शिष्य बनना है, जिसका केवल और केवल एक ही लक्ष्य होता है, ‘मैं कौन हूँ’ जानना। बस यह प्रश्न उठते ही आपको सद्गुरु मिल जाएँगे, जो 8 प्रकार की बहिरंग-अंतरंग (अष्टांग योग) साधनाओं के माध्यम से उस सर्वोच्च सत्य से साक्षात्कार करवा देंगे। अब बात करते हैं विज्ञान की, जो केवल और केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को ही सत्य मानता है। विज्ञान की दृष्टि में जो प्रमाणित है, वही सत्य है, परंतु सर्वोच्च सत्य एक ऐसी वस्तु (जिसे वस्तु भी नहीं कहा जा सकता) है, जो किसी भी व्यक्ति द्वारा स्व-प्रमाणित होती है। सर्वोच्च सत्य को जान लेने वाला उसे सार्वजनिक रूप से प्रमाणित नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति गुड़ खाए और दूसरा व्यक्ति उस व्यक्ति से पूछे कि गुड़ का स्वाद कैसा है, तो स्वाभाविक है गुड़ खाने वाला व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के समक्ष शब्दों में केवल ‘गुड़ मीठा है’ कह कर ही वर्णन कर पाएगा। यदि दूसरे व्यक्ति को इस स्वाद का अनुभव करना हो, तो उसे स्वयं गुड़ खाना होगा। ठीक इसी प्रकार सर्वोच्च सत्य शत प्रतिशत प्रमाणित है, परंतु विज्ञान की समझ से परे है। चूँकि यह मानव योनि के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुलभ है, अत: विज्ञान के समक्ष भले ही सर्वोच्च सत्य को कोई ज्ञाता प्रमाणित नहीं कर सकता, परंतु कोई भी वैज्ञानिक इस सर्वोच्च सत्य की अनुभूति कर सकता है।

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