85 लाख अहमदाबादियों के लिए ‘BIG GOOD NEWS’ : इस जगह मुफ्त में बँट रही है ‘अमर’ होने की जड़ी-बूटी, जल्दी कीजिए 3 दिन हैं शेष !

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क्या प्राण लेने वाले मनुष्य सहित सभी प्राणी और संसार में स्थित सभी जड़ पदार्थ सदैव के लिए अस्तित्व में रह सकते हैं? निश्चित रूप से सभी का उत्तर होगा, ‘नहीं’, परंतु इस उत्तर की अवधारणा को ग़लत सिद्ध किया जा सकता है और सदा के लिए जीवित रहने की यह महान उपलब्धि केवल और केवल मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है।

गुजरात की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद में गत 25 मार्च सोमवार से ऐसा ही एक महान कार्यक्रम चल रहा है, जहाँ लोगों को अमर होने की युक्ति बताई जा रही है और वह भी मुफ्त में। यह कार्यक्रम किसी पंडाल या धूप एवं गर्मी से पसीना-पसीना कर देने वाली जगह पर नहीं, बल्कि वातानुकूलित सभागार (AC HALL) में चल रहा है। अहमदाबाद के 85 लाख लोगों के लिए यह बहुत बड़ी खबर है। यदि इस समाचार को पढ़ने के बाद आपके मन में प्रश्न उठ रहा है कि क्या आप अमर हो सकते हैं ? यदि हाँ, तो इसके लिए मुफ्त में जड़ी-बूटी कहाँ बँट रही है ?

आपके प्रश्नों के उत्तर देने से पहले यह जान लीजिए कि अब यह कार्यक्रम केवल 3 दिन ही चलेगा और यदि आप अमर होना चाहते हैं, तो आज से ही इस कार्यक्रम में पहुँच जाएँ। संभव है कि आपका भाग्य जाग उठे और आपको इस कार्यक्रम में बताई जा रही अमर होने की युक्ति समझ में आ जाए और आप अनिवार्य मृत्यु से बच जाएँ।

अब कार्यक्रम के बारे में बताए देते हैं। यह कार्यक्रम चल रहा है अहमदाबाद में गुजरात युनिवर्सिटी क्षेत्र स्थित जीएमडीसी कन्वेंशन हॉल में। कार्यक्रम का नाम है ‘अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र’ और इसमें प्रवक्ता हैं महान आध्यात्मिक संत स्वामी तद्रूपानंदजी। भरूच स्थित मनन आश्रम के संस्थापक स्वामी तद्रूपानंद प्रति वर्ष अहमदाबाद में राजा जनक (शिष्य) और अष्टावक्र (गुरु) के बीच संवाद पर आधारित अष्टावक्र गीता पर प्रवचन देने के लिए आते हैं और यह कार्यक्रम कैडिला उद्योग समूह की ओर से इंद्रवदन मोदी तथा शीलाबेन मोदी की पुण्य स्मृति में आयोजित होता है। गत 25 मार्च से आरंभ हुआ अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र आगामी 31 मार्च रविवार तक चलेगा। समय है सायं 5.00 से 7.00। प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क (मुफ्त) है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस महामूल्यवान कार्यक्रम के अब केवल 3 दिन शेष रह गए हैं।

अब आइए आपको बताते हैं कि ऐसा क्या है इस कार्यक्रम में, जहाँ आपको अमर होने की युक्ति मिल सकती है। वास्तव में जनक और अष्टावक्र के बीच हुए संवाद पर स्वामी तद्रूपानंद प्रवचन देते हैं और श्रोताओं को यह बताते हैं कि कैसे हम अपनी देह को ही ‘मैं’ मान चुके हैं, जो वास्तव में हम हैं नहीं। तद्रूपानंदजी कई दृष्टांतों और उदाहरणों को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत कर संसार की अनित्यता और आत्मा की नित्यता पर प्रकाश डालते हैं।

पिछले चार दिनों के सत्र के दौरान जो मैंने सुना, उसके अनुसार जनक-अष्टावक्र संवाद के विभिन्न श्लोकों को उद्घाटित करते हुए तद्रूपानंदजी बताते हैं कि जिस तरह अंधेरे में एक रस्सी साँप की तरह भासमान होती है। वास्तव में वहाँ साँप नहीं होता। रस्सी पर साँप का आरोप होता है और वह भी अंधकार यानी अज्ञान के कारण। जैसे ही ज्ञान रूपी प्रकाश होता है, सर्प लुप्त हो जाता है और रस्सी का ज्ञान हो जाता है। यहाँ रस्सी अधिष्ठान है और साँप आरोप है। ठीक उसी तरह जब तक हमारे भीतर यह अज्ञान रूपी अंधकार है कि हम देह हैं, तब तक अधिष्ठान रूपी आत्मा (स्वयं) की पहचान नहीं हो पाती। वास्तव में हमारी मूल पहचान आत्मा रूपी अधिष्ठान पर यह देह आरोप है, जिसने आत्मा को आवरण से ढँक दिया है। यह आत्मा कोई और नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर है और जो इस आत्मा को जान लेता है, वह यह अच्छी तरह समझ जाता है कि वह देह नहीं है और इसीलिए उसकी मृत्यु कभी नहीं होगी। इसके साथ ही वह सदा के लिए अमर हो जाता है, क्योंकि उसे यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि वह देह धारण करने के पहले भी था, देह के साथ भी है और देह की मृत्यु के बाद भी जीवित रहेगा।

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर व्यक्ति यह जाने कैसे कि वह देह नहीं है? तो इसे जानने के लिए हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर के रूप में वेद-पुराण-उपनिषद् सहित लाखों शास्त्र और ग्रंथ मौजूद हैं और सबसे आधुनिक तथा आसानी से आत्म-दर्शन का मार्ग दिखा कर अमर कर देने वाला ग्रंथ है श्रीमद् भगवद गीता, जो श्री कृष्ण परमात्मा और अर्जुन के बीच का संवाद है। इसमें व्यक्ति को सभी व्यावहारिक कर्म करते हुए, संसार में रहते हुए, संसार में रह कर और भगवा धारण किए बिना भी स्वयं से साक्षात्कार का पूरा मार्ग बताया गया है, परंतु एक बात यहाँ स्मरण रखनी अत्यंत आवश्यक है कि सभी शास्त्रों-ग्रंथों के पठन-अध्ययन के बाद भी आपको आपके मूल स्वरूप की पहचान कराने में अंतिम भूमिका गुरु को ही निभानी होती है। इसलिए गुरु (आज के संदर्भ में सद्गुरु शब्द प्रयोजित करना होगा, क्योंकि ढोंगी गुरुओं का बोलबाला ज्यादा है) का होना आवश्यक है। आपको सद्गुरु की खोज नहीं करनी है। आप केवल सद्ग्रंथों के पठन से स्वयं को सद्शिष्य बनाएँ, सद्गुरु स्वतः ही मिल जाएगा।

आइए फिर लौटते हैं तद्रूपानंद के प्रवचन पर। वे बताते हैं कि किस तरह संसार है और नहीं भी। तद्रूपानंदजी के अनुसार इस दुनिया में केवल सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं है और सत्य उसे कहा जाता है, जो तीनों कालों भूत, वर्तमान और भविष्य या यूँ कहें कि जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति में विद्यमान रहता है। जो तीनों कालों में न हो, वह सब असत्य है। इस दृष्टिकोण से देखें, तो हमारा शरीर भूतकाल में नहीं थी, वर्तमान में है और भविष्य में नही होगा। तो फिर देह को सत्य और नित्य कैसे माना जा सकता है ? इसी तरह आँखों से दिखने वाला संसार भी इसलिए सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह केवल जागृत और स्वप्न अवस्था में ही अनुभूति में आता है। निद्रावस्था में संसार का लोप हो जाता है, परंतु निद्रा के दौरान भी हम जीवित रहते हैं, हमारी साँसें चलती रहती हैं अर्थात् कोई वस्तु है, जो गहरी नींद में भी हमारे साथ है। वह जो वस्तु है, वही है आत्मा, जिसे हम चैतन्य भी कह सकते हैं। तद्रूपानंदजी जनक-अष्टावक्र के संवाद पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि संसार को सत्य या असत्य दोनों में से कुछ भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अज्ञान काल में वह भासमन है और आत्मज्ञान होने के बाद भी वह शरीर में स्थित नेत्रों से देखा जा सकता है। इस तरह संसार अज्ञानकाल में सत्य है, तो ज्ञानावस्था में वह विलुप्त हो जाता है, नष्ट नहीं होता। ज्ञानी की दृष्टि में जगत होता ही नहीं ह, लेकिन इसके बावजूद वह जगत में रह कर ज्ञानमयी दृष्टि से जगत में सभी व्यवहार करता है। अपनी बुद्धि से नहीं, अपितु प्रारब्ध के आधीन होकर।

तद्रूपानंद प्रारब्ध पर प्रकाश डालते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण देते हैं, ‘एक राजा की उंगली कट जाती है। उसका मंत्री कहता है कि जो हुआ वह अच्छा हुआ। राजा भड़क जाता है कि मेरी उंगली कटने में भला अच्छा क्या और कैसे हुआ? वह मंत्री को जेल में डाल देता है। कुछ दिनों बाद राजा नित्यक्रमानुसार एक बार आखेट (शिकार) पर जाता है। वहाँ घने जंगल में वह एक आदिजाति के लोगों के समूह में घिर जाता है। वे लोग बलि के लिए किसी अखंड नर की तलाश में थे। वे लोग राजा की ही बलि चढ़ाने का निर्णय करते हैं। तभी उन्हें पता चलता है कि राजा की एक उंगली कटी हुई है। खंडित देह होने के कारण वे लोग राजा की बलि नहीं चढ़ाते हैं और उसे छोड़ देते हैं। राजा को एहसास होता है कि मंत्री सही बोल रहा था। यदि उस दिन उंगली न कटी होती, तो मैं बलि चढ़ा दिया जाता। राजमहल में लौटते ही वह सीधा कारागार पहुँचता है और मंत्री से क्षमायाचना करता है, परंतु एक प्रश्न अब भी राजा के मन में था। राजा मंत्री से पूछता है कि उंगली कटना मेरे लिए तो अच्छी बात रही है, परंतु तुझे जेल जाना पड़ा, इसमें क्या अच्छा हुआ? मंत्री कहता है कि यदि आप मुझे जेल में नहीं डालते, तो शिकार के समय मैं आपके साथ होता और मेरी अखंडित देह को वे आदिजाति के लोग बलि चढ़ा देते। तो यह अच्छा ही हुआ न कि मैं जेल में था और बच गया।’ इस उदाहरण के जरिए तद्रूपानंदजी यह समझाने का प्रयत्न करते हैं कि जो होता है, वह अच्छे के लिए होता है।

नोट : अष्टावक्र गीता चिंतन सत्र अभी 3 दिन और चलने वाला है। कल फिर स्वामी तद्रूपानंदजी के नए विचारों, नए दृष्टांतों और अमर होने की जड़ी-बूटियों के साथ आपके सामने उपस्थित होऊँगा। (गुरु अर्पण)

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News · Personality development

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