आज है शनि जयंती, गणेश पूजन के बाद करें शनि मंत्र का जाप

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आज शनि जयंती है। शनि सूर्य पुत्र हैं और नौ ग्रहों में से एक हैं। भारतीय ज्योतिष में शनिदेव को न्यायाधीश माना गया है। शनिदेव का जन्म अमावस्या पर होने के कारण हर महीने आने वाली अमावस्या को शनिदेव की पूजा के लिए खास माना जाता है । इनमें ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को शनि जयंती पर्व मनाया जाता है। इस महत्वपूर्ण शनि पर्व पर भगवान शनिदेव की विशेष पूजा की जाती है। शनिदेव के शुभ प्रभाव पाने के लिए विशेष तरह के दान भी किए जाते हैं।

अमावस्या पर जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाएं। अभी लॉकडाउन की वजह से काफी लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में घर के आसपास जरूरतमंद लोगों को अपने सार्मथ्य के अनुसार अनाज और वस्त्र का दान भी करें।

इस पर्व पर भगवान शनिदेव की पूजा खासतौर से शाम को की जाती है। पश्चिम दिशा के स्वामी होने के कारण शनिदेव की पूजा करते समय पश्चिम दिशा में मुंह होना शुभ माना जाता है।

कैसे करें शनि देव की पूजा

शनि जयंती पर सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद अपने इष्टदेव, गुरु और माता-पिता का आशीर्वाद लें। सूर्य और अन्य ग्रहों को नमस्कार करते हुए श्रीगणेश भगवान की पूजा करें। धूप-दीप जलाएं। इसके बाद लोहे का एक कलश लें और उसे सरसों या तिल के तेल से भरकर उसमें शनिदेव की लोहे की मूर्ति स्थापित करें। उस कलश को काले कंबल से ढंक दें। इस कलश को शनिदेव का रूप मानकर आह्वान, स्थान, आचमन, स्नान, वस्त्र, चंदन, चावल, फूल, धूप-दीप, यज्ञोपवित, नैवेद्य, आचमन, पान, दक्षिणा, श्रीफल, अर्पित करके पूजन करें।

इस मंत्र का जाप करें – ऊँ शं नो देवीरभिष्ट्य आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:॥

आप चाहें तो ऊँ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का भी जाप कर सकते हैं। पूजा में नीले फूल, चावल-मूंग की खिचड़ी अर्पित करें। पूजा में हुई जानी-अनजानी भूल के लिए क्षमा मांगे।

पूजा के बाद सभी को प्रसाद वितरित करें। अंत में समस्त पूजन सामग्री किसी ब्राह्मण को दान करें।

 

रोम में भी है शनि मंदिर

भारत में तो शनि मंदिर है ही, किंतु सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक रोम में भी शनि को वैसे ही पूजा जाता है।  रोम में आज भी चौथी शताब्दी का एक शनि मंदिर है, यहां इन्हें कृषि का देवता माना गया है। पुराने समय में उन्हें रोमन देवता माना जाता था। चौथी शताब्दी से ही यहां शनि से जुड़े उत्सव मनाए जाते हैं और नई फसलों के आने पर उनका आभार जताने की परंपरा रही है। ऐतिहासिक पुस्तकों में भी इसका जिक्र मिलता है। इतना पुराना मंदिर होने के बाद भी यहां आज भी विशाल स्तंभ खड़े हैं। यह मंदिर शनि देवता के सम्मान में बनाया गया था।

 

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