‘निकृष्ट नौकरी’ : उत्तम कृषि की ओर वापसी का संदेश हैं ‘वेंकट’, फडवणवीस सरकार ने इस तरह दिया सम्मान

Written by

* महाराष्ट्र में साकार हुई ‘उपकार’ के ‘भारत’ की कहानी !

* जॉब कल्चर में फँसे आज के युवाओं को राह दिखाते हैं वेंकट

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 29 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। ‘उत्तम खेती, मध्यम बान-नीच चाकरी, कुक्कर निदान’। हमारी भारतीय संस्कृति में कृषि यानी खेती को ही सर्वोत्तम कर्म माना गया है, जबकि बान यानी व्यापार को मध्यम कर्म माना गया है, परंतु चाकरी यानी नौकरी (JOB) को निकृष्ट कर्म बता कर इसे कुत्ते की तरह दुम हिलाने समान बताया गया है।

आधुनिक तकनीक के इस युग में भारतीय सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति के महावाक्यों का आज की युवा पीढ़ी के मन में कहाँ कोई मोल है? वह तो पश्चिम संस्कृति के थोपे गए जॉब कल्चर में उलझ गई है। पढ़-लिख कर और डिग्री हासिल करने के बाद आज का युवा बस निकृष्ट नौकरी की तलाश में जुट जाता है। यद्यपि कुछ लोग थोड़ा अधिक धन कमाने और शीघ्र धनवान बनने के लालच में आकर मध्यम व्यवसाय की ओर कदम रखने का प्रयास करते हैं, परंतु क्या एक शिक्षित युवक के धूल-मिट्टी से सने खेत में जाकर खेती करने की कल्पना की जा सकती है ?

नि:संदेह आपका उत्तर होगा, ‘नहीं’। आज का शिक्षित युवक तो पहली ही बार में खेती की बात को यह कह कर सिरे से निरस्त कर देगा, ‘इतनी पढ़ाई-लिखाई क्या हल चलाने के लिए की है ?’ परंतु आज हम आपको एक ऐसे युवक की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने 1967 में रिलीज़ हुई मनोज कुमार की फिल्म ‘उपकार’ के ‘भारत’ की कहानी को वास्तविक जीवन में साकार करके दिखाया है। लगे हाथ आपको यह भी बताए देते हैं कि बॉलीवुड में आज भी भारत उपनाम से स्थापित मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के कहने पर ही उपकार फिल्म बनाई थी। शास्त्री ने 1965 के युद्ध के बाद ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया था और वे चाहते थे कि भारत का युवा खेती की ओर मुड़े। इसीलिए मनोज कुमार ने उपकार फिल्म में एक ऐसे युवक का अभिनय किया, जो नौकरी छोड़ कर खेती की ओर रुख करता है।

महाराष्ट्र में यथार्थ के धरातल पर फिल्म उपकार के मनोज कुमार यानी भारत की कहानी साकार हुई है और यह कार्य किया है एक इंजीनियर ने। महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा मंडल (MSBSHSE)-पुणे ने कक्षा 11 के पाठ्यक्रम में वेंकट अय्यर नामक इस इंजीनियर के जीवन चरित्र को स्थान दिया है। ऐसा करके महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडवणवीस सरकार ने भावी पीढ़ी को निकृष्ट जॉब कल्चर में न फँस कर वेंकट अय्यर की तरह उत्तम कृषि की ओर मोड़ने की प्रेरणा देने का प्रयास किया है।

कौन हैं वेंकट और क्या कारनामा किया है उन्होंने ?

महाराष्ट्र में ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थी जिस वेंकट अय्यर के बारे में पढ़ रहे हैं, वह एक इंजीनियर हैं, परंतु इस समय महाराष्ट्र के डहाणू में एक छोटे-से गाँव में किसान के रूप में जीवन यापन कर रहे हैं। वैसे तो 2004 तक वेंकट अय्यर एक अच्छी-खासी जॉब कर रहे थे, परंतु आज पेठ नामक गाँव में 4.5 एकर की अपनी ज़मीन पर खेती करते हैं। महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनके प्रयास को विद्यार्थियों तक पहुँचाने के निर्णय से प्रसन्न वेंकट कहते हैं कि इससे विद्यार्थियों को खेती, अनाज, फल-सब्जियों की देसी प्रजातियों के महत्व के बारे में जानने का अवसर मिलेगा। वेंकट 15 वर्ष पहले कॉर्पोरेट जॉब करते थे। अचानक उन्हें कृषि की ओर रुख करने का सूझा। उन्होंने 17 साल पुरानी जॉब छोड़ दी और गाँव आकर खेती करने लगे। यद्यपि उन्हें आरंभ में निराशा हाथ लगी, परंतु वे हताश नहीं हुए। धीरे-धीरे उन्हें खेती में सफलता मिलने लगी। शिक्षा भी उनके काम आने लगी।

पत्नी से मिली प्रेरणा

वेंकट जब जॉब कर रहे थे, तब वे उलझन में थे कि वे यही करते रहेंगे ? वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे ऐसा क्या करें, जिससे उन्हें कार्य संतुष्टि मिले। उसी अरसे में उनकी पत्नी जैविक कपास पर एक पुस्तक लिख रही थीं, जिसके अनुसंधान के लिए वे ग्रामीणों के साथ काफी समय व्यतीत कर रही थीं। ग्रामीणों के साथ हुई बातचीत के बारे में पत्नी अक्सर पति वेंकट को बतातीं। धीरे-धीरे वेंकट को यही चीज़ें लुभाने लगीं। एक दिन वेंकट ने पत्नी से ही पूछ लिया कि वे किसान बन सकते हैं। देश के 65 प्रतिशत लोग अगर किसान बन सकते हैं, तो वे क्यों नहीं ? बस यहीं से शुरुआत हुई। पहले वेंकट को लगता था कि जिनके पास करने को कुछ नहीं है, वे ही खेती करते हैं, परंतु ऐसा नहीं है। वेंकट ने जैविक खेती को ही अपनी आजीविका और कार्य का साधन बनाया। फिलहाल वेंकट अपने खेतों में मौसमी सब्जियाँ, चावल की दो स्थानीय प्रजातियाँ लाल व भूरी, तिल, मूंगफली, सरसों तथा तुलसी उगाते हैं। इसके अलावा वे स्थानीय ग्रामीणों को जैविक खेती के तरीके सिखाते हैं। किसानों की मदद, उन्हें बेहतर बाज़ार व कीमतें दिलाने के लिए नए मार्केटिंग प्लेटफॉर्म खोज रहे हैं। स्थानीय किसान वेंकट के साथ मुंबई की हाउसिंग सोसायइटियों और स्कूलों में स्टॉल लगा कर अपनी उपज बेचते हैं।

जीवित लोगों के दृष्टांत अधिक कारगर

इस बीच MSBSHSE का कहना है कि हमारे पाठ्यक्रमों में देश के अनेक ऐसे महापुरुषों के जीवन और दृष्टांत हैं, जो आज जीवित नहीं हैं। ऐसे में विद्यार्थी केवल ऐसे महापुरुषों के जीवन-चरित्र से ही प्रेरणा ले सकते हैं। स्कूली पाठ्यक्रम पर काम करने वाली MSBSHSE की समिति की मुख्य संयोजक प्राची साठे का कहना है, ‘हम चाहते थे कि विद्यार्थियों को असल जीवन के आदर्श व्यक्तित्वों के बारे में बताया जाए। हमारी पुस्तकों में ऐतिहासिक व्यक्तित्व तो बहुत से हैं, जो अब जीवित नहीं हैं। इसीलिए हमने ऐसे दृष्टांतों को पुस्तक में शामिल किया, जिनसे आज के विद्यार्थी जुड़ सकें और चाहें तो मिल भी सकें।’

Article Categories:
Indian Business · News

Comments are closed.

Shares