अयोध्या में राम मंदिर ही बनेगा, SC में सभी पुनर्विचार याचिकाएँ हुई निरस्त

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 12 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। सुप्रीम कोर्ट (SC) ने ‘अयोध्या कांड’ को दोबारा पढ़ने से इनकार कर दिया है। अर्थात् अयोध्या में विवादास्पद भूमि पर रामलला का मंदिर बनाने के सुप्रीम कोर्ट के पिछले महीने 9 नवंबर को दिये गये फैसले पर पुनर्विचार करने के लिये शीर्ष अदालत के समक्ष आई डेढ़ दर्जन याचिकाओं को एससी ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया है कि एससी की 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ द्वारा दिया गया निर्णय ही अंतिम है और अब अदालत राम मंदिर केस को फिर से नहीं खोलेगी।

अयोध्या विवाद पर ये था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

दरअसल, अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर और बाबरी मस्ज़िद वाली विवादास्पद भूमि को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने पिछले महीने 9 नवंबर को फैसला सुनाया था, जिसमें पीठ ने वादी और प्रतिवादी दोनों के ही इस भूमि को लेकर किये गये दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि दोनों ही इस भूमि पर अपना-अपना एकाधिकार सिद्ध करने में विफल रहे हैं। इसके बाद पीठ ने यह कहते हुए विवादास्पद भूमि पर रामलला (भगवान राम के बाल स्वरूप) का मंदिर बनाने का आदेश दिया था कि मस्ज़िद के ढाँचे के नीचे से पुरातात्विक खुदाई में मिले पौराणिक मंदिर के अवशेषों से यह सिद्ध हुआ है कि मस्ज़िद खाली ज़मीन पर नहीं बनी थी। इसलिये अदालत का फैसला है कि इस भूमि पर रामलला का मंदिर बनाया जाए और मस्ज़िद बनाने के लिये यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में अन्य स्थान पर 5 एकड़ ज़मीन उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने अपने फैसले के दौरान वादी यानी राम जन्मभूमि के पक्षकारों में से एक निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि न्यास के विवादित ज़मीन पर अधिकार के दावों को भी खारिज कर दिया था, जिन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित स्थल पर दो-तिहाई भूमि का अधिकारी माना था। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पूरी विवादित 2.77 एकड़ भूमि रामलला को दी और रामलला विराजमान नामक पक्षकार को नये बनने वाले राम मंदिर में रामलला की पूजा और सेवा का अधिकार दिया है। साथ ही केन्द्र सरकार को विवादास्पद भूमि पर नया राम मंदिर बनाने के लिये नये सिरे से एक ट्रस्ट बनाने का भी आदेश दिया है, जो इस मंदिर का संचालन देखेगा। अदालत ने इस ट्रस्ट में यदि केन्द्र सरकार चाहे तो निर्मोही अखाड़े तथा राम जन्मभूमि न्यास को भी उचित स्थान देने की बात कही थी।

पुनर्विचार याचिकाओं में की गई थीं ये माँगें…

चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि न्यास नामक दोनों पक्षकारों को झटका देने वाला निर्णय दिया था, इसलिये इन दोनों सहित कुल 18 पक्षकारों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की गईं थी। इनमें से 5 याचिकाएँ ऐसी थीं, जिन्हें ऑल इण्डिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और ज़मीयत उलेमा-ए-हिंद का समर्थन प्राप्त था। पहली पुनर्विचार याचिका 2 दिसंबर को मूल वादियों में से एक एम. सिद्दीक के वारिस और यूपी ज़मीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने दायर की थी, जिसमें उन्होंने सर्वोच्च अदालत के पिछले महीने दिये गये फैसले के 14 बिंदुओं पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था। उनकी अपील थी कि बाबरी मस्ज़िद के पुनर्निर्माण का आदेश देकर ही इस प्रकरण में पूरा न्याय हो सकता है। उनके साथ अन्य याचिकाकर्ता थे मौलाना मुफ्ती हसबुल्ला, मोहम्मद उमर, मौलाना महफुजूर्रहमान और मिसबाहुद्दीन। यह सब भी पहले मुकदमे में पक्षकार थे। जबकि निर्मोही अखाड़े की ओर से याचिका में कहा गया था कि अदालत के आदेशानुसार केन्द्र सरकार के राम मंदिर ट्रस्ट में इस अखाड़े को अभी तक कोई जगह नहीं दी गई है। इसलिये अदालत को केन्द्र सरकार को इस बारे में आदेश देना चाहिये और इस ट्रस्ट में उसकी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिये । निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या में विवादित भूमि के बाहर स्थित उसके स्वामित्व वाले कई अन्य मंदिर उसे वापस करने की भी याचिका में माँग की थी। इस प्रकार निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर नहीं की थी, बल्कि शैबियत राइट्स, कब्जे और लिमिटेशन के फैसले को लेकर याचिका दाखिल की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

SC की इस संवैधानिक पीठ ने खारिज की पुनर्विचार याचिकाएँ

ज्ञात हो कि फैज़ाबाद कोर्ट के 1962 के एक आदेश के अनुसार सीपीसी यानी सिविल या दीवानी मामलों के तहत पक्षकारों के अलावा कोई भी नागरिक भी पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकता है। इसलिये सीपीसी के ऑर्डर 1 रूल 8 के तहत यह पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की गईं थी। इन याचिकाओं की सुनवाई रि-प्रेजेंटेटिव सूट यानी प्रतिनिधियों के माध्यम से लड़े जाने वाले मुकदमे की तरह की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मेरिट के आधार पर इन याचिकाओं को सुनवाई के लिये स्वीकार किया था। सभी डेढ़ दर्जन पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करने वाली 5 जजों की संवैधानिक पीठ में मुख्य न्यायमूर्ति यानी चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर और जस्टिस संजीव खन्ना शामिल हैं। इस पीठ में जस्टिस खन्ना नया चेहरा हैं, क्योंकि पहले की पीठ में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई शामिल थे, जो 18 नवंबर को सेवा निवृत्त हो गये। इसलिये इस पीठ में सीजेआई के स्थान पर वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस एसए बोबड़े की नियुक्ति हुई है, जबकि पीठ में बोबड़े के रिक्त स्थान पर खन्ना को शामिल किया गया है।

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