VIDEO : सुनिए सुषमा का ऐतिहासिक भाषण, जिसमें उन्होंने विरोधियों की तुलना मंथरा और शकुनि से की थी !

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रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 7 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। बात 11 जून, 1996 की है, जब संसद में नए प्रधानमंत्री बने एच. डी. देवेगौड़ा ने अपनी सरकार के प्रति विश्वास मत प्रस्ताव पेश किया था। इस विश्वास मत पर चर्चा के दौरान जब भाजपा नेता सुषमा स्वराज की बोलने की बारी आई, तो उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को गिराने वाले विरोधियों की अपने धारदार भाषण से जम कर ख़बर ली।

दरअसल लोकसभा चुनाव 1996 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई, 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, परंतु भाजपा और वाजपेयी बहुमत जुटाने में विफल रहे। धर्मनिरपेक्षता का ढोंगी चोला ओढ़ कर कांग्रेस के नेतृत्व में अनेक परस्पर विरोधी राजनीति करने वाले राजनीतिक दल भाजपा के विरुद्ध एकजुट हो गए, जिसके चलते 28 मई, 1996 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद में अपनी सरकार के प्रति प्रस्तुत किए गए विश्वास मत को पारित नहीं करा पाए और उन्होंने शक्ति परीक्षण से पहले ही त्यागपत्र दे दिया।

सुषमा स्वराज न केवल तेरह दिनों में ही अटल सरकार के पतन से आहत थीं, अपितु धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश की जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों के प्रति भी उनके मन में भारी आक्रोश था। वाजपेयी के त्यागपत्र देने के बाद तत्कालीन जनता दल के नेता एच. डी. देवेगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा (UF) सरकार बनी। इस संयुक्त मोर्चे में कांग्रेस सहित तमाम भाजपा विरोधी राजनीतिक दल शामिल थे। देवेगौड़ा ने 1 जून, 1996 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

वाजपेयी की तरह देवेगौड़ा को भी संसद में विश्वास मत हासिल करना था। संसद में देवेगौड़ा सरकार के प्रति विश्वास मत प्रस्तुत हुआ, तो चर्चा के दौरान भाजपा के अनेक नेताओं ने तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की जम कर बखिया उधेड़ी और इस मामले में सबसे मुखर रहीं सुषमा स्वराज। 11 जून, 1996 को सुषमा स्वराज ने देवेगौड़ा सरकार के प्रति संसद में प्रस्तुत विश्वास मत पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों को ख़ूब लताड़ पिलाई।

सुषमा ने अपने भाषण में रामायण और महाभारत काल को जोड़ते हुए जहाँ एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना भगवान राम और धर्मराज युधिष्ठिर से ही, वहीं विरोधियों को आधुनिक भारत के मंथरा और शकुनि करार दिया। सुषमा ने कहा, “मैं यहाँ विश्वासमत का विरोध करने के लिए खड़ी हुई हूँ। अध्यक्षजी, यग इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है, जब राज्य का सही अधिकारी राज्याधिकार से वंचित कर दिया गया हो। त्रेता में यही घटना राम के साथ घटी थी। राजतिलक करते-करते वनवास दे दिया गया था। द्वापर में यही घटना धर्मराज युद्धिष्ठिर के साथ घटी थी, जब धूर्त शकुनि की दुष्ट चालों ने राज्य के अधिकारी को राज्य से बाहर कर दिया था।

सुषमा यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने आगे कहा, ‘अध्यक्ष जी, जब एक मंथरा और एक शकुनि, राम और युद्धिष्ठिर जैसे महापुरुषों को सत्ता से बाहर कर सकते हैं, तो हमारे खिलाफ तो कितनी मंथराएँ और कितने शकुनि सक्रिय हैं। हम राज्य में बने कैसे रह सकते थे ? अध्यक्ष जी, शायद रामराज और स्वराज की नियति यही है कि वो एक बड़े झटके के बाद मिलता है और इसीलिए मैं पूरे विश्वास से कहना चाहती हूँ कि जिस दिन 28 तारीख (28 मई, 1996) को दोपहर मेरे आदरणीय नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने इस सदन में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे की घोषणा की थी, उस दिन हिन्दुस्तान में रामराज की भूमिका तैयार हो गई थी। हिंदुस्तान में उस दिन स्वराज की नींव पड़ गई थी।’

सुषमा ने कहा, ‘अध्यक्ष जी, हम सांप्रदायिक हैं। हाँ, हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम वंदे मातरम् गाने की वकालत करते हैं। हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के लिए लड़ते हैं। हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम धारा 370 को खत्म करने की मांग करते हैं। हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम हिंदुस्तान में गो रक्षा की वकालत करते हैं। हाँ, अध्यक्ष जी हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम हिंदुस्तान में समान नागरिक संहिता (UCC) बनाने की बात करते हैं। अध्यक्ष जी, ये सब लोग हैं, ये धर्मनिर्पेक्ष हैं, दिल्ली की सड़कों पर 3000 सिखों का कत्ल-ए-आम करने वाले।’

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