मोदी सरकार ने उतारी घाटे की ‘घड़ी’ : अब इतिहास बन गई ‘देश की धड़कन’

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 27 जून 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम)। कुछ लोगों में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि घड़ी बंद होने का मतलब होता है कि खराब समय शुरू हो गया है। यह मान्यता कितनी सही है या कितनी गलत है, यह कहना तो मुश्किल है, परंतु देश की धड़कन कहलाने वाली घड़ी निर्माता कंपनी एचएमटी के साथ तो बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। घड़ी का उत्पादन बंद होने के बाद अब कंपनी पर भी ताला लगने जा रहा है।

एक समय घड़ी का मतलब hmt होता था

एक समय था जब घड़ी का मतलब hmt होता था। बच्चा परीक्षा में पास हो तो तोहफे में एचएमटी घड़ी, शादी में दूल्हा-दुल्हन की कलाई पर सजती थी एचएमटी घड़ी और दफ्तरों में रिटायर होने पर कर्मचारियों – अधिकारियों को भी यादगार भेंट के रूप में दी जाती थी एचएमटी घड़ी। लगभग हर कलाई की शोभा बढ़ाती थी चाबी से चलने वाली एचएमटी घड़ी। इस घड़ी की टिकटिक जैसे देश की धड़कन बन गई थी। इसीलिये कंपनी ने भी इस घड़ी को ‘देश की धड़कन’ टैग लाइन दी थी, परंतु उदारीकरण की नीति ने देश की इस धड़कन का धड़कना बंद कर दिया। एचएमटी घड़ी का उत्पादन तो सालों पहले ही बंद हो चुका था, अब जल्द ही कंपनी पर भी मोटा सा ताला लटक जाएगा। इसी के साथ एचएमटी घड़ी इतिहास बनकर रह जाएगी।

66 साल पहले 1953 में शुरू हुई थी hmt

हिन्दुस्तान मशीन टूल्स यानी एचएमटी की स्थापना 1953 में हुई थी। कंपनी ने घड़ियों के उत्पादन के लिये जापान की घड़ी निर्माता कंपनी सिटीज़न से अनुबंध किया था। शुरू में चाबी से चलने वाली इस घड़ी का नाम जनता घड़ी रखा गया था। एचएमटी ने अपने उत्पादन काल में 115 मिलियन से अधिक घड़ियों का उत्पादन किया। 1970 में एचएमटी ने सोना और विजय ब्राण्ड के नाम से क्वार्ट्ज़ घड़ियों का उत्पादन शुरू किया था। यह कदम कंपनी के लिये घाटे का सौदा हुआ। उस दौर में महँगी घड़ियाँ बहुत कम या गिने चुने लोग ही पहनते थे। इसलिये कंपनी का यह फैसला उसके लिये महँगा साबित हुआ। हालाँकि जल्द ही कंपनी ने अपनी गलती सुधार ली और दोबारा मैकेनिकल घड़ियों का उत्पादन शुरू कर दिया।
1987 में अन्य निजी कंपनियों ने भारतीय बाजार में क्वार्ट्ज़ घड़ियाँ बेचना शुरू किया। तब तक एचएमटी का पूरा ध्यान केवल मैकेनिकल घड़ियों के निर्माण पर ही था और इन्हीं घड़ियों के निर्माण के लिये नये-नये संयंत्र लगाए जा रहे थे। दरअसल एचएमटी के पास उस समय सफलता की सभी चाबियाँ थी। उसके पास सफल और कुशल इंजीनियरों की फौज थी, जो अच्छी तकनीक वाली घड़ियाँ बनाते थे। कंपनी का रिटेल नेटवर्क, सर्विस और वितरण तंत्र भी बहुत मजबूत था। हालाँकि प्रबंधकीय कमियों के कारण उसकी इस फौज के सिपाही दूसरी कंपनियों से जुड़ते गये और एचएमटी कंपनी की स्थिति क्लासिक रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल जैसी हो गई।
पाँच दशक तक देश की कई पीढ़ियों ने एचएमटी घड़ियाँ पहनी हैं। इसलिये एचएमटी की छवि क्लासिक घड़ी निर्माता कंपनी की है।

आर्थिक सुधारों ने बंद कर दी ‘देश की धड़कन’

1991 तक एचएमटी का भारतीय बाजार पर एकतरफा राज था। तीन दशक तक लगातार देश में घड़ी का मतलब एचएमटी हुआ करता था। इसी लोकप्रियता को देखते हुए कंपनी ने अपनी टैग लाइन भी ‘देश की धड़कन’ दी हुई थी। 1993 में आर्थिक सुधारों के नाम पर भारतीय बाजारों को दुनिया भर के लिये खोल दिया गया और यहीं से एचएमटी का बुरा वक्त शुरू हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते समय के साथ एचएमटी खुद को बदल नहीं सकी। कंपनी ने यह समझने में बहुत देर कर दी कि अब लोग घड़ी केवल समय देखने के लिये ही नहीं पहनते हैं, बल्कि अब घड़ी हाथों में फैशन का भी पर्याय बन चुकी है। इसके बाद कंपनी की कश्मीर में श्रीनगर स्थित फैक्टरी बंद हुई तो वहाँ के 500 कर्मचारियों को बिना काम के ही वेतन देना पड़ा, जिससे कंपनी की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। कंपनी ने तत्कालीन सरकारों के समक्ष कई योजनाएँ रखी, जिन्हें सरकार ने स्वीकार नहीं किया और कंपनी का घाटा बढ़ता गया। वित्तीय वर्ष 2012-13 में कंपनी का घाटा 242.47 करोड़ से बढ़कर 2013-14 में 233.08 करोड़ तक पहुँच गया और कंपनी को घड़ियों का उत्पादन बंद कर देना पड़ा। इस प्रकार लगभग 50 सालों तक लोगों की कलाई पर सजने वाली यह घड़ी इतिहास बन गई।

पीएम मोदी के फैसले से अब लग जाएगा कंपनी पर ताला

अब सरकार ने घाटे में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की 19 कंपनियों को बंद करने का निर्णय किया है, जिनमें एक एचएमटी घड़ी निर्माता कंपनी भी शामिल है। एचएमटी यानी हिन्दुस्तान मशीन टूल्स भारत सरकार के भारी उद्योग और सार्वजनिक उद्यम विभाग के अंतर्गत काम करने वाली कंपनी थी, जिसे पाँच साल पहले बंद कर दिया गया। अब कंपनी पर ताला लग जाएगा। कंपनी ट्रैक्टर, छपाई की मशीनरी, धातु बनाने की प्रेस, प्लास्टिक प्रसंस्करण मशीनरी, सीएनसी सिस्टम और बीयरिंग का भी विनिर्माण करती थी। कंपनी के ट्रैक्टर भी खूब प्रचलित हुए थे और खेतों को जोतने के लिये ट्रैक्टरों के इस्तेमाल का प्रचलन बढ़ा था।

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