मूक बधिर बच्चे पैदा होने पर अब न घबराएँ माता-पिता : अब बहरे भी सुन सकेंगे

अहमदाबाद, 23 जून-2019, (युवाप्रेस डॉट कॉम)। यदि किसी दंपति के यहाँ कोई मूक बधिर बालक जन्म लेता है, तो उस दम्पति का दुःख समझा जा सकता है कि उनके लिये उस बालक का लालन-पालन करना कितना मुश्किल होता है। इतना ही नहीं, उस बालक का भविष्य भी अंधकारमय हो जाता है, जो न सुन सकता है और न बोल सकता है, क्योंकि बच्चा सुनकर ही बोलना सीखता है, परंतु अब यह सोचना बिल्कुल बेमानी है कि बालक बहरा पैदा हुआ है तो आजीवन सुन नहीं सकेगा और इशारों को समझकर इशारों में ही संवाद करेगा और बोल भी नहीं पाएगा। क्योंकि अब ऐसी तकनीक और यंत्र का आविष्कार हो चुका है, जिसकी मदद से बहरे बच्चे सुन भी पाएँगे और बोलने भी लगेंगे।


कोकिलियर इम्प्लांट यानी कृत्रिम कान


अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में कान, नाक, गला (Ear, nose, Throat-ENT) विभाग में कोकिलियर इम्प्लांट की शुरुआत के बाद से अब तक लगभग डेढ़ हजार बच्चों में कृत्रिम कान लगाए गये हैं। जो बच्चे जन्मजात बहरे होते हैं। वह बच्चे सुन सकें, इसके लिये उन बच्चों में आर्टिफिसियल यानी कृत्रिम कान लगाया जाता है। कोकिलियर यंत्र कान के पीछे की हड्डी में लगाया जाता है। इससे जब कोई आवाज़ बच्चे के कान के पटल तक पहुँचती है तो यह यंत्र वायरलेस के माध्यम से उस आवाज को कान की मुख्य नस तथा उसके बाद दिमाग तक पहुँचाता है, जिससे बच्चा सुनने लगता है।


जन्म के बाद 3 वर्ष के भीतर कराएँ कोकिलियर इम्प्लांट


कोकिलियर इम्प्लांट का सबसे अच्छा परिणाम तब मिलता है, जब जन्म से लेकर तीन वर्ष तक की आयु के होने तक यह ऑपरेशन करा लिया जाए। इस आयु में बच्चा सुनकर बोलना भी सीखता है। अधिक आयु में बोलने के लिये स्पीच थेरेपी की ज्यादा जरूरत पड़ती है।


अब नहीं रहेगा कोई बहरा


लगभग डेढ़ दशक पहले तक यदि बच्चा मूक बधिर पैदा होता था तो उसके बारे में यही सोचा जाता था कि अब इस बालक को आजीवन इशारों से ही बात करनी पड़ेगी। हालाँकि कोकिलियर इम्प्लांट की तकनीक इज़ाद होने के बाद जन्मजात बच्चों के लिये भी सुनना और बोलना संभव हो गया है। ऐसे बच्चों को इम्प्लांट के जरिए समाज की मुख्य धारा में जोड़ा जा सकता है।
अहमदाबाद सिविल अस्पताल के ईएनटी विभाग के एचओडी और कोकिलियर इम्प्लांट ग्रुप ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. राजेश विश्वकर्मा के अनुसार उनके विभाग में मूक बधिर बच्चों का इम्प्लांट किये जाने के बाद कई बच्चे अब इंजीनियर की पढ़ाई कर रहे हैं और कई बच्चे संगीतकार भी बन गये हैं। यदि यह बच्चे इम्प्लांट नहीं करवाते तो न तो वह अच्छी तरह से पढ़ाई कर पाते और न ही इंजीनियर और संगीतकार बन पाते। डॉ. विश्वकर्मा का कहना है कि उनका और उनके विभाग का यही प्रयास है कि अब कोई भी जन्म लेने वाला बच्चा बहरा होने के कारण मूक बधिर न रहे।


राज्य सरकार का सराहनीय सहयोग


डॉ. राजेश विश्वकर्मा वह डॉक्टर हैं, जिन्होंने कोकिलियर इम्प्लांट की शुरुआत के बाद से अब तक अपने ईएनटी विभाग में लगभग डेढ़ हजार बच्चों में कृत्रिम कान प्लांट किये हैं। इनमें से आधे से ज्यादा ऑपरेशन राज्य सरकार के सहयोग से निःशुल्क किये गये हैं। वैसे एक इम्प्लांट का खर्च लगभग साढ़े पाँच से छह लाख रुपये तक है, परंतु राज्य सरकार की ओर से स्कूल हेल्थ प्रोग्राम चलाया जाता है, जिसके अंतर्गत स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और जो बच्चे विविध रोगों से पीड़ित पाये जाते हैं, राज्य सरकार अपने पैसों से उनका उपचार करवाती है। इसी स्कूल हेल्थ प्रोग्राम के तहत राज्य सरकार ने डेढ़ हजार में से लगभग आधे बच्चों का ऑपरेशन निःशुल्क करवाया है।
अहमदाबाद सिविल अस्पताल में इस तरह की सर्जरी किसी भी सरकारी अस्पताल में सबसे पहले शुरू हुई है। इसके बाद डॉ. विश्वकर्मा ने राज्य के अन्य शहरों वड़ोदरा, सूरत, राजकोट, गांधीनगर आदि में भी ईएनटी सर्जन डॉक्टरों को कोकिलियर इम्प्लांट की सर्जरी सिखाई है। इसके अलावा राज्य से बाहर अन्य राज्यों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र आदि के लगभग 32 शहरों में भी इस इम्प्लांट की सर्जरी सिखाई है। संभवतः पूरे देश में सबसे अधिक इम्प्लांट करने वाले डॉ. विश्वकर्मा ने अब तक लगभग 2,250 बच्चों को आवाज़ देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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