हे 90,78,66,679 ‘राष्ट्रवादियों’! आपको ही तय करना है कि भारत का ‘मस्तक’ बचेगा या कटेगा ?

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जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। यह एक रटी-रटाई पंक्ति शेष भारत का हर नागरिक, हर राजनीतिक दल और उसका नेता हमेशा कहता रहता है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, उसके पूर्वज जनसंघ, उसके मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल एवं उनके सभी पूर्वज नेता सहित सभी नेता भी 1947 से लेकर इस बात पर अडिग हैं कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, परंतु क्या जम्मू-कश्मीर भारत का हाल में भी अभिन्न अंग है ? जिस जम्मू-कश्मीर को हम हमारे भारत के मानचित्र पर दर्शाते हैं, क्या वह पूरा हमारे पास है ? उत्तर है नहीं, क्योंकि एक बड़ा भाग पाकिस्तान के कबजे में है, जिसे हम अपनी आत्म-संतुष्टि के लिए भले ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) कहते हों, परंतु सच्चाई यही है कि उस कश्मीर पर पाकिस्तान का शासन है।

अब बात रही शेष जम्मू-कश्मीर की, परंतु यह शेष जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है ? केवल कह देने से कोई भूमि हमारा अभिन्न अंग नहीं बन जाती। सच्चाई यह है कि शेष जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग होने के बावजूद धारा 370 के कारण हमारा अभिन्न नहीं, बल्कि हमारा होने के बावजूद हमसे भिन्न अंग बन कर रह गया है।

देश में लोकसभा चुनाव 2019 के लिए सात चरणों में मतदान का आरंभ 11 अप्रैल से शुरू होने वाला है और 19 मई तक मतदान होगा। चुनाव के इस मौसम में फिर एक बार जम्मू-कश्मीर को भारत का वास्तविक अभिन्न अंग बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनी धारा 370 पर बहस शुरू हो गई है। कुछ नेता इसके पक्ष में हैं, तो कुछ विरोध में। जो धारा 370 का विरोध कर रहे हैं, उन्हें सलाम है, परंतु जो विरोध कर रहे हैं, उन लोगों को इस लोकसभा चुनाव में अपने तमाम निजी और क्षेत्रीय मुद्दों से ऊपर उठ कर एकमात्र राष्ट्रवाद को ध्यान में रख कर सत्ता से बाहर रखना होगा। यदि धारा 370 के समर्थक सत्ता में आए, तो पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत का बनाने का सपना देखने वाले हम भारतीय अपने नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर को भी खो देंगे और भारत माता का मस्तक कट जाएगा।

भारत के मस्तक का भाग्य राष्ट्रवादियों के हाथ में

चुनाव आयोग के अनुसार लोकसभा चुनाव 2019 में देश के 91,57,17,350 (91 करोड़ 57 लाख 17 हजार 350 मतदाता) अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले हैं। अब इनमें से जम्मू-कश्मीर के 78,50,671 (78 लाख 50 हजार 671) मतदाताओं को निकाल दें, तो बचते हैं 90,78,66,679 (90 करोड़ 78 लाख 66 हजार 679) मतदाता। इन्हीं मतदाताओं को अपने भीतर छिपे राष्ट्रवाद को जगाना होगा और देश को एक ऐसी सरकार देनी होगी, जो जम्मू-कश्मीर से न केवल धारा 370 हटाने की सोच रखती है, अपितु जिसका लक्ष्य पीओके को भी भारत में जोड़ कर भारत का खंडित मस्तक अखंडित बनाने का हो।

दलों व नेताओं की सोच से तय कीजिए कि कौन है मस्तक का रक्षक ?

अब सवाल यह उठता है कि 90,78,66,679 मतदाता आखिर यह तय कैसे करें कि कौन-सा राजनीतिक दल कश्मीर के मुद्दे पर भारत का हितैषी है ? तो यह राय आप राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के वक्तव्य और उनकी सोच से बना सकते हैं। सबसे पहले बात करते हैं भाजपा की। देश की एकमात्र यह पार्टी है, जिसने सबसे पहले धारा 370 का विरोध किया और इसके वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह ने अपने अद्यतन (लेटेस्ट) भाषण में उद्घोषणा भी कि यदि देश में फिर से नरेन्द्र मोदी की सरकार बनेगी, तो जम्मू-कश्मीर को भारत में रह कर भी भारत से अलग करने वाली धारा 370 को खत्म किया जाएगा। अब बात करते हैं देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की, तो इतिहास गवाह है कि धारा 370 ही नहीं, अपितु समग्र कश्मीर को विवादास्पद बनाने का कुश्रेय इस पार्टी के पूर्वज जवाहरलाल नेहरू को ही जाता है। नेहरू ने एक तरफ कश्मीर को विवादास्पद बनाने वाली नीति बनाई, तो दूसरी तरफ धारा 370 के अस्तित्व काल में विदेश में रहते हुए तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल पर यह दबाव बनाया कि वे इस धारा 370 को पारित कराने का ‘दुष्कृत्य’ करने पर विवश हो गए। वर्तमान कांग्रेस की सोच भी नेहरू जैसी ही है, जो उसके घोषणा पत्र में भी उजागर होती है। इस पार्टी से राष्ट्रवादी होने की उम्मीद इसलिए भी नहीं की जा सकती, क्योंकि इसने तो घोषणा पत्र में देशद्रोह के कानून को ही खत्म कर देने का वादा कर दिया है।

कश्मीर को भी POK की तरह IOK बनाने से राष्ट्रवादी ही रोक सकते हैं

कश्मीर पर वहाँ के स्थानीय नेताओं के वक्तव्य यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि स्थानीय नेताओं को यह तनिक भी रास नहीं आ रहा कि कश्मीर पर भारत सरकार किसी भी तरह का कोई अधिकार जमाए। सबसे पहले बात करते हैं पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ्ती की। इनकी हिम्मत तो देखिए, अमित शाह के धारा 370 हटाने के वादे पर महबूबा मुफ्ती जितनी भड़कीं, उतनी भड़क तो पाकिस्तान के सीने में भी नहीं है भारत के लिए। महबूबा ने शाह के बयान पर यहाँ तक चेतावनी दे डाली कि यदि कश्मीर से धारा 370 हटी, तो भारत कश्मीर को खो देगा। महबूबा एक जनसभा में बोलीं, ‘अमित शाह साहब, महबूबा मुफ्ती आपसे कह रही है कि जिस दिन आप धारा 370 को ख़त्म करोगे, आप कश्मीर में महज़ कब्जा करने वाली ताकत बन कर रह जाओगे। जिस तरह फिलिस्तीन पर इज़राइल का कब्जा है, उसी तरह जम्मू-कश्मीर पर भी हिन्दुस्तान का सिर्फ कब्जा होगा।’ महबूबा के बयान का सीधा अर्थ है कि धारा 370 हटी, तो जिस तरह पाकिस्तान ने जिस कश्मीर पर कब्जा कर उस कश्मीर को हमारे लिए POK बना दिया है, उसी तरह भारत का कश्मीर भी भारत अधिकृत कश्मीर (IOK) बन जाएगा। ये तो हुई महबूबा की बकवास की बात। इनसे पहले कश्मीर के ही एक अन्य राजनीतिक दल जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला मांग कर चुके हैं कि कश्मीर को अलग राष्ट्रपति और अलग प्रधानमंत्री दीजिए। आश्चर्य की बात यह है कि इस राजनीतिक दल से देश की सबसे पुरानी पार्टी और सत्ता में वापसी के सपने देख रही कांग्रेस ने चुनावी गठबंधन किया है।

गंभीरता से सोचिए और तय कीजिए अपना मत

इस पूरी खबर को पढ़ने के बाद आप स्वयं अपना अभिप्राय-अपना मत तय कीजिए कि आप राष्ट्रवाद को सर्वोपरि मानते हैं, या मुफ्त में सुविधाएँ देने वाले नेताओं के आकर्षक चुनावी वायदों से आकर्षित होकर स्वहित को सर्वोपरि मानते हैं ? यह चुनाव देश के मस्तक के अस्तित्व की कसौटी का है। जब देश का मस्तक (कश्मीर) ही कट जाएगा, तो मस्तक के बिना देश कैसे जीवित रहेगा? यदि देश रहेगा, तो सुविधाएँ तो फिर भी मिल जाएँगी, लेकिन जब देश ही नहीं रहेगा, तो सुविधाएँ लेकर कहाँ भोगोगे ? सोचिए और अपना मत तय कीजिए।

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