चौथी बार स्वतंत्रता दिवस और रक्षा बंधन एक साथ : हर 19वें वर्ष दोनों त्योहारों का होता है मिलन

20वीं सदी की शुरुआत में हिंदू-मुस्लिम ने एक दूसरे को राखी बांधकर रचा था अनोखा इतिहास

रक्षा बंधन का इतिहास भी हिंदू मुस्लिम एकता से जुड़ा है

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 15 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। 15 अगस्त गुरुवार को देश भर में आज़ादी का राष्ट्रीय पर्व यानी स्वाधीनता दिवस और भाई-बहन के अटूट प्रेम के प्रतीक रक्षा बंधन का त्योहार एक साथ मनाया जा रहा है, परंतु क्या आपको पता है कि 15 अगस्त 1947 को आज़ादी पाने के बाद 2019 तक 73 वर्ष के इतिहास में यह चौथा मौका है, जब स्वतंत्रता दिवस और रक्षा बंधन का त्योहार एक साथ मनाया जा रहा है। यह भी रोचक तिथि गणित है कि हर 19वें वर्ष में यह दोनों त्योहार एक ही दिन आते हैं।

हिंदू-मुस्लिम ने परस्पर राखी बाँधकर रचा था इतिहास

20वीं सदी की शुरुआत में 1905 में अंग्रेजों ने भारत के बंगाल प्रांत को दो भागों में विभाजित कर दिया था। पूर्वी बंगाल मुस्लिमों को और पश्चिम बंगाल हिंदुओं को आबंटित किया था। उस समय बंगाली भाषा के लेखक, चित्रकार और संगीतकार (भारतीय साहित्य के एक मात्र नोबल पुरस्कार विजेता) रबीन्द्रनाथ टैगोर ने भाई-बहन के बीच प्रेम की स्वीकारोक्ति के त्योहार रक्षा बंधन को हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक बनाया था। उन्होंने दोनों समुदायों को इस रक्षा सूत्र में ऐसा मजबूती से बाँधा कि दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे को राखी बाँधने लगे। इससे दोनों समुदायों के बीच प्रेम और भाईचारा बढ़ा, जिसने इतिहास रच दिया। दोनों समुदायों के अटूट प्रेम के सामने 1911 में अंग्रेजों को हार माननी पड़ी और बंगाल का विभाजन रद्द करके दोनों भागों का फिर से विलय करना पड़ा था।

रक्षा बंधन का इतिहास

रक्षा बंधन के त्योहार का इतिहास भी बड़ा रोचक और आश्चर्यजनक है। वैसे तो यह पर्व भाई और बहन के बीच पवित्र प्रेम को दर्शाता है, परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस पर्व की शुरुआत भाई-बहन के बीच रक्षा सूत्र बाँधने से नहीं हुई थी, बल्कि दो बहनों ने एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बाँधकर इसका प्रचलन शुरू किया था, यह दो बहनें भी सगी नहीं थी। आज के दिन ऐसे भाई हताश और निराश दिखाई देते हैं, जिनकी सगी बहन नहीं होती है, तो उनके लिये बता दूँ कि दो सौतेली बहनों से शुरू हुई यह परंपरा आगे बढ़ाने वाली भी सगी बहनें नहीं थी, बल्कि मुँहबोली बहनों ने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया है।

रानी कर्णावती ने भेजी थी हुमायूँ को राखी

रक्षा बंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा है और लगभग 6 हजार साल पुराना बताया जाता है। यह पर्व हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी अपनी भूमिका निभाता आया है। इतिहास के अनुसार मध्यकालीन युग में रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थी। चित्तौड़ के राजा की मृत्यु के बाद गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण करके उस पर कब्जा करने का षड़यंत्र रचा था, जिसका पता चलने पर रानी कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर उन्हें भाई संबोधित किया था और बहन के राज्य तथा प्रजा की रक्षा करने की अपील की थी, तब हुमायूँ ने उन्हें बहन स्वीकार किया था और अपनी सेना चित्तौड़ भेजी थी, परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी और आक्रमणकारी कर्णावती की हत्या कर चुके थे।

रक्षा बंधन का धार्मिक महत्व

वैसे तो रक्षा बंधन के त्योहार की नींव धार्मिक है और यह पवित्र श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसका उल्लेख पुराण आदि धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल यानी द्वापरयुग में भगवान श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था, जो बहुत दुष्ट राजा था। उससे युद्ध के दौरान श्री कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली में चोट लग गई थी और उसे घाव से खून बह रहा था। यह देखकर द्रुपद राजा की पुत्री द्रौपदी को दुःख हुआ और उन्होंने अपनी साड़ी चीरकर उसका टुकड़ा उनकी अँगुली पर बाँध दिया था। इससे खून बहना रुक गया था। तभी से श्री कृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। इस घटना के वर्षों बाद जब पांडव द्रौपदी को जुए में हार गये थे और भरी सभा में दुःशासन द्रौपदी का चीरहरण कर रहा था, तब श्री कृष्ण ने द्रौपदी के उस छोटे से टुकड़े के बदले में उनका चीर इतना बढ़ाया कि दुःशासन द्रौपदी का चीर हरण करते-करते थककर चूर हो गया और जमीन पर गिर पड़ा था। इस प्रकार भाई के रूप में श्री कृष्ण ने बहन द्रौपदी की रक्षा की थी।

You may have missed