तटस्थता दोधारी तलवार : कश्मीर पर विरोधी सुर निकालने वालों पर देश ‘शर्मशार’ !

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* ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा #ShameOnCongress

* राहुल ने फिर निभाई ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से यारी !

* अधीर रंजन ने संसद में कर दी कांग्रेस की फज़ीहत

रिपोर्ट : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 6 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। किसी भी मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाना हमेशा दोधारी तलवार के समान होता है। बात जब न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म या राष्ट्रहित-राष्ट्रअहित की हो, तब जनता के एक बड़े वर्ग में तो यह विवेक आसानी से जाग जाता है कि उसे किसी सरकार के निर्णय का साथ देना है या विरोध करना है, परंतु तटस्थतावादी ऐसे समय में अक्सर मौन को शस्त्र बना कर पलायनवाद का सहारा लेते हैं और ऐसी स्थिति में तटस्थता दोधारी तलवार सिद्ध होती है, जो किसी को भी पल भर में राष्ट्र प्रेमी की बजाए गद्दार सिद्ध कर देती है।

देश में इन दिनों राष्ट्रवाद का ख़ुमार छाया हुआ है। देश 15 अगस्त, 1947 को मनाए जाने वाले 73वें स्वतंत्रता दिवस से पहले ही कश्मीर की स्वतंत्रता की खुशियाँ मना रहा है। देश के हर शहर-गाँव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साहसिक नेतृत्व की सराहना हो रही है, वहीं गृह मंत्री अमित शाह की संसद में सुनी जा रही दहाड़ पर लोग वारे जा रहे हैं। मसला कश्मीर से धारा 370 हटाने के मोदी सरकार के अत्यंत क्रांतिकारी कदम का है।

गृह मंत्री अमित शाह ने जब धारा 370 हटाने के निर्णय की घोषणा की, तो पूरा भारत खुशी से झूम उठा, परंतु संसद का नज़ारा कुछ और ही था। अक्सर युद्ध और राष्ट्रहित या राष्ट्रवाद की बात पर राजनीतिक दल और उनके नेता दलगत व वोट बैंक की राजनीति को बेमन से भी भुला कर सरकार का साथ देते हैं। देश का हर नागरिक जाति-धर्म की दीवार तोड़ कर सरकार का साथ देता है। राष्ट्रहित की बात पर जो भी नेता या नागरिक सरकार का साथ देता है, उस पर तो देश के लोग फूल बरसाते हैं और जो लोग कुछ तथ्यों के साथ विरोध करते हैं, उनकी या तो आलोचना की जाती है या फिर उनके तथ्यों पर आधारित विरोध को लोगों का मन जायज मानता है, परंतु साथ तो फिर भी वह सरकार का ही देता है।

बात जब कश्मीर से धारा 370 हटाने की आई, तो पूरे देश में राष्ट्रवाद का ख़ुमार छा गया। ऐसे में देश के हर नागरिक ने मोदी-शाह की जोड़ी और उनके साहस को सलाम किया, परंतु कुछ तथाकथित तटस्थतावादी असमंजस में पड़ गए, जो अक्सर देश में व्यक्ति विरोधी राजनीति करते हैं। ऐसे लोगों के लिए मोदी-शाह की प्रशंसा करना मुश्किल था, तो उन्होंने तटस्थता का चोला ओढ़ लिया। वास्तविकता य है कि राष्ट्रहित की बात आने पर तटस्थता दोधारी तलवार बन जाया करती है। जो सेना सीमा पर जान लड़ा कर देश के हर नागरिक को सुरक्षित जीवन देती है, उस सेना का ऋण तटस्थतावादियों पर भी है। राष्ट्रहित के मामलों में हर नागरिक को कोई एक पक्ष तो लेना ही चाहिए।

‘अधीर’ कांग्रेस पर देश लज्जित !

जब से नरेन्द्र मोदी राजनीति में आए हैं, तब से गुजरात से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस को असमंजस में डालते रहे हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए भी मोदी ने कई कारनामे ऐसे किए, जिसे जान कर कांग्रेस हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़ नज़र आई। धारा 370 पर भी यही हुआ। शाह की घोषणा कांग्रेस पर मानो बम बन कर बरसी। उसके पास सिवाय आलोचना के कहने के लिए कुछ नहीं था। आलोचना करके देशवासियों की नज़र में पहले ही गिर चुकी कांग्रेस को लोकसभा में उसके नेता अधीर रंजन ने मुसीबत में डाल दिया। जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक पर चर्चा के दौरान अधीर रंजन ने जो कहा, उससे सोनिया गांधी भी चौंक गईं। अधीर रंजन ने अमित शाह को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप कहते हैं यह आंतरिक मामला है, जबकि मामला 1948 से यूएन की देखरेख में है। क्या ये वाकई आंतरिक मामला है ? हमने शिमला समझौता, लाहौर संधि की। क्या आंतरिक मामला है और क्या द्विपक्षीय ?’ अधीर रंजन के इस बयान के बाद कांग्रेस बुरी तरह फँस गई, क्योंकि देश की किसी भी सरकार या विपक्षी दल ने कभी नहीं कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक मामला नहीं है। इसके बाद तो अमित शाह ने अधीर रंजन की ख़बर ले ली और दो टूक शब्दों में कहा कि यह देश का आंतरिक मामला है, न कि यूएन का।

ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा शेमऑनकांग्रेस

अधीर रंजन के बयान और उसके बाद राहुल गांधी ने ट्वीट करके इस मामले में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, तो ट्विटर पर शेमऑनकांग्रेस ट्रेंड करने लगा। राहुल ने ट्वीट कर कहा कि देश लोगों से बनता है, टुकड़ों से नहीं। राहुल के इस ट्वीट पर भी लोगों ने उन्हें जम कर ट्रोल किया। भाजपा ने तो सीधे ही कहा कि राहुल गांधी के लिए जम्मू-कश्मीर केवल धरती का एक टुकड़ा है, तो ट्विटर पर यूज़र्स ने भी राहुल गांधी की जम कर आलोचना की। ट्विटर पर शेमऑनकांग्रेस जम कर ट्रेंड करने लगा। आप भी देखिए, लोगों की प्रतिक्रियाएँ :

https://twitter.com/BhauIndian/status/1158644213166301184?s=20
https://twitter.com/priyanarayan123/status/1158643815965589504?s=20

ममता से बेहतर सिद्ध हुईं केजरी-माया !

अब बात करते हैं तीन वर्षों तक मोदी विरोधी राजनीति करने के बाद भी उन्हें सत्ता में वापसी से रोकने में नाकाम रहने वाले नेताओं की, जिनमें सबसे बड़ा नाम आता है ममता बनर्जी का। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर ममता बनर्जी का कोई रुख ही नहीं है। ममता ने तटस्थतावाद अपनाया। उन्होंने कहा कि वे मोदी सरकार के इस फ़ैसले का न विरोध करती हैं, न समर्थन। दूसरी तरफ मोदी विरोधी टोली में शामिल मायावती और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता वास्तव में गुणी सिद्ध हुए। दोनों नेताओं ने मोदी सरकार के फ़ैसले का समर्थन कर देश और अपने राज्यों की जनता का दिल जीत लिया।

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