वो आज़ाद थे और आज़ाद ही रहे : अंग्रेजों के कभी हाथ नहीं आया यह क्रांतिकारी !

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विनीत दुबे

अहमदाबाद, 23 जुलाई 2019 (युवाPRESS)। जब भारत अंग्रेजों की गुलामी का दंश झेल रहा था, उस समय देश को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद कराने के लिये यूँ तो क्रांति की कई मशालें जली थी, मगर उनमें भी एक मशाल बेहद खास थी, जिसे भारत का कोई ‘लाल’ कभी नहीं भूल सकता और अंग्रेज क्रांति की उस मशाल को कभी याद नहीं करना चाहेंगे, जो भारत की आज़ादी के इतिहास में एक मिशाल बन गये। अंग्रेजों के दाँत खट्टे करने वाला वह नौजवान लाख कोशिशों के बावजूद जीवित कभी उनके हाथ नहीं लगा। क्योंकि वह नौजवान ‘आज़ाद’ था और आजीवन आज़ाद ही रहा। हम क्रांतिकारियों के कई नारों को आज भी याद करते हैं। चंद्रशेखर आज़ाद का नारा था ‘मैं आज़ाद हूँ और आज़ाद ही रहूंगा।’ सचमुच उन्होंने अपना वादा पूरी तरह से निभाया। आज़ाद की एक और खासियत यह थी कि वह जो कहते थे, वही करते थे।

ज़रा याद करो कुर्बानी !

23 जुलाई का दिन भारत के उन्हीं क्रांतिवीर चंद्रशेखर आज़ाद को याद करने का दिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई देने का (HAPPY BIRTHDAY) कहने का दिन है। अनेक क्रांतिकारियों का वंश आज भी मौजूद है, मगर यह बड़े अफसोस की बात है कि आज़ादी की अलख जगाने वाले अमर जवान चंद्रशेखर आज़ाद का कोई वंशज हमारे बीच मौजूद नहीं है। चंद्रशेखर आज़ाद एक कान्यकुब्जी ब्राह्मण थे। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव के रहने वाले थे। हालाँकि 20वीं सदी के प्रारंभ में इस क्षेत्र में भीषण अकाल की परिस्थिति का निर्माण हुआ, जिसके चलते सीताराम तिवारी अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश के अलीराज पुर जिले के भाबरा गाँव में आकर बस गये थे। पंडित सीताराम तिवारी अलीराज पुर रियासत में नौकरी करते थे। भाबरा एक आदिवासी बहुल गाँव था। इसी गाँव में 23 जुलाई-1906 को पंडित सीताराम तिवारी के यहाँ पहले बालक का जन्म हुआ था, जिसका नाम उन्होंने चंद्रशेखर तिवारी रखा था। चंद्रशेखर का बचपन आदिवासियों के बीच गुजरा और उन्होंने उनसे धनुष-बाण चलाने की विद्या सीखी। आज़ाद महात्मा गांधी के आज़ादी के आंदोलन से काफी प्रभावित थे। दिसंबर-1921 में जब आज़ाद महज 14 साल के थे, तब से ही वह गांधीजी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा बन गये थे। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार भी किया था और मजिस्ट्रेट के सामने पेश भी किया गया था, जहाँ उन्होंने मजिस्ट्रेट को सवालों के जवाब ऐसे अंदाज़ में दिये कि जिन्हें सुनकर मजिस्ट्रेट भी हिल गया था। जब मजिस्ट्रेट ने बालक से उसका नाम पूछा तो उन्होंने सामान्य बच्चे की तरह अपना नाम चंद्रशेखर तिवारी नहीं बताया, बल्कि जवाब दिया ‘आज़ाद।’ जब मजिस्ट्रेट ने बच्चे से पिता का नाम पूछा तो उसका जवाब था स्वतंत्रता। घर का पता पूछने पर आज़ाद ने जवाब दिया जेलखाना। बच्चे के इन जवाबों से मजिस्ट्रेट तिलमिला गया और इस प्रकार आज़ादी की लड़ाई में सबसे पहले आज़ाद को 15 कोड़े मारने की सज़ा सुनाई गई। उन्होंने हर कोड़े की मार पर ‘वंदे मातरम्’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाए। उनके इस जवाब के बाद से ही आंदोलनकारियों में उनका नाम आज़ाद प्रचलित हो गया था।

14 की आयु में जुड़े स्वतंत्रता संग्राम से

हालाँकि 2 साल बाद 1922 में जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया तो आज़ाद उनसे नाराज़ हो गये। इसके बाद आज़ाद ने अपने दम पर देश को आज़ाद कराने की ठान ली। एक युवा क्रांतिकारी ने उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारी दल के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से मिलाया। बिस्मिल ने 1925 में इस एसोसिएशन की स्थापना की थी। आज़ाद बिस्मिल के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। उनके समर्पण और निष्ठा को देखते हुए बिस्मिल ने आज़ाद को अपनी संस्था का सक्रिय सदस्य बनाया। आज़ाद क्रांतिकारी आंदोलनों के लिये अपने साथियों के साथ मिलकर धन एकत्रित करने का काम करते थे। अधिकतर धन वह अंग्रेजी सरकार से लूटते थे। इसी साल काकोरी कांड ने अंग्रेजों को बुरी तरह से हिलाकर रख दिया था। इस मामले में अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल सहित कई मुख्य क्रांतिकारियों को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई। इसके बाद आज़ाद ने इस एसोसिएशन का पुनर्गठन किया। भगवतीचरण वोहरा के संपर्क में आने के बाद आज़ाद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के भी करीब आए। भगत सिंह के साथ मिलकर आज़ाद अंग्रेजी हुकूमत के लिये दहशत का पर्याय बन गये थे। आज़ाद ने एक निर्धारित समय के लिए बुंदेलखंड को अपना गढ़ बनाया था और वह झांसी तथा झांसी से पंद्रह कि.मी. दूर स्थित ओरछा के जंगलों में रहे, जहां उन्होने निशानेबाजी के जौहर अपने साथियों को सिखाए। वह निशानेबाज होने के कारण उन्होंने साथी क्रांतिकारियों को उसका प्रशिक्षण दिया तथा पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से बच्चों को पढ़ाने का काम भी किया। वह धिमारपुर गाँव में छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हुए थे। झांसी में रहने के दौरान उन्होंने गाड़ी चलाना सीखा था।

अंग्रेज़ों के हाथों मौत भी गँवारा नहीं

फरवरी-1931 में पहली बार गणेश शंकर विद्यार्थी के कहने पर वह इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरू से मिलने के लिये आनंद भवन पहुँचे थे। परंतु नेहरू ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। इसके बाद गुस्से में वह वहाँ से एल्फ्रेड पार्क चले गये। इस समय उनके साथ सुखदेव भी थे। यहाँ पर वह अपनी अगली रणनीति बना रहे थे, तभी किसी की मुखबिरी से अंग्रेजों की एक टुकड़ी ने उन्हें घेर लिया। आज़ाद ने खतरे को भाँप लिया और सुखदेव को वहाँ से सुरक्षित निकाल दिया। इसके बाद वह अकेले ही अंग्रेजों पर टूट पड़े। परंतु जब उन्होंने देखा कि अब उनके पास आखिरी गोली बची है और वह कह चुके हैं कि वह आज़ाद हैं और आज़ाद ही रहेंगे तो अब अंग्रेजों के हाथ नहीं आना है। इसलिये उन्होंने वह गोली खुद को मार ली और आज़ादी के लिये शहीद हो गए। वह 27 फरवरी-1931 का दिन था। उनके बलिदान को भारत कभी नहीं भूल सकता। उनकी शहादत के बाद इस पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आज़ाद पार्क कर दिया गया है और उत्तर प्रदेश के जिस गाँव में वह रहे थे उसका नाम धिमारपुरा से बदलकर आज़ादपुरा रखा गया है। झांसी और इलाहाबाद में उनकी प्रतिमाएं तथा स्मारक स्थापित किये गये हैं। आज़ाद से पहले ही उनके छोटे भाई का देहांत हो चुका था। उनके पिता और माता के देहांत के साथ ही उनका वंश खत्म हो गया।

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