50 वर्ष – 190 मिशन : ‘19’ विफलताओं के बावजूद हर बार ‘21’ बन कर उभरा ISRO

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विशेष टिप्पणी : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 7 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (INDIAN SPACE RESEARCH ORGANISATION – ISRO) ने अपने 50 साल के इतिहास में बार-बार साबित किया है कि जब भी उसे किसी मिशन में असफलता मिली है, तब-तब वह ताकतवर बन कर उभरा है। 1959 से शुरू हुए इसरो ने 2019 तक 50 वर्ष की अपनी यात्रा में 19 विफलताओं का सामना किया है, परंतु इन सभी विफलताओं के बाद वह ‘इक्कीस’ बन कर ही बाहर आया है। चंद्रयान-2 के मामले में भी इसरो से यही उम्मीद लगाई जा रही है कि वह कमियों का पता लगा कर उनसे सीख लेगा तथा उन कमियों को दूर करके फिर चांद की ओर और ताकत से आगे बढ़ेगा तथा सफलता अर्जित करके ही दम लेगा। पूरा देश इस मामले में इसरो के साथ खड़ा है। करोड़ों देश वासियों की आशाओं, अपेक्षाओं के साथ-साथ इसरो को उनका शक्तिशाली समर्थन भी प्राप्त है, जो इसरो का हौसला बढ़ाने का काम करता है।

8 विफलताओं के बावजूद 75 लॉन्चर मिशन किये

अपने शुरुआती दौर में इसरो ने पहले उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने के लिये लॉन्चर वेहिकल विकसित करने पर ध्यान केन्द्रित किया था। शुरुआती दौर में उसे इसमें नाकामी भी मिली, परंतु 8-8 विफलताओं के बावजूद इसरो ने हिम्मत नहीं हारी और काम करना जारी रखा, जिसके परिणाम स्वरूप वह 75 में से 67 लॉन्चर वेहिकल तैयार करने में सफल हुआ। सीमित संसाधनों के बावजूद इसरो ने देश को दुनिया में प्रतिष्ठा दिलाई और अपना अंतरिक्ष प्रक्षेपण केन्द्र स्थापित करने की बड़ी कामयाबी हासिल की है।

1 इसरो ने 35 किलो का पहला रोहिणी टेक्नोलॉजी पेलोड (RTP) जो कि एक प्रायोगिक उपग्रह था, उसे अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने के लिये SLV-3E1 लॉन्चर पर काम किया था, परंतु यह लॉन्चर 10 अगस्त-1979 को उपग्रह को निश्चित कक्षा में लॉन्च करने में विफल रहा। लॉन्चर की विफलता के कारण रोहिणी टेक्नोलॉजी पेलोड उपग्रह भी असफल हो गया था।

2 इसी प्रकार ऑगममेंटेड सैटेलाइट लॉन्च वाहन (ASLV)-D1, 24 मार्च-1987 को वैज्ञानिक उपकरणों के साथ SROSS-1 सैटेलाइट ले जाने वाली पहली डेवलपमेंट फ्लाइट थी, जो सफल नहीं हो सकी।

3 इसके अगले साल 13 जुलाई-1988 को ऑगममेंटेड सैटेलाइट लॉन्च वाहन (ASLV)-D2 को वैज्ञानिक उपकरणों के साथ SROSS-2 सैटेलाइट ले जाने वाली दूसरी डेवलपमेंटल फ्लाइट भी सफल नहीं हो सकी थी।

4 तत्पश्चात् PSLV की पहली डेवलपमेंट फ्लाइट थी PSLV-D1, जिसके द्वारा 20 सितंबर-1993 को प्रक्षेपित IRS-1E उपग्रह को भी निश्चित कक्षा में नहीं रखा जा सका। इस PSLV-D1 फ्लाइट में आई समस्याओं के कारण ही यह मिशन सफल नहीं हो पाया था।

5 इसके पश्चात् इनसैट – 4C को लॉन्च वेहिकल GSLV-F2 के साथ, 10 जुलाई-2006 को सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र (SHAR) श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। चूँकि यह GSLV-F2 लॉन्च वेहिकल मिशन को पूरा नहीं कर पाया, इसलिये इनसैट-4C का मिशन भी असफल हो गया।

6 GSLV-D3 इसरो के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वेहिकल (GSLV) की छठी और डेवलपमेंटल फ्लाइट की तीसरी उड़ान थी। इस उड़ान में GSLV को 2220 किलो का एक प्रयोगात्मक उन्नत प्रोद्योगिकी संचार GSAT-4 उपग्रह लॉन्च करना था। GSLV-D3 को 15 अप्रैल-2010 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से लॉन्च किया गया था। यह परीक्षण भी असफल रहा था।

7 इसी साल के अंत में 25 दिसंबर-2010 को GSLV-F6 का उद्देश्य GSAT-5P को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में इंजेक्ट करना था, परंतु GSAT-5P को कक्षा में नहीं रखा जा सका, क्योंकि लॉन्च वेहिकल GSLV-F6 अपना मिशन पूरा नहीं कर सका।

8 इसके बाद भारत के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेप वाहन (PSLV-C39) की इकतालीसवीं उड़ान 31 अगस्त-2017 की शाम सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से शुरू हुई। 1900 HRS (7:00 अपराह्न) पर PSLV-C39 के लिफ्ट-ऑफ के समय कुछ भी असामान्य नहीं था और सभी फ्लाइट इवेंट्स तय योजना के अनुसार पूरे हुए, परंतु हीट शील्ड सेपरेशन सफल नहीं हुआ और इसी के चलते मिशन नाकाम हो गया। इस प्रकार इसरो ने अभी तक 75 लॉन्चर मिशन पर काम किया, जिनमें से 8 में उसे विफलता मिली। इसके बावजूद उसका हौसला बुलंद रहा और उसने 75 में से 67 लॉन्चर मिशन को कामयाब बनाया।

11 विफलताओं के बावजूद 115 स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किये

इसी प्रकार स्पेसक्राफ्ट मिशन में भी शुरुआती दौर में झटके लगने के बावजूद इसरो ने विफलताओं से सीखते हुए सफलताओं के नये आयामों को हासिल किया। 2008 में चंद्रयान-1 के बाद 2013 में मंगल यान, 2019 में एंटी सैटेलाइट मिसाइल शक्ति और चंद्रयान-2 के बाद अब इसरो का अगला लक्ष्य 2022 में सूर्य की कक्षा में यान भेजना है। यह ऐसी उपलब्धियाँ हैं, जो दुनिया के गिने-चुने देशों को ही हासिल हैं। उनमें इसरो ने भी अपनी सूझ-बूझ और कुशलता से अपनी जगह बनाई है। आज दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारतीय इसरो का ही अंतरिक्ष विज्ञान में डंका बजता है। इसका श्रेय इसरो के सफल और कुशल वैज्ञानिकों को ही जाता है, जिन पर पूरा देश गर्व करता है।

1 जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं, पहले लॉन्चर मिशन की विफलता के साथ ही इसरो को रोहिनी टेक्नोलॉजी पेलोड (RTP) को सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से लॉन्च किया गया था, परंतु इच्छित कक्षा में नहीं रखे जाने से यह मिशन असफल हो गया था।

2 इनसैट-1A को 10 अप्रैल-1982 को डेल्टा द्वारा लॉन्च किया गया था, परंतु सितंबर-1983 में जब उसका एटीट्यू कंट्रोल प्रोपेलेंट क्षीण हो गया, तो इस मिशन को त्याग दिया गया था।

3 ASLV की पहली डेवलपमेंटल फ्लाइट में 24 मार्च-1987 को लॉन्च किया गया SROSS-1 उपग्रह कक्षा तक नहीं पहुँच पाया था और मिशन विफल हो गया था।

4 ASLV की दूसरी डेवलपमेंटल फ्लाइट में 13 जुलाई-1988 को लॉन्च किया गया SROSS-2 उपग्रह भी कक्षा तक नहीं पहुँच पाया था और मिशन विफल हो गया था।

5 इनसैट-1C मिशन को पूरी तरह से विफल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक तरफ 6C – बैंड ट्रांसपोंडर और 2 S – बैंड ट्रांसपोंडर खो गये, वहीं दूसरी तरफ मौसम सम्बंधी छवियाँ और डेटा संग्रहण सिस्टम सुचारू रूप से काम करते रहे। यह मिशन 22 जुलाई-1988 को लॉन्च हुआ था।

6 IRS-1E PSLV की 20 सितंबर-1993 को लॉन्च हुई पहली फ्लाइट थी। PSLV-D1 द्वारा प्रक्षेपित IRS-1E उपग्रह को कक्षा में नहीं रखा जा सका। लॉन्च वेहिकल में आई समस्याओं के कारण यह मिशन सफल नहीं हो सका।

7 INSAT-2D, INSAT-2C के ही समरूप था। 4 जून-1997 को लॉन्च किये गये इस उपग्रह ने 4 अक्टूबर-1997 के बाद काम करना बंद कर दिया था।

8 इनसैट-4C को लॉन्च वेहिकल GSLV-F2 के साथ, 10 जुलाई-2006 को सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र (SHAR) श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। चूंकि, GSLV-F2 लॉन्च वेहिकल मिशन पूरा नहीं कर सका, इसलिये इनसैट-4C का मिशन भी नाकाम हो गया।

9 GSAT-4 भारत का उन्नीसवाँ जियोस्टेशनरी और GSAT श्रृंखला का चौथा उपग्रह था। GSAT-4 मूल रूप से एक प्रयोगात्मक उपग्रह था, जिसे कक्षा में नहीं रखा जा सका, क्योंकि इसका लॉन्च वेहिकल GSLV-D3 ही अपना मिशन पूरा नहीं कर सका। यह मिशन 15 अप्रैल-2010 को लॉन्च हुआ था।

10 इसी प्रकार GSAT-5P, GSAT श्रृंखला में लॉन्च किया गया पांचवाँ उपग्रह था। GSAT-5P को कक्षा में नहीं रखा जा सका, क्योंकि इसका लॉन्च वेहिकल GSLV-F6 अपना मिशन पूरा नहीं कर पाया था। यह मिशन 25 दिसंबर-2010 को लॉन्च हुआ था।

11 IRNSS-1H को PSLV-C39 द्वारा 31 अगस्त-2017 को लॉन्च किया जाना था, परंतु PSLV-C39 लॉन्चर मिशन के साथ-साथ यह मिशन भी असफल रहा था।

अब 2019 में चंद्रयान-2 की चांद की धरती पर सॉफ्ट लैंडिंग नहीं हो पाई है, परंतु इस मिशन को विफलता की श्रेणी में नहीं रखा गया है, क्योंकि लैंडर विक्रम यानी चंद्रयान-2 की चांद की धरती पर लैंडिंग नहीं हो पाई, परंतु ऑर्बिटर अभी भी चांद के आसपास घूम रहा है, जिससे इसरो को एक वर्ष तक चांद के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध होती रहेंगी। इसरो के कथनानुसार विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर के रूप में उसे मात्र 5 प्रतिशत नुकसान हुआ है और 95 प्रतिशत मिशन मून सफल रहा है। इसलिये इसे नाकामी नहीं कहा जा सकता है। आशा व्यक्त की जा रही है कि अपने स्वभाव के अनुरूप इसरो एक बार फिर इक्कीस साबित होकर दिखाएगा और चांद की धरती पर उतरकर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के उन सक्षम देशों की पंक्ति में अपना नाम दर्ज कराएगा, जिन्होंने चांद पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की है।

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