VIDEO : CAB पर बोले अमित शाह, ‘जब इंदिरा गांधी केवल बांग्लादेशियों के लिए दरवाज़े खोल सकती हैं तो…’

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रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह (AMIT SHAH) ने आखिरकार सोमवार को नागरिकता संशोधन बिल यानी सिटीज़नशिप अमेंडमेंट बिल (CAB) लोकसभा (LOK SABHA) में पेश कर दिया। हालांकि पहले से ही माना जा रहा था कि इस बिल को लाना सरकार के लिये आसान नहीं होगा, वैसा ही हुआ। कांग्रेस और ममता बैनर्जी (MAMATA BANERJEE) की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TRINAMOOL CONGRESS-TMC) के सांसदों ने बिल को सदन में पेश किये जाने का विरोध किया। इसलिये बिल को लाने के लिये वोटिंग करानी पड़ी। चूंकि लोकसभा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है, इसलिये उसे वोटिंग में कोई दिक्कत नहीं हुई। लोकसभा में 375 सांसद उपस्थित थे, जिन्होंने मतदान किया। बिल के पक्ष में 293 और बिल के विरोध में 82 वोट पड़े। इस प्रकार बहुमत के बल पर बिल लोकसभा में पेश हो गया और इसी के साथ सरकार पहली परीक्षा में पास भी हो गई। इसके बाद गृह मंत्री ने इस विधेयक को लेकर हंगामा करने वाली कांग्रेस को करारे जवाब देकर चारों खाने चित्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विधेयक न तो संविधान के विरुद्ध है और न ही अल्पसंख्यकों के विरुद्ध है। कांग्रेस ने इस प्रकार का माहौल बनाया है, जिससे बिल का विरोध हो। जबकि कांग्रेस ही जिम्मेदार है, जिसके कारण इस सरकार को यह बिल लाने की जरूरत पड़ी। इसके बाद कांग्रेस ने विधेयक के विरोध में जो-जो दलीलें रखीं, उनका शाह ने एक-एक करके ऐसा जवाब दिया कि कांग्रेस को उसी के मुद्दे भारी पड़ गये। जानिए कैसे ?

पहले तो कांग्रेस सांसदों ने ही वोटिंग कराने की माँग की, जिसमें उसे झटका लगा और वोटिंग में बिल पास हो गया। इसके बाद कांग्रेस की ओर से उठाए गये मुद्दों का शाह ने कुछ इस तरह जवाब दिया।

कांग्रेस : लोकसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने नागरिकता संशोधन विधेयक को लोकसभा में पेश करने का ही विरोध किया और कहा कि यह विधेयक भारतीय संविधान की धारा 14 के विरुद्ध है। यह विधेयक संविधान की प्रस्तावना और नागरिकों को दिये गये मूल अधिकारों के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि संसद को इस तरह के विधेयक पर चर्चा करने का अधिकार ही नहीं है। यह विधेयक तो भारतीय गणतंत्र के मूलभूत मूल्यों का उल्लंघन करने वाला है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हमारी राष्ट्रीयता का निर्णय धर्म के आधार पर होगा ? यह विधेयक संविधान की मूल भावना और प्रस्तावना दोनों का उल्लंघन करता है।

अमित शाह : इसके जवाब में विधेयक सदन में पेश करने वाले गृह मंत्री अमित शाह ने सदन के नियम 72(1) का उल्लेख करते हुए जवाब दिया कि यह विधेयक किसी भी आर्टिकल का उल्लंघन नहीं करता है। आप अनुच्छेद 11 को पूरा पढ़िए। फिर शाह ने कहा कि सभी विपक्षी सदस्यों का कहना है कि यह विधेयक आर्टिकल 14 के विरुद्ध है और कुछ सदस्यों को लगता है कि इस विधेयक से समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है तो यह उनकी भूल है। इसके बाद शाह ने कांग्रेस पर हमलावर रवैया अपनाते हुए कहा कि कांग्रेस ही वह दल है, जिसने धर्म के आधार पर देश का विभाजन किया। इस बिल की जरूरत नहीं पड़ती, यदि कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया होता। उन्होंने कांग्रेस पर धर्म के आधार पर देश की जनता को बाँटने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि 1971 में जब पाकिस्तान का विभाजन हुआ था और पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना था, तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ही यह निर्णय किया था कि बांग्लादेश से जितने भी लोग भारत में आये हैं, उन सभी लोगों को नागरिकता दी जाए। उन्होंने पाकिस्तान से आये लोगों को नागरिकता देने की बात क्यों नहीं की ? उस समय भी तो आर्टिकल 14 था ही, फिर केवल बांग्लादेश ही क्यों ? यह विधेयक भी बांग्लादेश के लोगों के लिये तो है ही, पाकिस्तान और अफग़ानिस्तान के लोगों के लिये भी है, जहाँ अल्पसंख्यकों का नरसंहार अब तक रुका नहीं है। वहाँ आज भी अल्पसंख्यकों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है।

इसके बाद शाह ने इंदिरा गांधी को लेकर ही कांग्रेस को फिर घेरे में लिया और कहा कि बांग्लादेश के बाद युगांडा से आये सारे लोगों को कांग्रेस शासन में नागरिकता दी गई, तब भी इंग्लैंड से आये लोगों को नागरिकता क्यों नहीं दी गई थी ? धार्मिक और क्षेत्रीय नागरिकता के मुद्दे पर भी शाह ने हमलावर रवैया अपनाए रखा और कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि हर बार तार्किक वर्गीकरण के आधार पर ही नागरिकता दी जाती रही है। दुनिया भर में विभिन्न देश अलग-अलग आधार पर नागरिकता देते हैं। जब कोई देश कहता है कि उसके देश में निवेश करने वालों को वह नागरिकता देगा तो क्या वहाँ समानता का संरक्षण होता है क्या ? यहाँ (भारत में) अल्पसंख्यकों को अपना शैक्षणिक संस्थान चलाने का अधिकार है तो क्या समानता के कानून के विरुद्ध है ?

शाह ने स्पष्ट कहा कि भारत के तीनों पड़ोसी राज्य बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफग़ानिस्तान ने खुद को इस्लामिक राष्ट्र घोषित किया है। उन्होंने अपने संविधान में इस्लाम को राज्य का धर्म (इस्लामिक रिपब्लिक) बताया है। 1950 में नेहरू-लियाकत समझौता हुआ था, जिसमें दोनों देशों ने अपने यहाँ अल्पसंख्यकों के संरक्षण का संकल्प लिया था। भारत ने इस संकल्प का गंभीरता से पालन किया, परंतु पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे जोर-जुल्म से पूरी दुनिया वाकिफ है। तीनों पड़ोसी देशों में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई आदि सभी अल्पसंख्यक धर्मावलंबियों के विरुद्ध धार्मिक प्रताड़ना हो रही है।

उल्लेखनीय है कि इस बिल के अनुसार पड़ोसी देशों से भारत में आने वाले हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई आदि शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। क्योंकि पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहे हैं। इस बिल के अनुसार पड़ोसी देशों से भारत में आने वाले अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है, जिसके लिये पहले उन्हें 11 वर्ष तक का इंतज़ार करना पड़ता था। अब नये प्रावधान के अनुसार उन्हें 6 साल भारत में रहने पर नागरिकता दी जाएगी। महाराष्ट्र में सत्ता की लड़ाई में पाला बदलने वाली शिवसेना ने भी इस बिल को लेकर भाजपा सरकार का समर्थन किया है। हालाँकि उसने यह भी कहा कि शरणार्थियों को मताधिकार नहीं देना चाहिये।

और क्या कुछ कहा अमित शाह ने…यहाँ सुनिये।

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