अमेरिका-चीन की लड़ाई से पूरी दुनिया पर मंडरा रहा मंदी का साया, परंतु भारत के लिए है यह राहत की ख़बर, जानिए कैसे ?

अमेरिका और चीन के बीच एक दूसरे की चीजों पर शुल्क बढ़ाने की होड़ वैश्विक अर्थ व्यवस्था के लिये संकट पैदा कर रही है और दुनिया पर एक बार फिर से 2008 जैसी भारी आर्थिक मंदी का खतरा मंडराने लगा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ के अनुसार 2019 में आर्थिक संकट गहरा सकता है और यह 2020 में भी जारी रह सकता है। गीता गोपीनाथ की रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान वैश्विक माहौल अत्यंत नाजुक स्थिति में है और अर्थ व्यवस्था की वृद्धि दर को बड़ा झटका लगने के आसार हैं।

IMF की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ (फाइल चित्र)

यद्यपि भारत के लिये राहत की खबर यह है कि भारत और इंडोनेशिया दुनिया की अन्य अर्थ व्यवस्थाओं की तुलना में अच्छी स्थिति में हैं। रेटिंग एजेंसी मूडीज के अनुसार इन दोनों देशों में ग्रोथ जारी रहेगा। भारतीय रिजर्व बैंक वर्तमान मौद्रिक नीति के रुख पर स्थिर रहेगा। भारतीय अर्थ व्यवस्था की विकास दर वर्ष 2019-20 के दौरान 7.3 से 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है और इस तरह भारत पर इस मंदी का असर कम रहेगा।

उल्लेखनीय है कि इससे विश्व बैंक (WB) भी आर्थिक मंदी को लेकर दुनिया को सावधान कर चुका है। अर्थशास्त्रियों का भी कहना है कि दुनिया भर की अर्थ व्यवस्थाओं पर फिर से संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक इस मंदी का बड़ा कारण बढ़ता कर्ज है, जिसकी वजह से बैंकिंग सिस्टम चरमरा गया है।

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अर्थशास्त्रियों के अनुसार अमेरिका और चीन एक दूसरे के उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने में लगे हैं। चीन ने अमेरिका से आने वाले मांस, सब्जियों पर शुल्क बढ़ाने की शुरुआत की, तो उधर अमेरिका ने चीन से आनेवाले स्टील, टेक्सटाइल्स और तकनीक पर शुल्क बढ़ा दिया। दोनों देशों का यह विवाद लगभग 360 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। आईएमएफ के अनुमान के मुताबिक दोनों देशों की यह होड़ अमेरिका की जीडीपी को 0.9 प्रतिशत और चीन की जीडीपी को 0.6 प्रतिशत तक कमजोर कर सकती है।

अमेरिका ब्याज दर बढ़ा कर भी वैश्विक अर्थ व्यवस्था को मंदी की तरफ धकेल रहा है। वैश्विक अर्थ व्यवस्था में कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत हिस्सा उभरते बाजारों से आता है। ऐसे अधिकांश बाजारों में विदेशी मुद्रा और डॉलर का प्रभाव रहता है। ऐसी स्थिति में जब अमेरिका ब्याज बढ़ाता है तो पैसा बाहर जाने लगता है और यह बाजार कमजोर होने लगते हैं। अभी तुर्की और अर्जेंटीना में यही हालात देखने को मिल रहा है।

वर्ष 2008 के बाद अभी तक दुनिया में कर्ज 60 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। इसमें डूबा हुआ कर्ज और विकासशील देशों की अर्थ व्यवस्थाओं में लगभग 1,82,000 करोड़ डॉलर की रकम सरकारी तथा निजी क्षेत्र में कर्ज के तौर पर फंसी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि अर्थ व्यवस्था चरमरा गई तो कर्ज की भरपाई करने के लिये कमजोर अर्थ व्यवस्थावाले देशों के पास पर्याप्त पूंजी होगी।

दुनिया भर में बढ़ते कर्ज के कारण बैंकिंग सिस्टम चरमराने लगा है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) के मुताबिक बैंकिंग सेक्टर के अलावा यूरोपीय संघ (EU) में वित्तीय संस्थाएं भी लेन-देन में सक्रिय हो गई हैं, ऐसे में शेडो बैंक लगभग 40 प्रतिशत वित्तीय लेन-देन के लिये जिम्मेदार है। इतना ही नहीं, कई वित्तीय संस्थाओं के पास इस खतरे से निपटने के लिये पर्याप्त पूंजी भी नहीं है।

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