महिलाओं को ‘अभयदान’ देने में कितनी सफल रही ‘निर्भीक’ ?

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रिपोर्ट : तारिणी मोदी

अहमदाबाद 3 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। 12 दिन बाद वह ख़ौफनाक दिन यानी 16 दिसंबर आने वाला है, जब देश की बेटियों के साथ पूरा विश्व सिहर गया था। 16 दिसंबर, 2012 की वह काली रात. जिसे याद कर आज भी दिल काँप उठता है। तब से सरकार और कुछ जागृत लोगों ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे Help Line Number, Mobile App आदि। इसी क्रम में कानपुर की फील्ड गन फैक्ट्री ने महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए एक पिस्तौल का निर्माण किया, जिसका नाम निर्भया से प्ररित होकर ‘निर्भीक’ रखा गया। लगभग 1 वर्ष पश्चात यानी 6 जनवरी, 2014 को कानपुर में ही “निर्भीक हैंडगन” का उद्घाटन किया गया। निर्भीक को मजबूत और आसान आत्मरक्षक हथियार के रूप में लॉन्च किया गया था, जिसे महिलाएँ पर्स में रख सकती हैं।

उद्घाटन के बाद काफी तेज़ी से महिलाओं में पिस्तौल खरीदने की ललक देखी गई, जो धीरे-धीरे समाप्त भी हो गई। वर्तमान में हैदराबाद में घटे प्रियंका रेड्डी दुष्कर्म कांड के बाद पूरे देश में फिर एक बार महिला सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसीलिए निर्भीक का स्मरण हो आया, परंतु प्रश्न यह उठता है कि दिल्ली के निर्भया कांड के बाद महिलाओं को आत्मरक्षा के मामले में निर्भीक बनाने के लिए निर्मित निर्भीक पिस्तौल आख़िर अपने उद्देश्य में सफल क्यों न हो सकी ? इसका सबसे प्रमुख कारण है हमारे देश में जागरूकता की कमी। अक्सर देश किसी निश्चित समयावधि के लिए किसी एक मुद्दे पर एकजुट हो जाता है, परंतु समय के साथ सब अपनी-अपनी रूटीन लाइफ में लौट जाते हैं। निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा मात्र के उद्देश्य से तैयार की गई निर्भीक पिस्तौल के साथ भी यही हुआ। इतना ही नहीं, निर्भीक के लिए उसका महंगा होना भी उसे महिलाओं की पहुँच से दूर रखने का प्रमुख कारण है।

पाँच वर्षों में बिकी 3000 निर्भीक पिस्तौल

जनवरी 2014 से जुलाई 2019 तक के आँकड़ों के अनुसार अब तक 3000 निर्भीक पिस्तौल बेचे गये हैं। यह आँकड़ा छोटा लगता है, परंतु यदि भारत में सीमित संख्या में गन लाइसेंस जारी किए जाने की तरह किसी भी पिस्तौल की बिक्री 1,000 यूनिट के पार हो जाती है, तो इसे ब्लॉकबस्टर माना जा सकता है। फील्ड गन फैक्ट्री के अतिरिक्त महाप्रबंधक संजीव कुमार के अनुसार 70 से 75 प्रतिशत पिस्तौल पंजाब के गन डीलर्स को बेची जा रही है। इस पिस्तौल को खरीदने में दिल्ली की महिलाएँ सबसे आगे है। हरियाणा, पश्चिमी यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर और मध्य प्रदेश से भी महिलाओं और पुरुषों दोनों ने निर्भीक पिस्तौल खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। यद्यपि संजीव कुमार निर्भीक की बिक्री में वृद्धि को ब्लॉकबस्टर बता रहे हैं, परंतु वास्तव में देश में निर्भया कांड से पूर्व और उसके बाद लगातार बढ़ते महिला विरोधी अपराधों का ग्राफ देखा जाए, तो इस पिस्तौल की बिक्री का आँकड़ा कहीं ऊँचा होना चाहिए था।

क्या है विशेषता निर्भीक की ?

निर्भीक का भार 500 ग्राम है, जबकि सामान्य तौर पर एक पिस्तौल का भार 700 ग्राम होता है। भार में हल्की और रखरखाव में आसान इस पिस्तौल की विशेषता है। निर्भीक को टाइटेनियम एलॉय मेटल से बनाया गया है, जो जंगरोधक है। इसी वज़ह से इसका रख-रखाव करना काफी आसान है। निर्भीक आसानी से 10-15 मीटर के दायरे में निशाना लगा सकता है। निर्भीक 0.32 से 7.65 मिमी बोर कैलिबर और 6 बुलेट के साथ आती है। हालाँकि इसका मूल्य अन्य पिस्तौलों से अधिक है। जहाँ सामान्य पिस्तौल का मूल्य 1 लाख रुपये होता है, वहीं निर्भीक के लिए महिलाओं को 1.20 लाख रुपये देने पड़ते थे। इतना ही नहीं, जीएसटी लागू होने के बाद इसका मूल्य बढ़कर 1.40 लाख रुपये हो गई है।

कैसे ख़रीदी जा सकती है निर्भीक ?

निर्भीक खरीदने के लिए सबसे पहले आपको हथियार रखने का लाइसेंस चाहिए। आवेदक की उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए और उसका कोई अपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए। यह भी साबित करना होगा कि उसके जीवन को ख़तरा है और इसलिए उसे बंदूक का लाइसेंस दिया जाए। उसके पश्चात राजस्व विभाग आवेदक की पृष्ठभूमि की विस्तृत जाँच करता है। इसके बाद आवेदक का मेडिकल परीक्षण होता है। इसमें यह जांचा जाता है कि आवेदक मानसिक रूप से स्वस्थ्य स्थिर है या नहीं और वे हथियार को संभाल पाने के योग्य है।

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