अहमदाबाद की 69वीं रथयात्रा : जब धर्म पर छाई धर्मांधता, तब वसंत-रजब ने प्राण देकर बचाई मानवता

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* पहली बार रक्तरंजित हुई थी अहमदाबाद की ऐतिहासिक रथयात्रा

* एक परिवार की जान बचाने के लिए न्यौछावर हो गए दो नवयुवक

* अहमदाबाद कभी नहीं भूलेगा वसंत का वीरधर्म-रजब का राजधर्म

विशेष आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 1 जुलाई, 2019 (YUVAPRESS)। वर्ष 1946, तारीख 1 जुलाई और तिथि अषाढ़ी दूज यानी रथयात्रा। अहमदाबाद के जमालपुर क्षेत्र में दंगाडयों की उग्र भीड़ एक परिवार की जान लेने पर आमादा थी। भीड़ को रोकने के लिए दो युवक ‘दीवार’ बन कर खड़े हो गए और अंतिम साँस तक डटे रहे। खून के प्यासे धर्मांध लोगों को साम्प्रदायिक एकता की ‘वसंत-रजब’ रूपी दीवार नहीं रोक सकी और कुछ घण्टे पहले जहाँ से जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकली थी, वह मार्ग वसंत-रजब के रक्त के रंजित हो गया। हिन्दू और मुस्लिम होने का भेद वसंत-रजब को जीते जी तो क्या, मरते दम तक जुदा न कर सका। उनकी शहादत को आज 73 वर्ष हो गए, परंतु आज जब अहमदाबाद आगामी 4 जुलाई को 142वीं रथयात्रा का साक्षी बनने जा रहा है, तब साम्प्रदायिक एकता के लिए कुर्बान हो जाने वाले वसंत-रजब की जयंती पर इन दो महान सपूतों को याद करना स्वाभाविक और प्रासंगिक भी है।

अहमदाबाद में 2 जुलाई, 1878 को प्रथम रथयात्रा निकली थी और पिछले 141 वर्षों के इतिहास में कई बार करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के इस नगरोत्सव को समाज और धर्म विरोधी तत्वों ने बाधित करने का प्रयास किया, परंतु यह अहमदाबाद की साम्प्रदायिक सौहार्द की महानता ही है कि भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथयात्रा कभी भी स्थगित नहीं हुई और हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय ने रथयात्रा को शांतिपूर्वक सम्पन्न कराने में अपना योगदान देने का प्रयास किया, परंतु कुछ असामाजिक तत्व रथयात्रा के नाम पर शहर में अक्सर दंगा फैलाने की कोशिश करते थे। ऐसी कोशिशों के बीच शहर में शांति दूत की तरह काम करने वाले वसंत-रजब की शहादत आज भी अहमदाबाद के साम्प्रदायिक ताने-बाने की धरोहर बन गई है। जरूरत इस धरोहर के जतन की है।

उल्लेखनीय है कि वसंत यानी वसंतराव हेगिष्ठे और रजब यानी रजबअली लाखाणी। वसंत का जन्म 16 मई, 1906 को अहमदाबाद और रजब का जन्म 1919 में कराची (तत्कालीन भारत, वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था, परंतु दोनों को मिलाया महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले स्वतंत्रता आंदोलन ने। वसंत ने जहाँ अहमदाबाद को ही अपनी कर्मभूमि बनाया, वहीं रजब को स्वतंत्रता आंदोलन कराची से अहमदाबाद खींच लाया और फिर वसंत-रजब दो व्यक्ति नहीं, अपितु एक जोड़ी के रूप में पहचाने जाने लगे। दोनों कांग्रेस के सेवाभावी संगठन सेवादल के कर्मठ सदस्य थे।

रथयात्रा में पहली बार दंगे और वसंत-रजब का बलिदान

वर्ष 1946 पराधीन व अखंड भारत का वह काल था, जब देश में धर्म आधारित विभाजन की सुगबुगाहट के साथ ही साम्प्रदायिकता की आग धू-धू कर जल रही थी। इसे लेकर सदियों से साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील अहमदाबाद भी पीछे नहीं था। चारों ओर ‘मारो-काटो’ की चीख-पुकार का मंज़र था। इसी बीच अषाढ़ी दूज आई। 1 जुलाई,1946 का वह दिन था। जमालपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ की परम्परागत 69वीं रथयात्रा शांतिपूर्वक सम्पन्न कराना ब्रिटिश शासकों के लिए बड़ी चुनौती था, क्योंकि अहमदाबाद विभाजन की आग के कारण साम्प्रदायिक दंगों की चपेट में था। चारों ओर दंगों के माहौल के बीच जगन्नाथजी की परम्परागत रथयात्रा को रोका नहीं गया। मंदिर प्रशासन रथयात्रा निकालने के लिए कटिबद्ध था, परंतु हुआ वही, जिसकी आशंका थी। रथयात्रा का परम्परागत मार्ग पुराना अहमदाबाद है, जहाँ मुस्लिम बहुल आबादी रहती है। रथयात्रा ने जमालपुर दरवाजे के भीतर प्रवेश किया कि दंगे भड़क गए।

इधर रथयात्रा के दौरान वसंत और रजब दिन भर हिन्दुओं को मुस्लिमों से और मुस्लिमों को हिन्दुओं से बचाने में लगे रहे। उन्होंने एक मुस्लिम ड्राइवर को हिन्दुओं की भीड़ से बचाया, तो एक हिन्दु धोबी को मुस्लिमों की भीड़ से सुरक्षित निकाला। शाम ढले वसंत-रजब भद्र स्थित कांग्रेस हाउस पहुंचे। अभी वे कांग्रेस हाउस पहुंचे ही थे कि खबर आई कि जमालपुर में खांड की शेरी में एक हरिजन परिवार हिंसक भीड़ से घिर गया है। कोई साधन नहीं मिला, तो दोनों पैदल हो जमालपुर की ओर निकल पड़े। उन्होंने खांड की शेरी पहुंच कर उग्र भीड़ को शांत करने की कोशिश की, लेकिन धर्मांध लोगों की अंतरात्मा नहीं जागी। भीड़ ने वसंत-रजब को गंभीर परिणाम की चेतावनी देते हुए हट जाने को कहा, परंतु वसंत-रजब दीवार बन गए। उन्होंने कहा, ‘हमारे मरने से तुम्हारी आग बुझती हो, तो हम मरने को तैयार हैं।’ दोनों बीच रास्ते पर सो गए। उन्होंने उग्र भीड़ से कहा कि उन्हें उनकी लाश से होकर गुजरना होगा। उग्र भीड़ में शामिल कुछ लोगों की अंतरात्मा जागी, लेकिन कुछ पर धर्मांधता इस कदर सवार थी कि उन्होंने वसंत-रजब का बलिदान ले लिया। दोनों युवकों ने अंतिम साँस ली और अलविदा कह दिया। उनकी इस शहादत ने उस परिवार को बचा लिया। सुबह जिस स्थान से भगवान जगन्नाथ परिक्रमा को निकले थे, वह स्थान शाम को दो युवकों के रक्त से रंजित हो गया। इसके साथ ही अमन और सौहार्द पसंद हिन्दू-मुस्लिम बंधुओं का रक्त एक-दूसरे से मिल गया। वसंत-रजब की इस शहादत को आज यानी सोमवार को 73 वर्ष हो गए, परंतु खांड की शेरी-जमालपुर में स्थित वसंत-रजब चौक हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा। वसंतराव की दूधेश्वर स्थित श्मशान गृह में अंत्येष्टि की गई, जबकि रजबअली को गोमतीपुर स्थित कब्रिस्तान में दफनाया गया।

दो छोरों के छोरों का इस तरह हुआ मिलन

वसंतराव हेगिष्ठे महाराष्ट्रियन हिन्दू थे, जबकि रजबअली आखाणी गुजराती मुस्लिम। वसंत का जन्म अहमदाबाद में हुआ था, तो रजब कराची में जन्मे थे। जन्म स्थल के हिसाब से तत्कालीन भारत के दो सुदूरवर्ती छोरों पर पैदा हुए इन दो छोरों का मिलन आखिर कैसे हुआ ? दरअसल रजब मूलत: गुजराती थे। इसीलिए स्वतंत्रता आंदोलन के प्रवाह में बह कर वे अहमदाबाद पहुंच गए। इधर वसंत भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे। महात्मा गांधी के नेतृत्व चल मे चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन ने अहमदाबाद में वसंद-रजब को एक बना दिया। वसंत ने 1921 में ‘शिक्षा इंतजार कर सकती है, स्वराज नहीं’ के नारे के साथ पढ़ाई छोड़ दी और गांधीजी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। वे गांधीजी की गुजरात विध्यापीठ से जुड़े और देशभत्त्कि और समाज सेवा को ही अपना मंत्र बना लिया। 1930 में वे जेल भी गए। इसके बाद वसंत सेवादल से जुड़ गए और 1932, 1940 और 1942 में चले स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया। वसंत ने देश और समाज के लिए आजीवन अविवाहित रहने का भी संकल्प किया और सदैव समर्पित रहे। उधर रजबअली का जन्म भले ही कराची में हुआ था, परंतु उनका परिवार 1935 में सौराष्ट्र में सुरेन्द्रनगर स्थित लीम्बड़ी में रहने आ गया था। प्राथमिक शिक्षा कराची में लेने के बाद रजब ने 1936 में मैट्रिक पास की और भावनगर के शामलदास कॉलेज में बीए की पढ़ाई शुरू की, लेकिन वे परीक्षा में नहीं बैठे। उनका मानना था कि डिग्री का उनके जीवन में कोई उपयोग नहीं होगा। आखिरकार ब्रिटिश शासकों की नौकरी ही करनी पड़ेगी। इसीलिए उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का निश्चय किया। रजब मुस्लिम समाज में व्याप्त रुढ़ियों के विरोधी थे। इस कारण उनके कई बार परिवार से मतभेद भी रहे। वे स्वयं को केवल एक मानव मानते थे। वे किसी धर्म या जाति के बंधन से बंधना नहीं चाहते थे। बीए की परीक्षा छोड़ रजब राजकोट सत्याग्रह में शामिल हुए। वे 1938, 1941 और 1942 में जेल भी गए। गांधीजी के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन रजब को भावनगर से अहमदाबाद खींच लाया और यहां उनकी मुलाकात हुई वसंत से। दोनों के मकसद एक ही थे और इस प्रकार दोनों सेवादल के सदस्य के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन तथा समाज सेवा में जुट गए। उन दिनों अहमदाबाद में सेवादल बहुत मजबूत संगठन बन कर उभरा और वसंत-रजब दो व्यत्त्कि नहीं, बल्कि एक जोड़ि के रूप में पहचाने जाने लगे।

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