चंद्रयान 2 : तमिलनाडु की माटी ने बचा लिया ‘विक्रम’ को टूटने से..?

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* हार्ड लैंडिंग के बावजूद न विक्रम टूटा, न इसरो की उम्मीद

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 9 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। चंद्रयान-2 यानी लैंडर विक्रम ने संपर्क टूटने के बाद 7 सितंबर शनिवार की रात लगभग 2 बजे चांद की धरती पर सॉफ्ट लैंडिंग की बजाय हार्ड लैंडिंग की थी। इसके बावजूद विक्रम लैंडर को कोई नुकसान नहीं हुआ है और इसरो को भी 70 फीसदी तक उम्मीद है कि विक्रम अपना पराक्रम दिखाएगा और इसरो के अभियान को आगे बढ़ाएगा। विक्रम लैंडर से संपर्क टूटने के बाद इसरो के प्रमुख के. सिवन तथा उनके सहयोगी वैज्ञानिकों की टीम हताश जरूर हो गये थे, परंतु अगले ही दिन रविवार को चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर ने संपर्क विहीन हुए चंद्रयान-2 को खोज निकाला और इसरो को उसकी तस्वीरें भेजकर उसकी स्थिति व लोकेशन के बारे में जानकारी दी है, जिसके अनुसार विक्रम लैंडर अपनी लैंडिंग की तय जगह से मात्र 500 मीटर की दूरी पर है और सिर के बल पड़ा है। इससे इसरो को विक्रम से एक बार उम्मीदें जागी हैं कि वह काम करेगा और इसरो का चांद मिशन पूरा करेगा। बहुत कम लोग इस सच्चाई से अवगत होंगे कि चांद की सतह पर लैंडर विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग कराने से पहले इसरो ने पृथ्वी पर ही विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयोग किया था, जिसमें तमिलनाडु के दो और कर्नाटक के एक गाँव ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

क्या है तमिलनाडु के दो गाँवों की भूमिका ?

पहले आपको यह बताते हैं कि तमिलनाडु के दो गाँवों की क्या भूमिका रही ? दरअसल, इसरो के पूर्व निदेशक एम. अन्नादुरई के अनुसार चांद की सतह पृथ्वी की सतह से बिल्कुल अलग और दुर्गम है। चांद की सतह पर लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान को उतारने से पहले हमें धरती पर इसकी रिहर्सल करनी थी। इसके लिये चांद की सतह, प्रकाश और वातावरण का निर्माण करना जरूरी था। चांद की सहत पर विशाल गड्ढे (क्रेटर), चट्टानें और धूल है। इसलिये लैंडर और रोवर को चांद की सतह पर उतारने से पहले उसके पहियों का परीक्षण करना जरूरी था। तभी भूवैज्ञानिकों ने पता लगाया कि तमिलनाडु में सलेम के पास स्थित दो गाँवों सीतमपोंडी और कुन्नमलाई वह दो गाँव हैं, जिनकी मिट्टी और पत्थर चांद की सतह पर मौजूद मिट्टी और पत्थरों से मिलते-जुलते हैं। यही कारण है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चांद की सतह पर लैंडर विक्रम को उतारने से पहले इस मिट्टी के साथ लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग की ग्रांड रिहर्सल की। पहले इसरो ने चांद की तरह दिखने वाली 60 से 70 टन मिट्टी अमेरिका से आयात करने का विचार किया था, परंतु ऐसा करना महंगा पड़ रहा था, जिसके बाद इसरो ने सस्ता रास्ता तलाश करना शुरू किया था। इसी बीच भूवैज्ञानिकों ने इसरो को बताया कि उन्हें जिस तरह की मिट्टी की तलाश है, वह तमिलनाडु में सलेम के पास स्थित सीतमपोंडी और कुल्लमलाई गाँवों में मौजूद है। इसके बाद इन गाँवों में मौजूद एनोरोथोसाइट (anorothosite) चट्टानों की मिट्टी और पत्थरों को कर्नाटक लाया गया था।

कर्नाटक के चल्लकेरे गाँव की भूमिका

इसके बाद कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित चल्लकेरे गाँव ने अपनी भूमिका निभाई थी। इस गाँव में तमिलनाडु के दोनों गाँवों से लाई गई मिट्टी और चट्टानों के पत्थरों से चांद की आर्टिफिशियल सतह बनाई गई थी। सतह के साथ ही चंद्रमा पर मौजूद सूर्य-प्रकाशीय वातावरण से मिलता-जुलता आर्टिफिशियल प्रकाशीय वातावरण भी तैयार किया गया था। इसरो के पूर्व निदेशक एम. अन्नादुरई के अनुसार अमेरिका से मिट्टी को आयात करने और यहाँ चांद की आर्टिफिशियल सतह और वातावरण बनाकर लैंडर विक्रम तथा रोवर प्रज्ञान की लैंडिंग की ग्रांड रिहर्सल के लिये 25 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया था, परंतु आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इसमें कोई खर्च नहीं हुआ, क्योंकि सर्विस प्रोवाइडर ने इसके लिये इसरो से कोई चार्ज नहीं लिया था। एनोरोथोसाइट चट्टानों को बेंगलुरु लाने के बाद प्रयोगशाला में उसका परीक्षण किया गया और इसके बाद उसे उपरोक्त गाँव में ले जाकर आवश्यकतानुसार सतह का आकार दिया गया तथा चांद की आर्टिफिशियल सतह बना कर उस पर लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान को उतारने का सफल प्रयोग किया गया था।

इस प्रकार लैंडर विक्रम और रोवर (स्वचालित रोबोट) प्रज्ञान को चांद की सतह पर उतारने से पहले इसरो के वैज्ञानिकों ने धरती पर रिहर्सल के लिये बहुत कड़ी मेहनत की थी।

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