फिर से दस्तक दे रही है 2013 वाली यह तबाही : अंतरिक्ष से मिल रही है चेतावनी

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अहमदाबाद, 28 जून 2019 (युवाप्रेस डॉट कॉम) । क्या आपको 2013 में केदारनाथ धाम में आई तबाही का भयावह मंज़र याद है ? 6 साल पहले भगवान केदारनाथ के मंदिर के पीछे स्थित पर्वत से तबाही के रूप में पानी का ऐसा सैलाब नीचे आया था, जिसने पूरे केदारनाथ धाम की तस्वीर ही बदल दी थी। इस सैलाब में 5000 से भी अधिक लोगों की बह जाने से मौत हुई थी। मंदिर के आसपास स्थित दुकान-मकान सब बह गये थे, इससे भी हजारों की संख्या में लोग विस्थापित हो गये थे और करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ था। सैलाब गुजर जाने के बाद हर तरफ शव ही शव बिखरे मिले थे। जिन परिवारों पर यह आफत टूटी थी और जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया था, वह तो इस डरावने दृश्य को कभी नहीं भूल पाएँगे। अब खबर यह है कि वही तबाही एक बार फिर आकार ले रही है। उत्तराखंड सरकार ने तो चेतावनी मिलने के बाद तबाही से निपटने की तैयारियाँ भी शुरू कर दी हैं।

अंतरिक्ष से आई हैं चेतावनी भरी तस्वीरें

अंतरिक्ष में स्थित लैंडसैट-8 और सेंटीनेल-2B सैटेलाइट ने 26 जून-2019 को केदारनाथ घाटी की तस्वीरें ली हैं। इन तस्वीरों के आधार पर चेतावनी दी गई है कि केदारनाथ मंदिर के पीछे स्थित पर्वतीय श्रृंखला में एक बार फिर से 2013 वाली स्थिति पैदा हो रही है, अर्थात् बर्फ के ग्लेशियर पिघलने से जगह-जगह जल भराव हो रहा है। एक महीने के भीतर इन जल समूहों की संख्या दो से बढ़कर चार हो गई है। सैटेलाइट से भेजी गई तस्वीरों में से यहाँ जो तस्वीर नज़र आ रही है, वह केदारनाथ मंदिर के पीछे पर्वत श्रृंखला में स्थित चोराबाड़ी ग्लेशियर की है। जो मंदिर से मात्र दो किलोमीटर की ऊंचाई पर है। इन तस्वीरों में नीले रंग के स्थानों को चिह्नित किया गया है, जो जल भराव से बने जल समूह हैं। इन निशानों को देखकर विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है और वे गंभीरता बरत रहे हैं। गंभीरता उत्तराखंड सरकार भी बरत रही है और सरकार ने एहतियाती कदम उठाने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

विशेषज्ञों ने प्रशासन को चेताया, लापरवाही न बरतें

विशेषज्ञों का कहना है कि केदारनाथ घाटी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तथा कमजोर हो रही है। विशेषज्ञों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि चोराबाड़ी जैसे संवेदनशील इलाके में जल भराव हो रहा है तो प्रशासन को इसे लेकर बिल्कुल भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिये। पर्यावरणविद् और जेएनयू के प्रो. ए. पी. डिमरी ने इस विषय पर व्यापक रिसर्च की है। उनके अनुसार केदारनाथ घाटी भूकंप तथा पारिस्थितिकी दृष्टि से बहुत संवेदनशील और कमजोर है। 2013 में मानसून जल्दी आने और बर्फ के पिघलने से भयंकर बाढ़ आई थी। यदि इस बार फिर से जल समूह तैयार हो रहे हैं तो यह गंभीर चिंता की बात है। 2013 में भी चोराबाड़ी झील में इसी तरह के जल समूह बन गये थे, जिनके कारण चोराबाड़ी झील के किनारे ध्वस्त हो गये थे और केदारनाथ धाम में भयंकर बाढ़ आई थी। हालाँकि कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि जो जल समूह बन रहे हैं, वह कोई खतरे के संकेत नहीं देते हैं, परंतु यदि इस क्षेत्र में मूसलाधार बारिश हुई तो परिणाम विध्वंसक हो सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि मंदाकिनी रिवर बेसिन में 14 झीलें हैं, चोराबाड़ी इनमें से एक है। जो समुद्र तल से 3,960 मीटर की ऊँचाई पर है। चोराबाड़ी झील केदारनाथ से लगभग 2 किलोमीटर की ऊँचाई पर है। हिमालयी ग्लेशियरों से प्रति वर्ष 8 बिलियन टन बर्फ पिघल रही है। हाल ही में किये गये एक अध्ययन के बाद कहा गया है कि नई सदी में प्रवेश करने के साथ ही बर्फ पिघलने की गति दोगुनी हो गई है।

2013 में ऐसे पर्वत से नीचे उतरी थी तबाही

सरस्वती नदी और दूध गंगा में जिन इलाकों का पानी आता है, उन इलाकों में 16 जून को बहुत मूसलाधार वर्षा हुई थी और इन नदियों का पानी उफाऩ पर आ गया था। 15 व 16 जून को चोराबाड़ी ग्लेशियर के आसपास 325 मि.मी. वर्षा रिकॉर्ड की गई थी। अगले दिन 17 जून को चोराबाड़ी झील के बर्फ के बने किनारे ध्वस्त हो गये थे और झील का अथाह पानी बाढ़ की शक्ल में बहकर पर्वत से नीचे उतरा था। वर्षा और झील के पानी ने मिलकर अथाह समुद्र की शक्ल ले ली थी। इस पानी ने नीचे की ओर उतरते समय भयंकर रूप धारण किया जिससे केदारनाथ, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा आदि इलाकों समेत पूरी घाटी में तबाही मच गई थी।

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