दीदी के ‘SORRY’ से छलकता सिमटते-दरकते दुर्ग का दर्द : बंगाल में चल रही ‘भगवा लहर’ कोलकाता तक बरपाएगी कहर ?

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चुनावी शिकस्त से सकपकाईं ममता ने फिर दिखाए विद्रोही तेवर

शपथ ग्रहण का निमंत्रण स्वीकार करने के बाद मुकर गईं ममता

बंगाल में सरेआम हुई राजनीतिक हत्याओं को मानने से किया इनकार

मोदी की सुनामी और शाह की शहंशाही से डोला ममता का सिंहासन

लोकसभा चुनाव परिणाम के विधानसभावार आँकड़ों ने ममता की उड़ाई नींद

विधानसभा चुनाव 2021 से पहले TMC के हो रहे ‘भगवाकरण’ से बौखलाईं ममता

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 29 मई, 2019। अंतत: मनोनीत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 30 मई, 2019 सायं 7.00 बजे आयोजित होने वाले ऐतिहासिक और भव्य शपथ ग्रहण समारोह का साक्षी बनने से ममता बैनर्जी ने इनकार कर दिया है। ममता ने ‘SORRY NARENDRA MODI JI’ कहते हुए शपथ ग्रहण समारोह का निमंत्रण ठुकरा दिया है। ममता ने किन्हीं विशेष संवैधानिक-शासकीय कारणों से निमंत्रण ठुकराया होता, तो कोई बात नहीं थी, परंतु उन्होंने तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) की ओर से शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के उन कार्यकर्ताओं के परिजनों को बुलाए जाने के विरोध में निमंत्रण ठुकराया, जिनकी बंगाल में चुनावी घमासान के दौरान राजनीतिक हत्या हो गई।

पश्चिम बंगाल में दीदी उपनाम से विख्यात, बंगाल की बाघिन उपाधि प्राप्त, मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अध्यक्ष ममता ने भाजपा की बंगाल में राजनीतिक हत्या की थियरी को सिरे से निरस्त करके यह सिद्ध कर दिया कि उनके ‘सॉरी नरेन्द्र मोदी जी’ में दरकते दुर्ग का दर्द छिपा हुआ है। लोकसभा चुनाव 2019 में पश्चिम बंगाल में जिस तरह ममता और टीएमसी के गढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुनामी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की शहंशाही ने परचम लहराया, उससे 2014 में 34 सीटें जीतने वाली टीएमसी 2019 में 22 सीटों पर सिमट गई, वहीं भाजपा की सीटों का आँकड़ा 2014 की 2 सीटों से बढ़ कर 18 सीटों पर पहुँच गया। बंगाल में लोकसभा चुनावों से पहले टीएमसी के भगवाकरण, चुनाव परिणामों में जनता में चली भगवा लहर और चुनाव परिणामों के बाद पुन: टीएमसी में मची भगवा भगदड़ ने ममता के घाव पर नमक छिड़कने का काम किया।

इतना कुछ होने के बावजूद ममता ने एक मुख्यमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के निमंत्रण को पहले तो यह कहते हुए तुरंत स्वीकार कर लिया, ‘मैंने कुछ अन्य मुख्यमंत्रियों से भी बात की और इसमें शिरकत करने का फैसला किया। संविधान के तहत कुछ औपचारिक (सेरेमोनियल) कार्यक्रम होते हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के शपथ-ग्रहण समारोहों के लिए न्योता मिलने पर हम ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने की कोशिश करते हैं।’, परंतु चंद घण्टों बाद ही ममता ने मोदी के नाम एक पत्र जारी करते हुए न केवल निमंत्रण को नकार दिया, अपितु मोदी और भाजपा पर पुन: आक्रमक हो गईं।

हिंसा और हत्या को सिरे से नकारा

ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम जारी चिट्ठी में पश्चिम बंगाल में किसी भी प्रकार की राजनीतिक हत्या होने की बात को सिरे से नकार दिया और आरोप लगाया कि शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा ने राजनीतिक हिंसा के शिकार भाजपा कार्यकर्ताओं के परिजनों को बुला कर उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास किया है। ममता ने इस पत्र में लिखा है, ‘बधाई, नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी। आपके संवैधानिक आमंत्रण को मैंने स्वीकार कर लिया था और आपके शपथ ग्रहण समारोह में मैं आने को तैयार थी, परंतु पिछले कुछ समय में मैंने रिपोर्ट्स देखी हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने उन 54 कार्यकर्ताओं के परिवारजनों को भी न्योता दिया है, जिनकी बंगाल में राजनीतिक हत्या कर दी गई है। ये बिल्कुल झूठ है। बंगाल में कोई राजनीतिक हत्या नहीं हुई है। ये हत्याएँ आपसी रंजिश, पारिवारिक लड़ाई और अन्य मसलों की वजह से हुई है। इनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, ऐसा कोई रिकॉर्ड भी नहीं है। सॉरी नरेंद्र मोदी जी, इसी वजह से मैं आपके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो पाऊँगी। ये समारोह लोकतंत्र का उत्सव मनाने वाला था, परंतु किसी एक राजनीतिक दल को नीचा दिखाने वाला नहीं है। कृप्या मुझे क्षमा करें।’

क्या फोटो और वीडियो में कैद हिंसा झूठ है ?

प्रश्न यह उठता है कि क्या ममता बैनर्जी को पश्चिम बंगाल के हिंसक चुनावी इतिहास का एहसास नहीं है ? क्या ममता यह भूल गईं कि वे स्वयं और टीएमसी के सैकड़ों कार्यकर्ता कभी वामपंथी दलों की इसी हिंसक चुनावी राजनीति का शिकार होने के बाद बंगाल में सत्ता हासिल कर पाए ? क्या ममता को पंचायत चुनावों में हुई हिंसा भी नहीं दिखाई देती ? अधिक दूर न जाते हुए, लोकसभा चुनाव 2019 के सातों चरणों में पश्चिम बंगाल में हुई हिंसक घटनाएँ, जो विभिन्न कैमरा में फोटो और वीडियो के रूप में क़ैद की गईं, वह भी ममता को नहीं दिखाई देतीं ? आख़िर ममता इतनी निर्मम कैसे हो सकती हैं ? ममता क्यों यह समझ नहीं पा रहीं कि उनकी पार्टी टीएमसी के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी के चलते ही बंगाल में उनका जनाधार घटा है और भाजपा का कद बढ़ा है ?

क्या वामपंथियों की राह पर चल रही हैं ममता ?

ममता बैनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 2001 में टीएमसी बनाई थी, परंतु उन्हें बंगाल की सत्ता हासिल करने में 10 वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा। 2011 से बंगाल की सत्ता पर काबिज ममता बैनर्जी और टीएमसी ने शनै:-शनै: वामपंथी दलों और कांग्रेस का सफाया कर दिया, परंतु ममता-टीएमसी ने भाजपा, मोदी और शाह के बढ़ते जनाधार के बीच अपनी सत्ता बनाए-बचाए रखने के लिए उसी हिंसा का सहारा लिया, जिसका सहारा वामपंथियों ने ममता-टीएमसी के विरुद्ध लिया था। यही कारण है कि जब से बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी, तब से ममता-टीएमसी ने भाजपा कार्यकर्ताओं के विरुद्ध हिंसा की राजनीति शुरू की, परंतु ममता को यह याद रखना होगा कि वे भी यदि वामपंथियों के हिंसक हथकंडे अपनाएँगी, तो उन्हें भी सत्ता से हाथ धोना पड़ सकता है। 2019 के परिणाम 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव की बानगी मात्र हैं।

मोदी-शाह का विजय रथ कोलकाता पर जाकर थमेगा ?

लोकसभा चुनाव 2019 में जिस तरह मोदी-शाह के विजय रथ ने भाजपा को 18 सीटें दिलवाईं, उससे ममता और टीएमसी की चूलें हिल गई हैं। लोकसभा चुनाव परिणामों की विधानसभा क्षेत्र वार तुलना करें, तो टीएमसी को 294 में से 158 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली है, जो लोकसभा चुनाव 2014 में मिली 214 सीटों की बढ़त और विधानसभा चुनाव 2016 में प्राप्त 211 सीटों से बहुत ही कम है। दूसरी तरफ 2019 में भाजपा ने 129 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की है, जो लोकसभा चुनाव 2014 में मिली 24 सीटों की बढ़त तथा विधानसभा चुनाव 2016 में प्राप्त केवल 3 सीटों से कई गुना अधिक है। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि दीदी का दुर्ग दरक रहा है और दो वर्ष बाद होने वाले विधानसभा चुनाव 2021 में ममता को अपना दुर्ग बचाने में मोदी-शाह-भाजपा से कड़ी चुनौती मिलने वाली है। यदि भगवा लहर का विस्तार बंगाल में यूँ ही बरकरार रहा और मोदी-शाह की जोड़ी ने लोकसभा चुनावों की तरह विधानसभा चुनाव 2021 को भी फतह करने के लिए पूरा एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, तो कोलकाता में दीदी का दुर्ग ध्वस्त हो सकता है और पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा सरकार बन सकती है, क्योंकि बंगाल में मुकाबला त्रिकोणीय-चतुष्कोणीय नहीं, बल्कि सिर्फ द्विकोणीय रह गया है। मोदी-शाह-भाजपा की आंधी में कांग्रेस-वामपंथी पहले ही साफ हो चुके हैं। ऐसे में भाजपा से मिलने वाली सीधी टक्कर झेलते हुए दीदी की सत्ता सरक भी सकती है।

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