जन्म दिन : जन्म को ‘अवतार और अमरत्व’ में बदलने का दिन !

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आलेख : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 5 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। विश्व की जनसंख्या की क्षण-क्षण की जानकारी देने वाली वेबसाइट https://www.worldometers.info/world-population/india-population/ के अनुसार यह समाचार लिखते समय भारत की जनसंख्या 1 अरब 37 करोड़ 1 लाख 50 हजार 800 है और यह आँकड़ा प्रति सेकेंड 1 के हिसाब से लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका अर्थ यह हुआ है कि भारत में हर सेकेंड 1 बच्चा जन्म ले रहा है, जो अगले वर्ष आज ही के दिन यानी 5 अगस्त को अपना पहला जन्म दिवस मनाएगा।

वैसे इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हर आम से लेकर खास आदमी साल में एक बार अपना जन्म दिन अवश्य मनाता है। कोई धूमधाम से, तो कोई केवल अपने जन्म के दिन को याद करके अपनी आयु में एक वर्ष जोड़ कर जन्म दिन मनाता है। जन्म दिन प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का ऐसा दिन होता है, जो उसे जीवन भर याद रहता है कि आज ही के दिन मैंने अपनी माँ की कोख से जन्म लिया था।

एक आम आदमी के लिए जन्म दिन केवल जन्म दिन होता है। पूरी दुनिया में जन्म दिन मनाने का विशेष चलन है और अब यह उच्च वर्ग से निकल कर मध्यम वर्ग, यहाँ तक कि निर्धन वर्ग के लोगों में भी बढ़ रहा है। निर्धन लोग भी कम से कम जन्म दिन वाले एक दिन घर से बाहर निकल कर छोटे-मोटे होटेल या रेस्टोरेंट में जाते हैं, केक काटते हैं और सपरिवार भोजन करते हैं।

आज 5 अगस्त है और आज के दिन भी देश और दुनिया में करोड़ों लोगों का जन्म दिन होगा, परंतु क्या आप जानते हैं कि भारतीय दर्शन आपके जन्म दिन को एक महान दिन बनाने की राह दिखाता है ? क्या आप जानते हैं कि यदि आप अपने जन्म दिन के दिन भारतीय दर्शन के हिसाब से थोड़ा-सा भी मंथन करें, तो आपका जन्म दिन एक अवतार में बदल सकता है ? क्या आप जानते हैं कि यदि भारतीय दर्शन आपके जन्म दिन पर आपका विवेक जागृत कर दे, तो आप उस अमरत्व को प्राप्त कर सकते हैं, जिसे प्राप्त करने में विज्ञान विफल रहा है ?

जी हाँ। आपने बिल्कुल सत्य पढ़ा है। आप यानी कोई भी मानव, किसी भी जाति-धर्म का मानव, किसी भी परिवार का मानव, अमीर से लेकर ग़रीब वर्ग का मानव अपने आपको इस पृथ्वी पर ‘न मरने वाला’ बना सकता है और अपने जन्म को भगवान राम, कृष्ण, नृसिंह, ईसा मसीह, पैगंबर जैसे ‘अवतार’ में बदल सकता है ? यह बात समझने के लिए आपको वैदिक युग या पौराणिक युग में जाने की आवश्यकता नहीं है। आधुनिक युग में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन से स्वयं को अवतार सिद्ध कर दिखाया। देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए ही मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म नहीं, अपितु अवतार हुआ था। गांधीजी ने भी जन्म तो हमारी और आपकी तरह एक साधारण मानव के रूप में ही लिया था, परंतु गुरु श्रीमद् राजचंद्रजी से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान ने उन्हें बिना हथियार उठाए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर देने वाली शक्ति दी।

डिलीवरी डे जन्म दिन नहीं हो सकता !

किसी भी व्यक्ति की देह (जिसे पुद्गल भी कहा जाता है) को जन्म देने वाले उसके माता-पिता होते हैं और आज का विज्ञान किसी भी व्यक्ति की देह का जन्म दिन उस दिन को मानता है, जब वह माँ के गर्भ से बाहर आता है, परंतु भारतीय वेदांत सिद्धांत के अनुसार किसी भी व्यक्ति का वास्तविक जन्म दिन कोई नहीं बता सकता। यहाँ तक कि उसे जन्म देने वाली माँ भी नहीं बता सकती। आपके मन में प्रश्न यह उठ रहा होगा कि कैसे ? इसका सीधा उदाहरण है एक बीज। यदि हमें हमारे लगाए पौधे का जन्म दिन मनाना हो, तो हम किस दिन मनाएँगे ? उसी दिन, जब हमने बीज बोया होगा। ठीक इसी तरह, किसी भी व्यक्ति का जन्म दिन वह होता है, जब वह किसी माँ के गर्भ में बीज के रूप में प्रवेश करता है। ऐसे में डिलीवरी डे को जन्म दिन कैसे माना जा सकता है।

मानव जीवन क्यों है अनमोल ?

आज की प्रमाण को ही सत्य मानने वाली आधुनिक, उन्नत और वैज्ञानिक दुनिया में ज्ञान का अर्थ केवल जानकारियों का बोझा माना जाता है, परंतु भारतीय वैदिक-आध्यात्मिक परम्परा, भारतीय वेदांत, उपनिषदों और उन सबका सार अर्थात् श्रीमद् भगवद् गीता में ज्ञान का स्पष्ट अर्थ दिया गया है। भारतीय दर्शन के अनुसार ज्ञान का अर्थ है, स्वयं को जानना। यह ‘स्वयं को जानना’ ही प्रत्येक मानव का मूल लक्ष्य है। व्यक्ति को जन्म तो किसी माँ के गर्भ से ही लेना पड़ता है, परंतु उस जन्म को अवतार में बदलने की कला और कौशल हमारे वेदांत में सिखाया गया है। शास्त्रों के अनुसार संसार में 84 लाख योनियाँ हैं, परंतु 83 लाख 99 हजार 999 योनियाँ केवल और केवल प्रारब्ध कर्मों को काटने की योनियाँ हैं। इन 83,99,999 योनियों में नर्क के कीड़ों से लेकर स्वर्ग में क्रीड़ा करते देवता सभी शामिल हैं और आश्चर्य की बात यह है कि इन योनियों में जाने वाले किसी भी प्राणी को अमर होने का अवसर नहीं मिलता। फिर चाहे वह कीड़े-मकोड़े, जीव-जंतु, पशु-पक्षी हों या स्वर्ग के तथाकथित-काल्पनिक देवतागण। अमर होने का स्वर्णि अवसर उसे ही मिलता है, जिसे मानव योनि प्राप्त हुई है। बस, यही कारण है कि मानव जीवन अनमोल है और यह अनमोल इसलिए नहीं है कि आप इस धरती पर अपना साम्राज्य खड़ा कर सकें, भौतिक सम्पत्तियाँ, सुख-सुविधा हासिल कर सकें। यह मानव जीवन इसलिए अनमोल है, क्योंकि एकमात्र मानव को ही यह अधिकार है कि वह स्वयं को जान सके यानी स्वयं से साक्षात्कार कर सके।

जन्म को कैसे बदला जा सकता है अवतार में !

अब शीर्षक पर आते हैं। पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हर व्यक्ति साधारण व्यक्ति ही होता है। वह केवल व्यक्ति ही होता है। न वह स्त्री या पुरुष होता है, न उसकी कोई जाति या कोई धर्म होता है और न ही वह कोई अवतार होता है, परंतु वह अपने जन्म को अवतार में बदल सकता है। यह सामर्थ्य केवल और केवल मनुष्य को ही हासिल है। जन्म को अवतार में बदलने का सबसे पहला चरण है विवेक की जागृति। अक्सर हम अपने शरीर को ही स्वयं मानते हैं, परंतु यदि हम थोड़ा-सा मनोमंथन करें, तो हमें तत्काल यह अनुभूति हो सकती है कि हम शरीर नहीं हैं। आप पूछेंगे कैसे ? उत्तर अत्यंत सरल है। आप सोचिए, जब आप कहते हैं, ‘यह मोबाइल फोन मेरा है’, तब आप यह अच्छी तरह जानते हैं, ‘मैं मोबाइल नहीं हूँ।’ उसी तरह जब आप कहते हैं, ‘ये हाथ-पैर, सिर, बाल, आँखें, कान, नाक मेरे हैं’, तो आपके भीतर यह विवेक जागना चाहिए कि ‘ये हाथ-पैर, सिर, बाल, आँखें, कान, नाक मेरे हैं’ कहते हुए आप यह कभी नहीं कह सकते, ‘मैं हाथ-पैर, सिर, बाल, आँखें, कान, नाक हूँ।’ ठीक उसी तरह जब हम कहते हैं कि शरीर मेरा है, तब यह स्वयं स्पष्ट हो जाता है कि शरीर मेरा है, परंतु मैं शरीर नहीं हूँ। बस यह विवेक जागते ही मनुष्य के मन में पहला प्रश्न यह उठता है, ‘तो फिर मैं कौन हूँ ?’ इस प्रश्न के उत्तर की खोज से ही आरंभ होती है जन्म को अवतार में बदलने की यात्रा।

फिर न कभी जन्म होगा और न ही मृत्यु !

जन्म मानव जीवन को शाश्वत सत्य नहीं है, क्योंकि कोई व्यक्ति पहले से यह नहीं जानता था कि उसका जन्म होने वाला है, जबकि मृत्यु मानव जीवन को शाश्वत सत्य है, क्योंकि हर व्यक्ति यह जानता है कि उसे एक दिन इस पृथ्वी पर से चले जाना है। मानव जीवन का अटल सत्य यह मृत्यु अपने आप में बहुत कुछ सीख दे जाती है। दुनिया में करोड़ों लोग रोज मरते हैं। कुछ लोग अपने अच्छे-बुरे कर्मों के चलते कथित रूप से अमर हो जाते हैं, परंतु वास्तविक अमरत्व तब प्राप्त होता है, जो व्यक्ति अपने जीवन काल में अनुभव करता है। जो व्यक्ति जीते-जीत यह जान लेता है कि वह यह शरीर नहीं है, वह जीवनमुक्त हो जाता है। इसी को ज्ञान कहते हैं, इसी को स्वयं से साक्षात्कार कहते हैं। आप किसी ईश्वर में विश्वास करें या न करें, परंतु इसी को ईश्वर से साक्षात्कार कहते हैं। स्वयं को देह से अलग देखने का यह गुर सिखाने का काम इस पूरी धरती पर एकमात्र गुरु के अलावा कोई नहीं कर सकता। वह भी ऐसा गुरु, जिसने स्वयं को जान लिया है। उस गुरु के सान्निध्य में जाते ही संसार की नश्वरता की और संसार के रचयिता की शाश्वतता की अनुभूति हो जाती है। कोई ऐसा तत्व है, जो हमारे देह रूप में होने से पहले था, आज है और जब हम देह रूप में इस संसार में नहीं होंगे, तब भी होगा। उस तत्व को जान लेना ही स्वयं से साक्षात्कार है। उसे ही तत्वज्ञान यानी वास्तविक ज्ञान कहते हैं, जिसकी प्राप्ति के बाद व्यक्ति जीवनमुक्त दशा में शाश्वत आनंद के साथ प्रारब्ध कर्मों के अधीन जीवन व्यतीत करता है। उसे न कोई घटना सुख से हर्षित कर सकती है और न ही दु:ख से विषाद में डाल सकती है। वह निर्लेप हो जाता है। जीवन के प्रत्येक कर्म करते हुए भी वह उत्तम कर्म संन्यास को भोगता है। वह यह अच्छी तरह जान चुका होता है कि मानव जीवन का अटल सत्य मृत्यु भी होगी, तो उसकी नहीं, अपितु उसके शरीर की होगी। इसीलिए वह भली-भाँति अनुभूति कर सकता है कि वह अमर है। उसने जन्म अवश्य लिया था, परंतु वह अब कभी मरेगा नहीं। इतना ही नहीं, इसी जीवनमुक्त दशा को मोक्ष कहा जाता है, जो केवल जीवित व्यक्ति को ही मिलता है। मरने के बाद मोक्ष नहीं मिलता। ऐसे जीवनमुक्त व्यक्ति का अब न कभी जन्म होगा और न ही मृत्यु।

(गुरु अर्पण)

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