हमेशा जवान ही कुर्बानी दे ? क्या वो 180 परिवार और विपक्ष भी ज़िम्मेदार नहीं है 20 वर्षों में हुई इन 125 मौतों के लिए ?

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विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

जैसे इस समय देश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) की सरकार है, ठीक उसी तरह 1999 में भी भाजपा-एनडीए की सरकार थी। बस चेहरे बदले हुए हैं, परंतु लक्ष्य एक ही था मसूद अज़हर। जो काम अटल इरादों के धनी बिहारी वाजपेयी कर सकते थे, पर कर नहीं सके, वो काम नरेन्द्र मोदी ने कर दिखाया। अटलजी की दृढ़ इच्छा तो यही रही होगी कि श्रीनगर की जेल में बंद मसूद अज़हर को न छोड़ना पड़े। तभी तो उन्होंने मसूद को छोड़ने में 7 दिन तक मंथन किया, परंतु अटलजी उन 180 परिवारों की ‘व्यक्तिगत हित’ की हीनभावना और तत्कालीन विपक्ष के ग़ैरजिम्मेदाराना रवैये के आगे विवश हो गए और अंततः मसूद अज़हर को वाजपेयी सरकार ने छोड़ दिया।

मोदी ने पूरा किया अटल का अधूरा काम

अंततः 20 वर्षों बाद अटल बिहारी वाजपेयी का अधूरा काम काफी हद तक उसी भाजपा-एनडीए सरकार ने पूरा कर लिया है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। मसूद अज़हर अब वैश्विक-अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित हो चुका है। श्रीनगर की जेल से 1999 में रिहा होने के बाद 20 वर्षों तक पाकिस्तान में आज़ाद घूमता रहा मसूद अब गिरफ्तार भी होगा और जेल भी जाएगा, परंतु यहाँ यक्ष प्रश्न यह उठता है कि 20 वर्षों तक आज़ाद घूमने वाले और भारत पर अनेक आतंकवादी हमले कर 125 से अधिक निर्दोष भारतीयों की जान लेने वाला मसूद अज़हर आज भारत के शिकंजे से दूर है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं और कौन-कौन जिम्मेदार हैं ?

कांग्रेस का दोग़ला चरित्र

आतंकवाद पर नरम रुख में माहिर कांग्रेस आज जब देश में लोकसभा चुनाव 2019 चल रहे हैं, तब भी ओछी राजनीति से बाज़ नहीं आ रही। आज की कांग्रेस मसूद को लेकर 1999 की वाजपेयी सरकार को भी कोसती है, तो 2019 की मोदी सरकार की सफलता भी उसे नहीं सुहाती, परंतु सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली 199 की कांग्रेस और राहुल गांधी की अध्यक्षता वाली 2019 की कांग्रेस और उसके सहयोगी दल आतंकवाद पर राजनीति करते समय यह भूल जाते हैं कि 1999 में मसूद अज़हर को छोड़ने के लिए वाजपेयी सरकार को मजबूर किसने किया था ? अब जबकि मोदी सरकार के अथक प्रयासों से मसूद वैश्विक आतंकी घोषित हो चुका है, तो भी विपक्ष यह कह कर ताना मार रहा है कि मसूद को छोड़ा ही एनडीए सरकार ने था। विपक्ष साथ में यह कह कर अपनी पीठ थपथपाना नहीं भूलता कि मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित कराने का पहला प्रयास 2009 में यूपीए सरकार ने किया था, पर पाँच वर्षों तक क्यों कुछ नहीं हो सका ? इस प्रश्न का उत्तर नहीं है उसके पास।

जब कुछ कर गुज़रने की बारी आई, तो पीछे हट गए ?

देश की सीमाओं की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा करना अशस्त्र-सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों की जिम्मेदारी है और अब तक हजारों जवान अपने इस कर्तव्य का निर्वहन करते हुए बलिदान दे चुके हैं, परंतु देश की रक्षा, देश के आत्म-सम्मान और देश के प्रति कर्तव्य निभाने की आम नागरिक की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? यह प्रश्न इसलिए उठता है, क्योंकि 25 दिसम्बर, 1999 को जब कंधार विमान अपहरण कांड हुआ, तब उस विमान में सवार 180 यात्रियों के परिवारों के पास यह मौका आया था कि वे ‘देश प्रथम-देशवासी बाद में’ का नारा अपनाते और सरकार से खुल कर कहते कि श्रीनगर की जेल में बंद मसूद अज़हर को न छोड़ा जाए, बल्कि विमान के अपहर्ताओं पर कमांडो कार्रवाई की जाए, परंतु ऐसा हुआ नहीं। जब देश के लिए कुछ कर गुज़रने की बारी आई, तो भावनाओं में बह कर ये लोग सड़कों पर उतर आए। वाजपेयी सरकार कमांडो कार्रवाई के बारे में सोचती भी तो कैसे ? कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष भी इन परिवारों के साथ सड़कों पर उतर आया और विमान में सवार लोगों को छुड़वाने की मांग पर अड़ गया। अंततः वाजपेयी सरकार ने मसूद को छोड़ने का निर्णय किया और वह भी विपक्ष की सहमति से। बताइए, इसमें अटलजी की कहाँ भूल थी ? भूल तो विमान में सवार यात्रियों के परिजनों और विपक्ष की थी, जिसने सरकार को मज़बूत बनाने की बजाए मज़बूर बनाया।

कौन है 125 निर्दोष नागरिकों की मौत का ज़िम्मेदार ?

31 दिस्बर, 1999 को वाजपेयी सरकार के श्रीनगर जेल से रिहा करते ही मसूद अज़हर ने जैश ए मोहम्मद नामक आतंकवादी संगठन बनाया, जिसने भारत पर एक दर्जन से अधिक हमले किए और इन हमलों में 125 से अधिक निर्दोष भारतीय मारे गए। मसूद ने पहला हमला 1 अक्टूबर, 2001 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर किया, जिसमें 38 लोग मारे गए। 13 दिसम्बर, 2001 को संसद पर हमला किया, जिसमें सुरक्षा जवानों और नागरिकों सहित 7 लोग मारे गए। जैश ए मोहम्मद ने ही संसद हमले में पकड़े गए आतंकवादी अफज़ल गुरु की फाँसी का बदला लेने के लिए कश्मीर में कठुआ, सांबा, हंदवाडा और पुलवामा पुलिस थानों पर हमलों को अंजाम दिया, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा पुलिस कर्मचारियों की मौत हुई। 2 जनवरी, 2016 को मसूद ने पठानकोट हमला कराया, जिसमें छह जवान शहीद हुए। 29 नवम्बर, 2016 को जम्मू के पास नगरोटा शहर में सेना की टुकड़ी पर हमला किया गया, जिसमें चार सैनिक शहीद हुए। 18 सितम्बर, 2016 को उरी आर्मी कैम्प में हुए हमले में 17 जवान शहीद हुए। 14 फरवरी, 2019 को हुए पुलवामा आतंकी हमले की जिम्मेदारी भी जैश ए मोहम्मद ने ली, जिसमें 40 से अधिक सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए। इन लगभग 125 से अधिक नागरिकों और जवानों की मौत के लिए आख़िर कौन जिम्मेदार है ?

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