पुलिस है समाज का सुरक्षा बल, फिर ‘जवानों’ की तरह क्यों नहीं मिलता इन्हें सम्मान ?

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विश्लेषण : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 29 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। जैसे सीमा पर सुरक्षा बल कड़ी ड्यूटी करते हैं, वैसे ही देश के अंदर सुरक्षा व्यवस्था की कमान पुलिस सँभालती है। यह पुलिस ही है, जिसकी बदौलत हम सुरक्षित महसूस करते हैं और जब भी कहीं कोई आपराधिक घटना या आकस्मिक दुर्घटना घटित होती है तो हम सबसे पहले पुलिस को ही याद करते हैं। इन सबके बावजूद देश की सीमा पर तैनात जवानों को समाज में जितना सम्मान मिलता है, उतना पुलिस को नहीं मिलता, जबकि सच्चाई यह है कि पुलिस भी जिन परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करती है, वह भी काबिले-तारीफ है।

हाल ही में कॉमन कॉज़ एंड सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ की ओर से पुलिस की ड्यूटी को लेकर एक सर्वेक्षण किया गया, जिसके नतीजे चौंकाने वाले सामने आये हैं। इन नतीजों से साफ है कि पुलिस वाले अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। सर्वेक्षण करने वाली संस्था ने 22 राज्यों में 12,000 पुलिस कर्मचारियों और पुलिस वालों के 11,000 परिवारजनों का फीडबैक लेकर जो नतीजे निकाले हैं, उनके अनुसार भले ही पुलिस वालों के कामकाज को लेकर सवाल उठाए जाते हों, परंतु सच तो यह है कि पुलिस वालों को बहुत सारी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। सर्वेक्षण के अनुसार प्रत्येक पुलिसकर्मी दिन में लगभग 14 घण्टे काम करता है। कुछ राज्यों में पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक छुट्टी दी जाती है, परंतु अधिकांश राज्यों में उन्हें यह सुविधा भी नहीं मिलती है।

नो वीक ऑफ, नो रेस्ट, ऑलवेज़ ऑन ड्यूटी !

सबसे बड़ी परेशानी यह है कि पूरे देश में पुलिस बल की भारी कमी है, जितनी संख्या में पुलिस कर्मचारी और अधिकारी सेवा-निवृत्त होते हैं, उतनी संख्या में नई भर्ती नहीं होने के कारण पूरे देश में लगभग एक चौथाई संख्या से काम चलाया जा रहा है। ऐसे में जो कर्मचारी काम कर रहे हैं, उन पर काम के भार का अनुमान लगाना भी मुश्किल है। एक-एक कर्मचारी को दिन 14-14 घण्टे काम करना पड़ता है। उन्हें सीनियरों के निजी काम भी करने पड़ते हैं। प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े मामलों की जांच के दौरान उन्हें राजनीतिक और उच्च अधिकारियों का दबाव भी झेलना पड़ता है। साप्ताहिक छुट्टी से उन्हें पुलिसकर्मियों को तनाव से मुक्ति मिलती है और अगले दिन वह नई ऊर्जा के साथ काम पर लौटते हैं। केरल में पुलिस को साप्ताहिक छुट्टी मिलती है, जिसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आये हैं, कि इस राज्य की पुलिस अन्य ऐसे राज्यों जहाँ पुलिस को साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती है, उन राज्यों की पुलिस से हर मामले में आगे हैं।

पुलिस को नहीं मिलता जवानों जैसा सम्मान

15 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति के हाथों से देश के 900 से अधिक पुलिस वालों को पुलिस पदक और विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया, परंतु समाज में लोग पुलिस को हेय दृष्टि से देखते हैं या फिर डरते हैं। समाज में ‘पुलिस की न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी अच्छी’ का मिथक व्याप्त है। ऐसा पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण है। कुछ समय पहले गुजरात के सीएम विजय रूपाणी ने स्वीकार किया था कि सर्वाधिक भ्रष्टाचार पुलिस विभाग और इसके बाद राजस्व विभाग में व्याप्त है। यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार ने पुलिस की छवि को कितना नुकसान पहुँचाया है। जबकि सभी पुलिस वाले ऐसे नहीं होते हैं, कुछ भ्रष्ट पुलिस वालों के कारण ही ऐसा हुआ है। अन्यथा पुलिस भी समाज का सुरक्षा बल ही है।

पुलिस ने भी दी हैं कई शहादतें

यह पुलिस वालों ने समय-समय पर सिद्ध भी किया है। मुंबई में 26/11 के हमले के दौरान हेमंत करकरे सहित कई उच्च पुलिस अधिकारियों की शहादत को कौन भूल सकता है ? अक्सर समाचारों में पढ़ने में आता है कि किसी चर्चित मामले की जाँच करने वाले पुलिस अधिकारी पर हमला हुआ है या किसी पुलिस वाले की हत्या कर दी गई। इस प्रकार पुलिस के जवान और अधिकारी भी ड्यूटी के लिये जान की बाज़ी लगाते आये हैं और निडरता से खतरनाक अपराधियों को पकड़कर उन्हें सजा दिलाते आये हैं। तमिलनाडु और केरल के जंगलों में खतरनाक चंदन चोर वीरप्पन ने उसे पकड़ने का प्रयास करने वाले कई पुलिस अधिकारियों की हत्या की थी। इस प्रकार पुलिस विभाग भी शहादत देने में पीछे नहीं है। हाल ही में देश के विभिन्न राज्यों में भारी बारिश से उत्पन्न हुए बाढ़ के हालात में पुलिस ने भी सेना और एनडीआरएफ के जवानों के साथ मिलकर राहत-बचाव के काम में बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई थी। सोशल मीडिया पर कई जगहों के ऐसे वीडियो वायरल हुए थे, जहाँ पुलिस वालों ने सही वक्त पर पहुँचकर लोगों की जान बचाई। गुजरात के राजकोट जिले में एक पुलिस कॉन्स्टेबल पृथ्वीराज सिंह जाड़ेजा ने दो बच्चों को अपने कंधों पर बैठाकर एक कि.मी. तक पानी के बीच चलकर उनकी जान बचाई थी। वड़ोदरा में भी एक पुलिसकर्मी नन्हीं बच्ची को टोकरी में रखने के बाद उसे वसुदेव की तरह सिर पर रखकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र से निकाल कर सुरक्षित स्थान पर लाया था। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में पिछले दिनों एक व्यक्ति ने पत्नी से झगड़े के बाद तैश में आकर खुद को फांसी पर लटका दिया था, परंतु घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँचे पुलिसकर्मी सत्येन्द्र ने उसे उतारकर सीपीआर दिया और उसकी जान बचा ली। इस सूझबूझ के लिये जिले के एसपी ने सत्येन्द्र कुमार यादव को 2,500 रुपये का नकद पुरस्कार भी दिया था। इस प्रकार पुलिस भी समाज की सुरक्षा के लिये संवेदनशील है, जरूरी है समाज भी पुलिस के प्रति संवेदनशील बने और पुलिस को लेकर अपनी सोच में बदलाव लाए।

वीडियो से समझें पुलिस कर्मचारियों की कठिन ड्यूटी

पुलिस किन परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाती है, यह दर्शाने के लिये यहाँ एक वीडियो प्रस्तुत है। वैसे तो यह वीडियो लगभग 4 माह पुराना है, परंतु आशा है कि इस वीडियो को देखकर पुलिस के प्रति समाज में बनी नकारात्मक तस्वीर को मिटाने और पुलिस के सकारात्मक पहलुओं को उजागर करने में मदद मिलेगी।

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