देखिए कैसे दो महिलाओं के बीच का मुकाबला बन गया है अमेठी का अखाड़ा ?

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लोकसभा चुनाव 2019 में वाराणसी के बाद दूसरी सबसे बड़ी हॉट सीट अमेठी में वैसे तो मुकाबला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के बीच है, परंतु चुनाव प्रचार अभियान शुरू होने के बाद ऐसा लग रहा है कि अमेठी के अखाड़े में मुकाबला दो महिलाओं के बीच का बन गया है। इनमें एक महिला तो भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी हैं, परंतु दूसरी महिला का नाम है प्रियंका गांधी वाड्रा।

वैसे तो कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका राजनीति में आने से पहले भी अमेठी में भाई राहुल और रायबरेली में माँ सोनिया गांधी के लिए हर बार प्रचार करती रही हैं, परंतु इस बार प्रियंका का विशेष जोर अमेठी पर दिखाई दे रहा है। प्रियंका गांधी ने अभी हाल ही में अमेठी का दो दिन का दौरा किया है। जिस प्रियंका पर पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को विजय दिलाने का जिम्मा है, वह प्रियंका भाई राहुल के प्रचार के लिए एक-दो बार अमेठी आए, तब तक तो स्वाभाविक है, परंतु उन्हें बार-बार अमेठी क्यों जाना पड़ रहा है ?

क्या स्मृति ने विवश किया प्रियंका को ?

राहुल गांधी अमेठी से 2004 से लगातार तीन बार चुने जाते रहे हैं। अमेठी को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। अमेठी में 1967 से 2014 के बीच हुए 2 उप चुनावों सहित कुल 14 चुनावों में से 13 बार कांग्रेस की जीत हुई। विजेता उम्मीदवारों में गांधी परिवार से राहुल के अतिरिक्त उनके काका संजय गांधी, पिता राजीव गांधी और माता सोनिया गांधी शामिल हैं। अमेठी की जनता ने केवल 2 बार कांग्रेस को हराया। 1977 में इंदिरा विरोधी लहर में जनता पार्टी और 1998 में भारतीय जनता पार्टी एक-एक बार यहाँ से चुनाव जीतने में सफल रहीं। इतना भव्य विजयी इतिहास होने के बावजूद क्यों एक तरफ राहुल गांधी को अमेठी के अलावा वायनाड सीट से चुनाव लड़ना पड़ा, तो दूसरी तरफ अमेठी की परम्परागत सीट पर जीत के लिए प्रियंका को बार-बार अमेठी के दौरे करने पड़ रहे हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में हैं स्मृति ईरानी की अडिगता। अक्सर राहुल गांधी के बारे में ये कहा जाता है कि वे अमेठी से जीतने के बाद लौट कर नहीं आते। इसमें पूरी बात सही नहीं भी हो सकती है, परंतु बात 2014 की ही लें, तो चुनाव जीतने के बाद राहुल ने अमेठी के जितने दौरे किए, उससे कहीं ज्यादा समय स्मृति ईरानी ने अमेठी में बिताया है। राहुल राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्तता के चलते अमेठी पर ध्यान न देने की बात का बहाना बना सकते हैं, परंतु स्मृति ईरानी 2014 में राहुल से हार के बावजूद अमेठी में डटी रहीं। उन्होंने पिछले 5 वर्षों में अमेठी के कई दौरे किए और गाँव-गाँव घूम कर राहुल की नाकामियों को उजागर करने की कोशिश की और आज भी वे वही कर रही हैं, जिसके कारण प्रियंका को भाई की सहायता के लिए अमेठी के प्रचार अभियान में कूदने को विवश होना पड़ा। अमेठी को लेकर कांग्रेस, राहुल और प्रियंका की चिंता इसलिए भी वाज़िब है, क्योंकि 2014 के आँकड़े डराने वाले रहे हैं। 2014 में राहुल भले ही तीसरी बार अमेठी से जीत गए, परंतु कांग्रेस के मत प्रतिशत में 2009 के मुकाबले 25 प्रतिशत की भारी गिरावट आई।

राहुल से अधिक सक्रिय स्मृति

2009 और 2014 के चुनावी आँकड़ों को देखने से स्पष्ट होता है कि मोदी लहर का असर अमेठी में दिखाई दिया था, तो स्मृति ईरानी की ओर से राहुल के विरुद्ध छेड़े गए अभियान में की गई मेहनत भी रंग लाई थी, जिसके चलते जिस भाजपा 2009 में केवल 5.81 प्रतिशत मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहना पड़ा था, उसी भाजपा की स्मृति ईरानी को 2014 में 28 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ 34.38 प्रतिशत मत मिले थे। इन आँकड़ों के कारण ही अमेठी के अखाड़े में इस बार राहुल की भव्य जीत की कल्पना तो क्या, साधारण जीत की संभावनाओं पर भी प्रश्न चिह्न लग गया है। इतना ही नहीं, आसान जीत की तो कोई संभावना ही नहीं बची है, क्योंकि राहुल अमेठी से नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद जहाँ पूरे देश में चुनावी प्रचार में व्यस्त हैं, वहीं स्मृति ईरानी केवल और केवल अमेठी में जमी हुई हैं। वे अमेठी में न केवल 2014 में भाजपा को मिले मतों को बनाए रखने की कोशिश में जुटी हैं, अपितु उनकी कोशिश तो राहुल को हरा कर इतिहास रचने तक की है। अमेठी के चुनाव प्रचार अभियान में जहाँ कांग्रेस के पास राहुल के अलावा प्रियंका ही एकमात्र चेहरा है। और कोई बड़े नेता का यहाँ प्रभाव नहीं है, वहीं स्मृति ईरानी स्वयं एक बड़ा चेहरा बन चुकी हैं और वे लगातार यहाँ चुनाव अभियान में जुटी हुई हैं। ऐसे में प्रियंका को अमेठी के दौरे करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इन सब परिस्थितियों, पिछले चुनावी आँकड़ों, स्मृति की सक्रियता, प्रियंका की मजबूरी को देखते हुए अमेठी का परिणाम इस बार चौंकाने वाला भी हो सकता है।

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