क्या यह सोनिया-राहुल की कांग्रेस का इंदिरा और इंडिया से ‘विद्रोह’ नहीं है ?

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क्यों इस देश का विपक्ष आतंकियों-जेहादियों के साथ खड़ा होने पर मजबूर है ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 29 जुलाई, 2019 (युवाPRESS)। क्या कांग्रेस का छोटे-से छोटा कार्यकर्ता भी जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक के गांधी-नेहरू परिवार के किसी नेता, उसके निर्णय या उसके आचरण के विरुद्ध जा सकता है ? और यदि उस अदने से कार्यकर्ता ने यह दुस्साहस कर दिया, तो उसका परिणाम क्या होगा ? पहले प्रश्न का उत्तर आप यही देंगे, ‘नहीं, कांग्रेस का कोई भी अदना-सा कार्यकर्ता भी नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल और यहाँ तक कि प्रियंका गांधी वाड्रा के विरुद्ध नहीं जा सकता।’ दूसरे प्रश्न का उत्तर आप देंगे, ‘जो ऐसा दुस्साहस करेगा, उसे कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा, फिर वह छोटा-सा कार्यकर्ता हो या शरद पवार, पी. ए. संगमा जैसा बड़ा नेता ही क्यों न हो।’

परंतु आपको जान कर आश्चर्य होगा कि 24 जुलाई, 2019 बुधवार को वर्तमान कांग्रेस की सबसे दिग्गज नेता सोनिया गांधी ने अपनी सास इंदिरा गांधी से खुला विद्रोह किया। इतना ही नहीं, सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने चार दिन पहले जो किया, वह इंदिरा ही नहीं, अपितु इंडिया से भी खुला विद्रोह है, जिसकी देश भर में आलोचना हो रही है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में लोकसभा से जब कांग्रेस के मुट्ठी भर सांसदों ने वॉकआउट किया, तब सोनिया सहित समूची कांग्रेस सवालों के घेरे में आ गई, क्योंकि जनता की ओर से नकारी गई इस टोली ने उस कानून में संशोधन के विरुद्ध सदन का बहिष्कार किया, जिसे इंदिरा गांधी ने ईजाद किया था, जिसे मनमोहन सिंह ने मजबूती दी थी और जिसे वर्तमान मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह नई धार दे रहे थे।

जी हाँ। हम बात कर रहे हैं विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम (UAPA) संशोधन विधेयक की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने नेतृत्व में दोबारा सरकार बनाने के साथ ही जिस सबसे बड़े काम का बीड़ा उठाया है, वह है भारत के 72 वर्षों से डँस रहे आतंकवाद के फन को कुचलने का काम। पीएम मोदी ने अमित शाह को गृह मंत्रालय भी इसी बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सौंपा है, ताकि भारत को दु:ख और पीड़ा देने वाले आतंकवाद को जड़ से नष्ट किया जाए, फिर वह जड़ भारत के किसी राज्य में हो, कश्मीर में हो या पड़ोसी देश पाकिस्तान में ही क्यों न हो। इसी उद्देश्य से मोदी सरकार ने यूएपीए संशोधन विधायक 2019 सदन में पेश किया, ताकि इसे और कड़ा बना कर भारत से आतंकवाद का समूल नष्ट करने का काम किया जा सके, परंतु यह भारत का दुर्भाग्य ही है कि चर्चा के दौरान आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने यूएपीए संशोधन विधेयक का विरोध किया।

इंदिरा गांधी ने किया था पहला संशोधन

जिस यूएपीए को लेकर कांग्रेस ने ऊहापोह मचा रखा है, वह यूएपीए कानून इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ही बनाया था। इसकी नींव पड़ी थी 1963 में, जब केन्द्र में लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी। भारतीय संप्रुभता और अखंडता की रक्षा के लिए एक कानून बनाने के वास्ते बनाई गई समिति की अनुशंसा पर पहली बार संसद में यूएपीए 1963 में पेश किया गया। 30 दिसम्बर, 1967 को यह बिल संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में पारित हुआ। उस समय केन्द्र में सरकार इंदिरा गांधी की थी और गृह मंत्री यशवंतराव चवाण थे। इस अधिनियम में पहला संशोधन 1969 में किया गया, तब भी केन्द्र में सरकार इंदिरा गांधी की थी। 2002 में जब प्रिवेंशन ऑफ टेररिज़्म एक्ट (POTA) को समाप्त किया गया, तब यूएपीए बिल को अधिक मजबूत बनाने के लिए 2004 में दूसरा संशोधन किया गया, तब केन्द्र में कांग्रेस नीत यूपीए के नेतृत्व वाली डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार थी। 2008 में मुंबई हमले के बाद इस कानून को और मज़बूत बनाने के लिए पुन: संशोधन किया गया, तब भी केन्द्र में सरकार मनमोहन सिंह की ही थी और 2012 में इसमें फिर एक बार संशोधन किया गया, तब भी मनमोहन सिंह सरकार ही केन्द्र में सत्तारूढ़ थी। ऐसे में जबकि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने आतंकवाद के विरुद्ध यूएपीए को मज़बूत बनाने की दिशा में अनेक ठोस प्रयास किए, तब वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व (वास्तव में अध्यक्ष विहीन पार्टी) को वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह की ओर से लाए गए यूएपीए संशोधन विधेयक 2019 से क्यों आपत्ति है ?

सवालों के घेरे में सोनिया और कांग्रेस

यूएपीए को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब गृह मंत्री अमित शाह नई धार दे रहे थे, तब सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस सांसदों का वॉकआउट करना उन्हें सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है। सोशल मीडिया पर भी इसकी ज़म कर आलोचना हो रही है और पूछा जा रहा है कि आखिर क्यों इंदिरा-राजीव के बाद की कांग्रेस हमेशा आतंकवादियों और जेहादियों के साथ खड़ी नज़र आती है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि काँग्रेस के कफ़न में एक और कील ठोक दी सोनिया गाँधी ने। इसीलिए काँग्रेस शनै: शनै: अपने अंत की ओर अग्रसर है। सोनिया गांधी ने सदन से वॉकआउट कर दिया, क्योंकि अमित शाह ने आतंकियों को धन देने वाले ओर जेहादी साहित्य उपलब्ध करवाने वालो को भी आतंकी मानने वाला बिल पास किया। जब वोटिंग की बारी आई. तो सोनिया सहित पूरी काँग्रेस ने सदन का बहिष्कार कर दिया कि ये बिल गलत है। आम जनता को यह समझ नही आ रहा कि सोनिया को आतंकियों को आर्थिक मदद करने वाले ओर जेहादी साहित्य से आतंकी बनाने वाले लोगो से क्यों सहानुभूति है ? लोग इस बात को भी देश का दुर्भाग्य मान रहे हैं कि देश का विपक्ष अपनी सरकार की बजाय आतंकियों के साथ खड़ा दिखाई दिया। दरअसल कांग्रेस ने सदन से वॉकआउट कर सिद्ध कर दिया है कि उसने लोकसभा चुनाव 2019 के जनादेश से कोई सबक नहीं सीखा। इसीलिए आज भी वह जातिवाद, क्षेत्रवाद, पार्टीवाद या अन्य किसी वाद से ग्रस्त है।

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