काश ! कांग्रेस यह ‘साहस’ कर जाती, तो मिल सकता था 61वाँ ‘कायाकल्पी’ अध्यक्ष !

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सोनिया गांधी व राहुल गांधी। (फाइल चित्र)

* 1885 में सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ह्यूम ने बनाई थी कांग्रेस

* 1919 में मोतीलाल के साथ हुई कांग्रेस में नेहरू परिवार की एंट्री

* 1925 में मोहनदास के साथ हुई ‘गांधी परिवार’ की एंट्री

* सुभाषचंद्र बोस और सरदार पटेल ने भी संभाली कमान

* ‘NON GANDHI-NEHRU’ परिवार से रहे 63 अध्यक्ष, केसरी अंतिम

* सोनिया गांधी के नाम 19 वर्षों के सबसे लम्बे कार्यकाल का रिकॉर्ड

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 11 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। लोकसभा चुनाव 2014 से लेकर अनेक राज्य विधानसभा चुनावों से होते हुए लोकसभा चुनाव 2019 तक एक के बाद एक करारी शिकस्तों का सामना करने के बाद कांग्रेस को अब कायाकल्प की आवश्यकता थी। लोकसभा चुनाव 2019 में अपने नेतृत्व में हुई पार्टी की हार के बाद राहुल गांधी ने तो कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया, परंतु उनके त्यागपत्र के 70 दिनों बाद भी देश की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक कांग्रेस पार्टी 61वाँ अध्यक्ष नहीं खोज सकी।

राहुल गांधी ने त्यागपत्र देते समय कहा था कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा। इसका सीधा अर्थ यह था कि न केवल राहुल गांधी अपना त्यागपत्र वापस नहीं लेंगे, अपितु सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा भी अध्यक्ष पद नहीं संभालेंगी। ऐसे में देश की आम जनता की ओर से नकार दी गई कांग्रेस को कायाकल्प करने का सुनहरा अवसर था। कांग्रेस पार्टी चाहती, तो यही सबसे उचित समय था, जब पार्टी के पुनरुत्थान के लिए कोई बड़ा कदम उठाया जाता, परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ वाली कहावत चरितार्थ करते हुए कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने फिर एक बार गांधी परिवार का ही रुख किया। सीडब्ल्यूसी ने सोनिया गांधी को नया अध्यक्ष बनने तक अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया।

‘लोकलाज’ को ठोकर मारने का था मौका

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक। (फाइल चित्र)

सीडब्ल्यूसी ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाने का निर्णय इसलिए किया, क्योंकि सीडब्ल्यूसी सदस्यों ने ‘लोकलाज’ को महत्व दिया। यहाँ लोकलाज का तात्पर्य यह है कि दूसरों के बारे में सोच कर अपना भला न सोचने की नीति। सीडब्ल्यूसी के नेताओं का मानना था कि यदि पार्टी गांधी परिवार से बाहर के भी किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनाएगी, तब भी विरोधी ये आरोप लगाएँगे कि पार्टी का रिमोट कंट्रोल सोनिया-राहुल यानी गांधी परिवार के ही पास है। वास्तव में यहाँ कांग्रेस को अपने आंतरिक विवेक से निर्णय करने की आवश्यकता थी। सोनिया और राहुल यदि सचमुच कांग्रेस का पुनरुत्थान करना चाहते थे, तो उन्हें न केवल अध्यक्ष पद से दूरी बनाए रखने की प्रतिबद्धता निभानी चाहिए थी, अपितु नए अध्यक्ष को संगठन को पुन: स्थापित करने में खुली छूट देनी चाहिए थी। एक नए व्यक्ति के अध्यक्ष बनने पर कार्यकर्ताओं में ‘अब कुछ नया होगा’ का उत्साह जागता। नया अध्यक्ष अपनी कार्यकुशलता से पार्टी के समक्ष स्वयं को एक सच्चा और कुशल नेता सिद्ध करने का प्रयास करता, परंतु संकीर्णता से ग्रस्त कांग्रेस की कार्यसमिति से देशवासियों को वही निर्णय सुनाई दिया, जिसकी अपेक्षा और चर्चा राहुल गांधी के त्यागपत्र के बाद से ही की जा रही थी। फर्क़ इतना है कि लोग यह कह रहे थे कि राहुल अंतत: मान जाएँगे, परंतु राहुल नहीं माने और घूम-फिर कर सोनिया हो की कमान सौंपी गई।

‘ऐसा’ करने से कांग्रेस में भूचाल नहीं आ जाने वाला था

कांग्रेस कार्यसमिति की शनिवार को हुई बैठक।

प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में कांग्रेस गांधी परिवार पर इतनी निर्भर हो गई है कि कोई नॉन-गांधी अध्यक्ष पार्टी संभाल ही नहीं सकता ? यदि कांग्रेस ने ऐसा किया होता, तो कोई भूचाल नहीं आ जाने वाला था। ऐतिहासिक पराभव के दौर से गुज़र रही कांग्रेस यदि नॉन-गांधी को अध्यक्ष बनाती, तो कुछ न कुछ फायदा ही होता, क्योंकि खोने के लिए कांग्रेस के पास था ही क्या ? ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस ने अपने इतिहास में कभी नॉन गांधी या नॉन नेहरू अध्यक्ष देखे ही नहीं हैं। 138 वर्षों के इतिहास में कांग्रेस पार्टी की कमान 60 अध्यक्षों ने संभाली। यदि कांग्रेस गांधी परिवार से ऊपर उठ कर सोचने दुस्साहस करती, तो निश्चित रूप से कांग्रेस को 61वाँ अध्यक्ष अवश्य मिलता और उससे पार्टी को ही फायदा होता।

क्या कहता है कि कांग्रेस का इतिहास ?

कांग्रेस के संस्थापक ए. ओ. ह्यूम और प्रथम अध्यक्ष वोमेश चंद्र बनर्जी। (फाइल चित्र)

कांग्रेस की स्थापना 28 दिसम्बर, 1885 को रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारी ए. ओ. ह्यूम ने की थी। इसकी स्थापना तत्कालीन ब्रिटिश शासकों से भारत को स्वतंत्र कराने के लिए भारत की ओर से संवाद करने वाले संगठन के रूप में की गई थी। स्थापना के बाद कांग्रेस पार्टी के प्रथम मुंबई अधिवेशन में व्योमेश चंद्र बनर्जी को पहला कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। 1885 से 1933 तक कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल 1 वर्ष रहा करता था। कांग्रेस में नेहरू परिवार की एंट्री 1919 में मोतीलाल नेहरू के अध्यक्ष बनने के बाद हुई। मोतीलाल नेहरू कांग्रेस के 29वें अध्यक्ष बने थे अर्थात् व्योमेश चंद्र बनर्जी से लेकर सैयद हसन इमाम तक सभी 28 अध्यक्ष नेहरू परिवार से नहीं थे। मोतीलाल नेहरू 1 साल तक अध्यक्ष रहे। उनके बाद 5 नेता अध्यक्ष बने और 1925 में मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष बन कर स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व दिया। महात्मा गांधी भी एक साल ही अध्यक्ष रहे।

नेहरू ने तोड़ी 1 साल के कार्यकाल की परम्परा

जवाहरलाल नेहरू 1929 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बने थे। (फाइल चित्र)

जवाहरलाल नेहरू 1929 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बने। नेहरू कांग्रेस के 39वें अध्यक्ष थे। नेहरू के पहले ही कार्यकाल में 1 वर्ष के कार्यकाल की परम्परा टूटी और नेहरू 2 वर्षों तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे। इसके बाद 1932 में सरदार वल्लभभाई पटेल कांग्रेस के 40वें अध्यक्ष बने। पटेल भी एक साल ही इस पद पर रहे। इसके बाद तीन वर्षों तक कांग्रेस की कमान नॉन गांधी-नॉन नेहरू परिवार के हाथों में रही, जिसमें राजेन्द्र प्रसाद भी दो साल अध्यक्ष रहे। 1936 में जवाहरलाल नेहरू पुन: अध्यक्ष बने और वे पुन: 2 साल इस पद पर रहे। फिर एक बार कांग्रेस में 6 अध्यक्ष गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के रहे, परंतु 1951 में नेहरू ने पूरी तरह कांग्रेस पर पकड़ बना ली और वे लगातार पाँच वर्ष अध्यक्ष रहे। नेहरू के बाद यू. एन. ढेबर ने कांग्रेस की कमान संभाली।

इंदिरा का उदय, सोनिया पर वापसी

इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी। (फाइल चित्र)

नेहरू के साथ ही राजनीति में बराबरी कदम बढ़ा रहीं उनकी बेटी इंदिरा गांधी तेजतर्रार नेता थीं और तेजी से उभर रही थीं। इसी कारण 1959 में इंदिरा गांधी 48वीं कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। पहला कार्यकाल उनका एक साल का ही रहा। कांग्रेस ने फिर एक बार गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के 7 अध्यक्षों को नेतृत्व सौंपा, परंतु 1978 में इंदिरा ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वापसी की और वे मृत्यु पर्यंत (31 अक्टूबर, 1984) तक इस पद पर रहीं। नेहरू और इंदिरा की करिश्माई लोकप्रियता ने कांग्रेस को गांधी परिवार पर पूरी तरह निर्भर बना दिया। इंदिरा के बाद पुत्र राजीव ने 1985 में कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाला। वे भी मृत्यु पर्यंत (21 मई, 1991 तक) इस पद पर रहे। राजीव के निधन के बाद सोनिया ने राजनीति में आने से इनकार किया, तो कांग्रेस को मजबूरन पी. वी. नरसिंह राव और सीताराम केसरी को अध्यक्ष बनाना पड़ा। केसरी 1998 तक अध्यक्ष रहे, परंतु सोनिया ने 1998 में राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ले ली। सोनिया 1998 से 2017 यानी 19 वर्षों तक इस पद पर रहीं। इस दौरान पार्टी 10 वर्षों तक केन्द्र में सत्ता पर रही, परंतु इंदिरा के बाद कांग्रेस का कोई भी अध्यक्ष कांग्रेस को कभी पूर्ण बहुमत नहीं दिला सका। नरसिंह राव से लेकर सीताराम केसरी और 2017 में अध्यक्ष बनने वाले राहुल गांधी भी यह सफलता नहीं हासिल कर सके। राहुल के त्यागपत्र के बाद कांग्रेस ने पुन: सोनिया पर ही वापसी की है।

कांग्रेस पार्टी के 1885 से 2019 तक के अध्यक्ष :

  1. व्योमेश चंद्र बनर्जी
  2. दादाभाई नौरोजी
  3. बदरुद्दीन तैयबजी
  4. जॉर्ज यूल
  5. विलियम वेडर्बर्न
  6. फिरोज़शाह मेहता
  7. आनंदाचार्लु
  8. ऑल्फर्ड वेब
  9. सुरेन्द्रनाथ बनर्जी
  10. रहीमतुल्ला एम. सयानी
  11. सी. शंकरन नायर
  12. आनंदमोहन बोस
  13. रोमेस चंदर दत्त
  14. एन. जी. चंदावरकर
  15. दिनशॉ एडुलजी वाचा
  16. लालमोहन घोष
  17. हेनरी कॉटन
  18. गोपालकृष्ण गोखले
  19. रासबिहारी घोष
  20. मदन मोहन मालवीय
  21. बिशन नारायण डार
  22. रघुनाथ नारसिंहा मुधोलकर
  23. नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर
  24. भूपेन्द्र नाथ बोस
  25. लॉर्ड सत्येन्द्र प्रसन्ना सिन्हा
  26. अम्बिका चरण मज़ूमदार
  27. एनी बेसंट
  28. सैयद हसन इमाम
  29. मोतीलाल नेहरू
  30. लाल लाजपत राय
  31. सी. विजयराघवाचारियर
  32. देशबंधु चितरंजन दास
  33. मोहम्मद अली जौहर
  34. अबुल कलाम आज़ाद
  35. मोहनदास गांधी
  36. सरोजिनी नायडू
  37. एस. श्रीनिवास आयंगर
  38. मुख़्तार अहमद अंसारी
  39. जवाहरलाल नेहरू
  40. वल्लभभाई पटेल
  41. नेली सेनगुप्ता
  42. राजेन्द्र प्रसाद
  43. सुभाषचंद्र बोस
  44. जे. बी. कृपलानी
  45. पट्टाभि सीतारमैया
  46. पुरुषोत्तम दास टंडन
  47. यू. एन. ढेबर
  48. इंदिरा गांधी (1959)
  49. नीलम संजीव रेड्डी
  50. के. कामराज
  51. एस. निजलिंगप्पा
  52. जगजीवन राम
  53. शंकरदयाल शर्मा
  54. देवकांत बरुआ
  55. कासु ब्रह्मनंद रेड्डी
  56. राजीव गांधी
  57. पी. वी. नरसिंह राव
  58. सीताराम केसरी
  59. सोनिया गांधी
  60. राहुल गांधी
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