धिक्कार है आज़ाद, उमर-फारूक़ और महबूबा पर, जिन्हें पाकिस्तान भारत के विरुद्ध ढाल बना रहा !

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* राष्ट्रवाद के साथ खड़ा न रहना राष्ट्रद्रोह नहीं ?

* स्वर्णिम राष्ट्रवादी भूतकाल से क्यों भटक रही कांग्रेस ?

* माया, नवीन, जगन, केसीआर और केजरी को सलाम !

* ममता ने तटस्थता का चोला ओढ़ पैरों पर मारी कुल्हाड़ी ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 8 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भारत में जिन लोगों ने बुधवार को पाकिस्तानी संसद के संयुक्त सत्र की कार्यवाही देखी होगी, उनके मन में भारत में रह कर भारत का खाकर कश्मीर पर ग़लतबयानी करने वाले भारत के नेताओं के लिए धिक्कार पैदा हुआ होगा, क्योंकि पाकिस्तान की संसद में चर्चा के दौरान भारत के इन नेताओं को कश्मीर की आज़ादी के लिए ढाल बनाया जा रहा था।

भारत की संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक और धारा 370 समाप्त करने का प्रस्ताव बहुमत से पारित किया और भारत में संसद से ऊपर तो सुप्रीम कोर्ट (SC) भी नहीं है। इस विधेयक और प्रस्ताव पर संसद के भीतर और बाहर भारत में जिन नेताओं ने विरोधी रुख अपनाया और ग़लतबयानी की, वो तमाम नेता बुधवार को पाकिस्तान की संसद के हीरो के रूप में पेश किए गए। पाकिस्तानी सांसदों ने कश्मीर से धारा 370 हटाने के विरुद्ध भारत में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद, नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के नेता उमर अब्दुल्ला, फारूक़ अब्दुल्ला और पीपल्स डेमोक्रैकिटक पार्टी (PDP) की नेता महबबा मुफ्ती के बयानों को आधार बना कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि भारत ने कश्मीरियों की कनपटी पर बंदूक रख कर धारा 370 हटाई।

पाकिस्तान की संसद में आज़ाद, उमर, फारूक़ और महबूबा के बयानों को आधार बनाया गया या यूँ कहें कि पाकिस्तान ने इन नेताओं और उनके बयानों के कश्मीर के मुद्दे पर भारत के विरुद्ध ढाल बनाया। क्या भारत के इन नेताओं पर एक सच्चे राष्ट्रवादी को गर्व हो सकता है ? क्या यदि सच्चे राष्ट्रवादी भारतीय नागरिक आज़ाद, उमर, फारूक़ और महबूबा जैसे नेताओं को राष्ट्रद्रोही कहें, तो क्या यह अतिश्योक्ति होगा ? कुछ लोग इन नेताओं की आवाज़ को कश्मीर की जनता की आवाज़ बता कर उनके विरोध को जायज़ ठहराने का प्रयास कर रहे हैं, परंतु क्या गुलाम नबी आज़ाद ने गुरुवार को यह कह कर पाकिस्तान और उसके नेताओं के हौसले और बुलंद नहीं कर दिए कि कश्मीर में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोवाल की उपस्थिति में सामान्य हालात दर्शाए जाने वाले वीडियो में लोगों को पैसे देकर बुलाया गया था ?

इतिहास से क्यों नहीं सीख रही कांग्रेस ?

इतिहास गवाह है, जब-जब भारत में राष्ट्रवाद मुखर हुआ, तब-तब सरकार किसी भी दल की रही हो, तत्कालीन विपक्ष ने सत्ता पक्ष का साथ ही दिया है। इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि 1998 से 2004 के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में और 2014 से 2019 के दौरान नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल के अलावा पूर्ववर्ती जनसंघ और वर्तमान भाजपा अक्सर विपक्ष में रहे। इन दोनों कालखंडों से पहले 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से लेकर 1974 में भारत के प्रथम पोखरण परमाणु परीक्षण तक जब-जब राष्ट्रवाद का मुद्दा मुखर हुआ, तब-तब केन्द्र में नेहरू-शास्त्री-इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकारें थीं और वर्तमान भाजपा का पूर्ववर्ती रूप जनसंघ विपक्ष में था। इन सभी घटनाक्रमों के दौरान जनसंघ के तत्कालीन नेताओं ने जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी की सरकारों का साथ दिया। यहाँ तक कि तत्कालीन जनसंघ के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तो इंदिरा गांधी की भरी संसद में भरपूर प्रशंसा की। ऐसे में जब जनसंघ के नए रूप में भाजपा केन्द्र की सत्ता में आई, तब उसका भी विपक्ष कांग्रेस से यही अपेक्षा रखना ग़लत तो नहीं था, परंतु इतिहास इस बात का भी गवाह है कि कांग्रेस ने वाजपेयी और मोदी के कार्यकाल के दौरान घटी कई घटनाओं के दौरान दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर सरकार का साथ नहीं दिया। अटलजी के नेतृत्व में भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण किया, कारगिल युद्ध जीता, परंतु कांग्रेस ने उस अपनी टीका-टिप्पणियों के साथ सरकार का साथ दिया। कंधार विमान अपहरण कांड के दौरान जब विपक्ष कांग्रेस को सरकार को अपहर्ता आतंकवादियों के विरुद्ध कमांडो कार्रवाई करने की सलाह देनी चाहिए थी, तब कांग्रेस ने सड़कों पर विमान में फँसे यात्रियों को बचाने के लिए उनके परिजनों के साथ मिल कर वाजपेयी सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किया। मोदी के नेतृत्व में भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, अभिनंदन वर्तमान की वापसी से लेकर कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसे राष्ट्रवादी निर्णय किए, परंतु विपक्ष कांग्रेस ने इतिहास से सीख न लेते हुए सर्जिकल-एयर स्ट्राइक के सबूत मांगे, तो धारा 370 का संसद में विरोध किया। क्या कांग्रेस का राष्ट्रवाद के साथ यूँ खड़ा न रहना उसके स्वर्णिम राष्ट्रवादी भूतकाल को कलंकित नहीं कर रहा ? क्या नेतृत्वविहीन होने के बावजूद सोनिया-राहुल के परोक्ष नेतृत्व वाली कांग्रेस कश्मीर पर दलहित से ऊपर नहीं उठ कर देश के साथ राष्ट्रद्रोह नहीं कर रही ?

ऐतिहासिक कांग्रेस को नीचा सिद्ध कर दिया इन नौसीखियों ने

यह वही कांग्रेस है, जिसने अंग्रेजों की 200 वर्षों की दासता से मुक्ति के लिए छेड़े गए ऐतिहासिक राष्ट्रवादी स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था, परंतु पार्टी के वर्तमान नेता अपने स्वर्णिम भूतकाल से ऐसे भटक गए हैं और असमंजस में हैं कि उनकी करतूतें दुश्मन देश पाकिस्तान को फायदा पहुँचा रही है। 138 वर्ष पुरानी कांग्रेस से अच्छी तो वह क्षेत्रीय पार्टियाँ हैं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत में जन्म लिया और इसके बावजूद दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर ऐतिहासिक कांग्रेस को नीचा दिखा दिया। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक और धारा 370 उन्मूलन संकल्प आज साकार हुआ है, तो जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक, मायावती, के. चंद्रशेखर राव, अरविंद केजरीवाल और ई-मधुसूदन जैसे नेताओं के कारण हुआ है। सभी जानते हैं कि मोदी सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, परंतु वायएसआर कांग्रेस (YSR CONGRESS), बीजू जनता दल (बीजेडी-BJD), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी-BSP), तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस-TRS), आम आदमी पार्टी (AAP) और अखिल भारतीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कषगम् (AIADMK) ने कश्मीर पर राज्यसभा में मोदी सरकार का साथ दिया। इन सभी नेताओं और उनके राजनीतिक दलों का इतिहास कांग्रेस जितना पुराना नहीं है। इसके बावजूद कांग्रेस ने अपने राष्ट्रवाद को इतना संकीर्ण कर लिया है कि देश की जनता आज कांग्रेस को नहीं, बल्कि इन नेताओं और इनके दलों को सलाम कर रही है।

बोस और टैगोर का अपमान नहीं कर गईं ममता ?

स्वतंत्रता आंदोलन में पश्चिम बंगाल के कई स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे, जो राष्ट्रवाद की भावना से लबरेज थे। इनमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर तक शामिल हैं। बोस और टैगोर को बंगाल की अस्मिता से जोड़ने वालीं पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने धारा 370 पर तटस्थतावाद अपना कर बोस और टैगोर का अपमान करने वाला काम कर दिया। ममता पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतों के मोह में इस तरह नेत्रहीन हो गई हैं कि उन्हें इस बात का डर सताने लगा कि धारा 370 समाप्ति की समर्थन करने से कहीं उनके राज्य के मुसलमान उनसे व टीएमसी से नाराज़ न हो जाएँ। काश ! ममता यह समझ पातीं कि धारा 370 हिन्दू-मुस्लिम विवाद का मामला नहीं थी, अपितु राष्ट्रवाद पर चोट करती थी। जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनने से रोकती थी। ममता बनर्जी ने जो तटस्थ रुख अपनाया है, उसका ख़ामियाजा उन्हें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में भुगतना होगा। वैसे भी राज्य की जनता ने लोकसभा चुनाव 2019 में ममता को चेतावनी तो दे ही दी है। ऐसे में जब ममता के पास संभलने का मौका था, तब उन्होंने धारा 370 पर तटस्थ रुख अपना कर भाजपा को राज्य में उनके विरुद्ध राष्ट्रवाद के नाम पर हमला करने का मौका दे दिया और बंगाल की देशभक्त जनता ने भी ममता के इस रुख को गंभीरता से लिया ही होगा।

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