‘पितृ देवो भव:’ वाले देश में दु:खी क्यों हैं पिता ? किसी ने सरकार को दे दी संपत्ति, तो किसी ने जीवित बेटी का करवाया मृत्यु भोज

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विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 2 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भारतीय संस्कृति में ‘मातृ देवो भव:’ और ‘पितृ देवो भव:’ की अवधारणा है। भारत में माता-पिता को देवों की संज्ञा दी गई है, परंतु आज की युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति के इन मानदंडों से भटक गई लगती है। यही कारण है कि देश में तेजी से वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं। प्रश्न यह उठता है कि अंतत: माता-पिता उन्हीं के अंश यानी अपनी संतानों से इतने दु:खी क्यों हैं ?

पश्चिमी संस्कृति में रंगी आज की पीढ़ी का क्या माता-पिता के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है ? आज हम यहाँ दो ऐसे किस्से प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जो हमारे मन में यही प्रश्न पैदा कर रहे हैं ? इन दो किस्सों में से एक में एक वृद्ध पिता ने अपनी संपत्ति से पुत्र को न केवल बेदखल कर दिया, अपितु सारी संपत्ति सरकार को दान कर दी, तो दूसरे किस्से में एक पिता इस हद तक विवश हो गया कि उसने अपनी जीवित बेटी का मृत्यु भोज करवा दिया। दोनों किस्से अपने आप में एक संदेश समान हैं। दोनों किस्सों में एक पिता जहाँ अपने पुत्र से दु:खी है, वहीं एक पिता अपनी पुत्री से।

‘मेरे बेटे को मेरी अस्थियाँ भी मत छूने देना’

उपरोक्त चित्र में दिखाई दे रहे वृद्ध व्यक्ति का नाम खेत्रमोहन मिश्रा है। इनकी आयु 75 वर्ष की है। यह पिता अपने ‘कपूत’ से इतना तंग आ गया कि उसने अपनी सारी संपत्ति सरकार के हवाले कर दी। वह कपूत के साथ रहने की बजाए वृद्धाश्रम में रहना चाहता है। पत्रकार रहे खेत्रपाल मोहन मिश्रा ओडिशा में जाजपुर के दशरथपुर प्रखंड स्थित मुरारीरपुर गाँव के निवासी हैं। खेत्रमोहन का कहना है, ‘मेरी ज़मीन पर एक वृद्धाश्रम बनाया जाए, जहाँ वृद्धजन अपने जीवन के अंतिम क्षण शांति और संतोष के साथ व्यतीत कर सकें।’ खेत्रमोहन का आरोप है कि उनके बेटे-बहू का व्यवहार उनके प्रति अच्छा नहीं है। इसीलिए उन्होंने अपना सब कुछ (सारी सम्पत्ति) सरकार के नाम कर डाला। वे अपना शेष जीवन वृद्धाश्रम में बिताना चाहते हैं। खेत्रमोहन के इस कदम पर जाजपुर जिला कलक्टर रंजन के. दास ने तुरंत कार्यवाही की। कलक्टर ने कहा कि प्रशासन खेत्रमोहन के रहने की व्यवस्था चंडीखोले के पास एक वृद्धाश्रम में कर रहा है। कलक्टर रंजन के. दास ने कहा, ‘खेत्रमोहन मिश्रा ने हमसे निवेदन किया है कि उनके मरने के बाद उनकी अस्थियों पर भी उनके बेटे-बहू को अधिकार न दिया जाए। खेत्रमोहन ने अपनी एक ज़मीन दान में दी है और वे चाहते हैं कि उनकी ज़मीन पर एक वृद्धाश्रम बनाया जाए। प्रशासन ने उनकी इच्छा तत्काल स्वीकार करते हुए उनकी ज़मीन पर वृद्धाश्रम निर्माण का निर्णय किया है।’

जब बेटी ने नहीं पहचाना, तो पिता ने करवा दिया मृत्यु भोज

आज के युग में जिसे जनरेशन गैप (पीढ़ी का अंतर) कहा जाता है, वह हर युग की समस्या रहा है। ऐसी मामलों में अक्सर संतानें अपने जन्मदाता माता-पिता के प्रति अपने उत्तरदायित्व से भटक जाते हैं। हम यह नहीं कह रहे कि युवा वर्ग को अपनी इच्छा से जीने की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए, परंतु यह स्वच्छंदता नहीं हो सकती। स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं, अपितु एक उत्तरदायित्व भी है। संतुलन के साथ स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग किया जाए, तो उत्तरदायित्व निभाने में चूक नहीं होगी। हम अब जिस किस्से की चर्चा करने जा रहे हैं, उसमें एक बेटी ने जब पिता को पहचानने से इनकार कर दिया, तो क्रोधित पिता ने बेटी का न केवल परित्याग किया, अपितु उसे मृत घोषित कर मृत्यु भोज भी करवाया। मामला मध्य प्रदेश के मंदसौर का है। मंदसौर के कुचदौड़ गाँव की एक 19 वर्षीय युवती ने घर से भाग कर अपने प्रेमी से विवाह कर लिया। मामला जब पुलिस थाने पहुँचा, तो वहाँ बेटी ने अपने पिता को पहचानने से ही इनकार कर दिया। बेटी ने पुलिस वालों से कहा, ‘मैं नहीं जानती यह कौन हैं ?’ बेटी की इस बेदर्द हरकत से आहत पिता इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने अपने ही अंश से सारे संबंध तोड़ लिए। उन्होंने अपनी बेटी को मृत घोषित कर बाकायदा शोक संदेश छपवाए और संबंधियों को मृत्यु भोज भी करवाया। आख़िर एक पिता इस हद तक क्यों मजबूर हो गया ? हम यहाँ किसी प्रेमी-प्रेमिका के या उनके विवाह करने के अधिकार के विरुद्ध नहीं हैं, परंतु एक 19 साल की लड़की को यदि संविधान और कानून अपनी मरजी से विवाह करने का अधिकार देता है, तो संस्कृति भी उसे अपने माता-पिता की भावनाओं को समझने का उत्तरदायित्व देती है। बेटी ने जिस युवक से विवाह किया, उसे वह छठी कक्षा से जानती थी। दोनों के बीच प्रेम पनपा, परंतु बेटी के पिता और घर वाले इस विवाह के विरुद्ध थे। बेटी ने पिता का दर्द नहीं समझा और उसी युवक से कोर्ट मैरेज कर ली।

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