‘04’ के चटखारे की चाहत : ये दो तर्क और फर्क समझने वाला 23 मई को ‘मुंगेरीलाल’ सिद्ध होने से बच जाएगा !

2004 और 2019 की तुलना करने से पहले जान लेना चाहिए कि कश्मीर से कन्या कुमारी और कच्छ से कामरूप तक बदल चुकी है राजनीति

सूक्ष्म विश्लेष : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 18 मई, 2019। याद कीजिए 10 मई, 2004 का वह दिन, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चुनाव मैनेजमेंट में माहिर तत्कालीन भाजपा नेता प्रमोद महाजन सहित सम्पूर्ण भाजपा नेताओं के चेहरे खिलखिला उठे थे। लोकसभा चुनाव 2014 के अंतिम चरण के मतदान सम्पन्न होते ही 10 मई को तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तत्कालीन सीमित संसाधनों के साथ EXIT POLLS घोषित किए थे। सभी एग्ज़िट पोल ताल ठोक कर कह रहे थे कि केन्द्र में छह वर्षों से सुनियोजित ढंग से श्रेष्ठतम् काम कर रही अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग-NDA) सरकार की वापसी निश्चित है, परंतु आपको ठीक 15 वर्ष और 5 दिन पुरानी वह तारीख़ भी याद दिला देते हैं, जिसने अटल बिहारी वाजपेयी सहित समूची भाजपा और उसके नेताओं को गहरा आघात पहुँचाया। वह तारीख थी 13 मई, 2004, जब चुनाव परिणाम घोषित हुए और भाजपा 2009 की 182 सीटों से सिमट कर 145 पर आ गई, तो एनडीए की कुल सीटें 2009 की 299 से सिमट कर 189 पर आ गईं। कुल मिला कर वाजपेयी सरकार का पतन हो गया। दूसरी तरफ 13 मई, 2004 का दिन तत्कालीन कांग्रेस और वाजपेयी सरकार को बहुमत न मिलने के कारण बनाए गए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग-UPA) के लिए ‘अंधे के हाथ बँटेर लग जाने’ जैसा सिद्ध हुआ। 2004 के चुनाव में 20 वर्षों की परम्परा जारी रखते हुए देश ने खंडित जनादेश ही दिया था। एनडीए को बहुमत नहीं मिला था, तो कांग्रेस भी केवल 145 सीटें पाकर बहुमत से बहुत दूर थी। यद्यपि कांग्रेस की सीटें 1999 की 114 सीटों के मुकाबले 2004 में बढ़ी थीं। इसके बावजूद वह सबसे बड़ी पार्टी नहीं थी, परंतु कांग्रेस ने जब देखा कि सत्ता का छींका स्वयं उसके मुँह पर गिरने को तैयार है, तो उसने अभाजपाई विचारधारा वाले सभी दलों को मिला कर यूपीए बनाया और इस नवगठित यूपीए की सीटों का संख्या बल 225 हुआ। कांग्रेस ने 55 सीटें पाने वाले तीसरे मोर्चे और अन्य क्षेत्रीय और छोटे दलों का सहयोग लेकर डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार बना ली, जिसने 10 वर्षों तक शासन किया।

सोनिया को याद आया 2004 का ‘चटखारा’

आपको 15 वर्ष पुराना यह घटनाक्रम इसलिए याद दिलाना पड़ा, क्योंकि गत 11 अप्रैल, 2019 को यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रायबरेली से नामांकन पत्र भरते वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चेतावनी देते हुए कहा था, ‘2004 मत भूलिए। वाजपेयी भी अजेय थे, लेकिन हम जीते।’ सोनिया गांधी के इस वक्तव्य ने भाजपा-एनडीए-मोदी विरोधी तमाम नेताओं के मन में मोदी के साथ 2004 जैसा कुछ होने के सपने जगा दिए। इसीलिए जहाँ लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा-एनडीए को छोड़ कर कोई भी दल-गठबंधन पूर्ण बहुमत का दावा नहीं कर रहा है, वहीं मोदी विरोधी टोली ने राज्यों में चुनावी ज़मीन पर एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ने के बाद भी 23 मई से पहले ही दिल्ली में मिशन सरकार पर काम करना शुरू कर दिया है। मिशन सरकार का नेतृत्व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर रहे हैं और इसका खाका तैयार करने में जुटे हैं चंद्रबाबू नायडू, के. चंद्रशेखर राव, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता। ये वही नेता हैं, जो चुनावी ज़मीन पर एक-दूसरे को गालियाँ बक कर आए हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस टोली में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े गठबंधन समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी-राष्ट्रीय लोकदल यानी सपा-बसपा-रालोद के नेता अखिलेश यादव, मायावती और अजित सिंह बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। इसका संकेत यह है कि यूपी में मोदी को रोकने के लिए बनाए गए इस महागठबंधन को 23 मई को अपनी जीत का पूरा भरोसा नहीं है, तो ममता बैनर्जी का ऐसी किसी कवायद में 23 मई से पहले शामिल होने से इनकार करना यह बताता है कि उन्हें भी अपने गढ़ पश्चिम बंगाल में सेंध लगने की पूरी-पूरी आशंका है।

क्या था एग्ज़िट पोल का निष्कर्ष और क्यों ग़लत सिद्ध हुआ ?

उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार लोकसभा चुनाव 2004 में सभी एग्ज़िट पोल का निष्कर्ष एक ही था कि भाजपा-एनडीए बहुमत से 5-10 सीटें दूर रहेंगे। तत्कालीन 5 बड़े मीडिया हाउस की ओर से 10 मई, 2004 को घोषित किए गए सभी एग्ज़िट पोल में भाजपा-एनडीए को 265 से 282 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया था। इन पाँच एग्ज़िट पोल में कांग्रेस व सहयोगी दलों को 167 से 187 सीटें और अन्य को 87 से 100 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया था, परंतु परिणाम के वक्त सारे एग्ज़िट पोल के निष्कर्ष ग़लत सिद्ध हुए और इसके पीछे एक कारण तत्कालीन सीमित संसाधन था, तो दूसरा सबसे बड़ा कारण भाजपा नेताओं का अति आत्म-विश्वास। तीसरा कारण जो भाजपा नेताओं के अति आत्म-विश्वास के कारण ही पैदा हुआ, वह यह था कि समय सीमा से पहले यानी नवंबर-दिसंबर-2004 की बजाए 6 महीने यानी अप्रैल-मई-2004 में चुनाव कराए गए। चौथा और अंतिम सबसे महत्वपूर्ण कारण था भाजपा नेताओं का अति आत्म-विश्वास से लबरेज यह प्रचार कि वाजपेयी सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं और उनकी वापसी तय है। देश में चहुँओर शाइनिंग इंडिया और फील गुड का नारा फैला कर तत्कालीन भाजपा नेताओं ने वाजपेयी को पुनः प्रधानमंत्री बनाने की चाहत रखने वाले भाजपा के परम्परागत वोटरों के मन में यह बात अच्छी तरह बैठा दी कि जीत भाजपा-एनडीए की निश्चित ही है। इस निश्चित जीत के भ्रम में 2004 में मतदान का प्रतिशत घटा। 1999 में 60 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि 2004 में वाजपेयी की जीत सुनिश्चित मान कर बैठ चुके भाजपा के परम्परागत वोटर घर से बाहर नहीं निकले और 58 प्रतिशत मतदान हुआ। 2 प्रतिशत कम मतदान ही वाजपेयी सरकार के पतन का कारण बना।

चमत्कार के चहेते समझें प्रारब्ध और पुरुषार्थ में अंतर

सोनिया गांधी ने बात क्या छेड़ी, मोदी विरोधी दलों और नेताओं की टोली यही मान बैठी कि देश 2004 को 2019 में दोहराने जा रहा है। इसीलिए तो परिणाम से पहले मिशन सरकार छेड़ा गया है, परंतु 2004 जैसे चमत्कार की चाहत रखने वालों की मंशा 2019 में इसलिए पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि इन 15 वर्षों में कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक भारत की सभी नदियों में बहुत पानी बह चुका है और राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है। सबसे पहले तो मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने वालों को यह जानना होगा कि उनका पाला अटल-आडवाणी-महाजन से नहीं, अपितु मोदी-शाह से पड़ा है, जो रणनीति के मामले में अपने पूर्वजों से कोसों आगे है। 2004 और 2019 के बीच टेक्नोलॉजी का भी बड़ा फर्क है। 2004 में जहाँ सोशल मीडिया का बोलबाला नहीं था, वहीं भाजपा में घातक-मारक प्रचार की रणनीति और वाजपेयी सरकार के कार्यों की मार्केटिंग में कमी थी, परंतु इसके उलट 2019 की भाजपा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह एक-एक राज्य की एक-एक सीट के लिए अलग रणनीति के साथ काम करते हैं, मोदी सरकार के पाँच वर्षों के कार्यों की जम कर मार्केटिंग की गई। सोशल मीडिया से लेकर पूरी दुनिया में मोदी का बोलबाला रहा। अटल सरकार ने 1999 में करगिल युद्ध जीता था, परंतु उन्होंने भी सेना को नियंत्रण रेखा (LOC) पार करने की अनुमति नहीं दी थी, जबकि मोदी सरकार ने अपने पाँच वर्ष के कार्यकाल में एलओसी पार कर पाकिस्तान में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के जरिए अपने मजबूत नेतृत्व का परिचय दिया। मोदी सरकार की कई योजनाएँ भी लोगों को प्रभावित करने में सफल रही हैं। ऐसे में 2004 की तरह यह मान लेना कि 2019 में भी मोदी ही आएगा का नारा केवल नारा बन कर रह जाएगा और कांग्रेस सहित मोदी विरोधी टोली के सामने 2004 जैसा कोई चमत्कार हो जाएगा, बिल्कुल बेमानी है। 2004 और 2019 का एक और महत्वपूर्ण और बुनियादी फर्क यह है कि 2004 में कांग्रेस को बिना पुरुषार्थ किए प्रारब्धवश (भाग्यवश) सत्ता मिल गई थी, परंतु कांग्रेस ने इन 15 वर्षों में पुरुषार्थ पर कोई काम नहीं किया। यही कारण है कि 2019 में भी कांग्रेस प्रारब्ध पर निर्भर है और राहुल गांधी के अलावा किसी बड़े नेता ने चुनाव जीतने के लिए बहुत बड़ा पुरुषार्थ नहीं किया। इसके विपरीत भाजपा के सभी नेताओं, मोदी और शाह ने कांग्रेस सहित सभी मोदी विरोधी टोली के मुकाबले कहीं अधिक पुरुषार्थ किया है। अकेले मोदी ने सभी महत्वपूर्ण 27 राज्यों में 144 रैलियाँ कर 216 घण्टे भाषण दिया, तो अमित शाह की रैलियों और रोड शो का आँकड़ा मोदी से भी अधिक है। इस तरह मोदी सरकार और भाजपा संगठन ने इस चुनाव को जीतने के लिए जो परिश्रम किया है, वैसा परिश्रम 2004 में तत्कालीन भाजपा नेताओं ने नहीं किया था।

यह अंतर जाना, तो नहीं आएँगे मुंगेरीलाल के हसीन सपने

अब 2014 और 2019 के बीच के फर्क को समझने का प्रयास करते हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले तक तो भाजपा केवल कुछ राज्यों तक सीमित थी और कई राज्यों में उसे जहाँ 1 से 5 सीटें मिली थीं, तो कई राज्यों में खाता भी नहीं खुला था। कुल मिला कर 2014 में भाजपा कुछ हिन्दी भाषी राज्यों तक सीमित थी और उसकी केवल 7 राज्यों में सरकारें थीं, परंतु लोकसभा 2014 में मोदी लहर में भाजपा ने देश के 26 राज्यों में उपस्थिति दर्ज कराई। इस चुनाव में जहाँ कुछ राज्यों में भाजपा का न्यूनतम् आँकड़ा 0 से बढ़ कर 1 से 5 सीटों पर पहुँचा, वहीं देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से सर्वाधिक 71 सीटें प्राप्त कीं। 2014 और 2019 में इससे भी बड़ा बुनियादी फर्क यह है कि पाँच वर्षों के बाद भाजपा का आज उन राज्यों में भी विस्तार हुआ है, जहाँ उसका कभी कोई नामलेवा नहीं था। फिर वे दक्षिण भारत के राज्य हों या पूर्वोत्तर भारत के। भाजपा ने पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय दलों को एनडीए से जोड़ कर पूर्वोत्तर से कांग्रेस का लगभग सफाया कर दिया है। इतना ही नहीं, 2014 में 7 राज्यों तक सीमित रहने वाली भाजपा ने दिसम्बर-2017 तक देश के 21 राज्यों में अपनी या एनडीए के साथ मिल कर सरकार बनाई। इसके बाद 2018 में स्थिति थोड़ी पलटी और भाजपा शासित राज्यों की संख्या 17 पर आ गई, परंतु फिर भी यह 2014 के मुकाबले लगभग ढाई गुना अधिक है। ऐसे में जबकि 17 राज्यों में भाजपा-एनडीए की सरकार हो, विपक्ष बिखरा-बिखरा हो और नए-नए राज्यों में भाजपा का जनाधार बढ़ रहा हो, तब यह सपने संजोना कि देश 2014 की तरह पूर्ण बहुमत वाली सरकार न बना कर 2004 की तरह टुकड़े-टुकड़े विपक्ष के आगे सरकार की थाली परोस देगा, तो यह तो मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने जैसा ही हुआ ना।

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