महाराष्ट्र : क्यों कर्नाटक जैसी और जितनी आसान नहीं है विपक्ष की राह ?

* सुप्रीम कोर्ट में भी भारी पड़े सरकारी पक्ष के वक़ील

* कर्नाटक में एक कुमार थे, महाराष्ट्र में दो-दो पवार

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 25 नवंबर, 2019 (युवाPRESS)। महाराष्ट्र में सत्ता के खेल में लगातार जारी उतार-चढ़ावों के बीच कभी यह लगता है कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के लिए विधानसभा में बहुमत सिद्ध करना असंभव है, क्योंकि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस (SNC) पूरी तरह एकजुट हैं। तीनों पार्टियों के विधायकों की एकजुटता को देख कर कुछ लोग तो यह भी दावा करने से नहीं हिचक रहे कि फडणवीस सरकार भी दिसम्बर-2017 में जिस तरह कर्नाटक में भाजपा नेता बी. एस. येदियुरप्पा की सरकार बिना बहुमत सिद्ध किए गिर गई थी, उसी प्रकार गिर जाएगी, परंतु हर राज्य और हर समय स्थिति एक समान नहीं होती। कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) यानी जेडीएस (JDS) के बीच धर्मनिरपेक्षता और भाजपा विरोध को लेकर जितना धारदार प्रतिबद्धता थी, वैसी स्थिति महाराष्ट्र में नहीं है, क्योंकि यहाँ कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना तीन पार्टियाँ हैं और तीनों में ही नहीं, अपितु दो-दो पार्टियों की विचारधाराओं में भी कई विरोधाभास है।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2017 में जनता ने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को नकार दिया था, परंतु भाजपा भी पूर्ण बहुमत से दूर रह गई थी। इसके बावजूद राज्यपाल वजूभाई वाळा ने भाजपा नेता येदियुरप्पा को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया और उन्हें 15 दिनों में बहुमत सिद्ध करने का समय दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। यहाँ कांग्रेस और जेडीएस को आपत्ति बहुमत सिद्ध करने के लिए अधिक समय देने को लेकर थी। सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिनों में विश्वास मत साबित करने को कहा और इस दौरान कांग्रेस-जेडीएस की इस वैचारिक समानता कि भाजपा को सत्ता से दूर रखना है ने दोनों पार्टियों को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और येदियुरप्पा ने विश्वास मत पर मतदान से पहले ही त्यागपत्र दे दिया।

यदि कोई राजनीतिक विश्लेषक कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम के महाराष्ट्र में पुनरावर्तित होने की कल्पना करे, तो यह उसकी भूल होगी। वास्तव में कर्नाटक में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सिद्धरमैया को केवल जेडीएस नेता कुमारस्वामी को साधे रखना था और यह कार्य कोई मुश्किल भी नहीं था, परंतु महाराष्ट्र में कांग्रेस की बहुत बड़ी भूमिका नहीं है। सारा खेल एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के इर्द-गिर्द हो रहा है। इसमें भी पवार के अपने भतीजे अजित पवार ने जो कदम उठाया है, उसे लेकर भी शरद पवार पर ही संशय किया जा रहा है कि अजित के कदम के पीछे शरद का हाथ है। महाराष्ट्र में सबसे पहले तो कांग्रेस-एनसीपी में ही कई मतभेद हैं। एनसीपी में पारिवारिक मतभेद हैं। कांग्रेस-एनसीपी के शिवसेना के साथ वैचारिक मतभेद हैं। इतने सारे विरोधाभासों के बीच यदि फडणवीस सरकार बच जाए, तो इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं होगी।

इस बीच सुप्रीम कोर्ट पहुँचा महाराष्ट्र का मुद्दा अब मंगलवार पर टल गया है, परंतु क़ानूनी लड़ाई में भी केन्द्र सरकार, राजभवन और फडणवीस सरकार का पलड़ा शिवसेना, एनसीपी व कांग्रेस पर भारी ही दिखाई दिया। दलीलों के दौरान जहाँ सरकारी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट कहा कि यह मामला कर्नाटक जैसा नहीं है, क्योंकि राज्यपाल ने सभी दलों को बारी-बारी से सरकार बनाने के लिए बुलाया, परंतु कोई भी बहुमत विधायकों की संख्या की चिट्ठी के साथ सरकार बनाने नहीं पहुँचा। फडणवीस और अजित पवार समर्थन की चिट्ठी के साथ पहुँचे। इसीलिए उन्हें सरकार बनाने का अवसर दिया गया। उन्हें बहुमत सिद्ध करने के लिए दिया गया 7 दिन का समय भी उचित ही है। दूसरी तरफ विपक्ष के वक़ीलों ने केन्द्र सरकार और राजभवन पर आरोप लगाया कि ऐसा क्या हो गया कि रातोंरात राष्ट्रपति शासन हट गया और फडणवीस मुख्यमंत्री बना दिए गए ? उन्हें 7 दिन का समय देने की क्या आवश्यकता थी ? दोनों पक्षों की दलीलों से स्पष्ट है कि सरकारी पक्ष विपक्ष की दलीलों पर भारी पड़ा, जो महाराष्ट्र के मामले को कर्नाटक का रूप देने की कोशिश कर रहा था। अब देखना यह होगा कि मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट सुबह 10.30 बजे क्या निर्णय सुनाता है।

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