मुफ्तख़ोरी के दल-दल में देश : केसीआर के बाद केजरी ने ‘लुटाया’ खज़ाना, क्या यही सपना था अण्णा का ?

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* केजरीवाल तो जनता की भलाई और बदलाव के लिए राजनीति में आए थे

* वोट के लिए करदाताओं की पसीने की कमाई का दुरुपयोग क्यों कर रहे हैं ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 2 अगस्त, 2019 (युवाPRESS)। भारत को अंग्रेजों की दासता से स्वतंत्र हुए 72 वर्ष होने जा रहे हैं। जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब भी देश में निर्धनों की संख्या बहुतायत में थी। आँकड़ों में देखें, तो भारत में 1950 में 36 करोड़ की जनसंख्या में 21 करोड़ निर्धनों की श्रेणी में आते थे। आश्चर्य की बात यह है कि आज 72 वर्षों की स्वतंत्र यात्रा के बाद भी देश में निर्धनों की कोई कमी नहीं है। 136 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत में आज भी 27 करोड़ 60 लाख लोग ग़रीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि देश और राज्यों की सरकारों ने निर्धनों को निर्धनता से उबारने के लिए कोई कार्य नहीं किया, परंतु इस कार्य का राजनीतिकरण इस कार्य की सबसे बड़ी बाधा बन गया। स्वतंत्रता के बाद आरंभ हुए चुनावों और चुनावों के माध्यम से सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने की होड़ ने निर्धनता निर्मूलन कार्यक्रम में सबसे बड़ा अड़ंगा लगाया। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता के सिंहासन पर पहुँचने का एकमात्र मार्ग चुनावों में विजय हासिल करना है और इसी विजयी सिंहासन को हासिल करने के लिए राजनीतिक दलों ने जनता को आकर्षित करने की तरह-तरह की युक्तियाँ आज़माना शुरू किया। इन युक्तियों में सबसे ख़तरनाक युक्ति है जनता के मन में ‘मुफ्त की चीज़ों’ का लालच पैदा करना।

स्वतंत्रता के बाद से ही देश की जनता मुफ्तख़ोरी की राजनीति करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों के जाल में फँसती रही और निर्धनता के निवारण की मूल समस्या पीछे छूटती रही। आज तो हालात यह हो गए हैं कि देश की जनता मुफ्तख़ोरी के दल-दल में फँसती जा रही है। देश की जनता को राजनीतिक दलों और सरकारों से मुफ्त में मिलने वाली चीजें बहुत सुहाती हैं, भाती हैं और इसी लालच में वे अपने अमूल्य मत को मुफ्तख़ोरी की भेंट चढ़ा देते हैं, तो इस भेंट के बल पर अयोग्य लोग सत्ता पर पहुँच जाते हैं।

मुफ्तख़ोरी के मॉडल से कोसों दूर मोदी

भारतीय चुनावी राजनीति में मुफ्तख़ोरी के दूषण के विरुद्ध सबसे अडिग कोई राजनेता है, तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 13 वर्षों के शासन में मोदी ने जनता को कोई चीज़ मुफ्त में देने का चुनावी वायदा नहीं किया और न ही मुख्यमंत्री के रूप में ऐसा कोई काम किया। प्रधानमंत्री के रूप में भी मोदी मुफ्तख़ोरी के मॉडल वाली राजनीति से कोसों दूर हैं। मोदी की राजनीति का मूल मंत्र ही यह है कि जनता को हर सुख-सुविधा देना, परंतु मुफ्त में नहीं, उन्हें आत्म-निर्भर बना कर। यही वे कर भी रहे हैं।

परंतु अकेला चना भाड़ कैसे झोंक सकता है ? मोदी तो अब देश के प्रधानमंत्री हैं और राजनीति की बात करें, तो उनके अधिकार क्षेत्र में केवल एक ही दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी-BJP) ही है। दूसरी तरफ देश में भाजपा के अतिरिक्त सैकड़ों राजनीतिक दल हैं, जो मुफ्तख़ोरी की राजनीति पर ही सत्ता में आते हैं। मोदी सबको तो नहीं समझा सकते। देश में एक-दो नहीं, अपितु 31 राज्य हैं, जहाँ सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दल मुफ्तख़ोरी का रास्ता अपनाते हैं।

आप तो राजनीति बदलने आए थे केजरीवालजी !

बात बहुत पुरानी नहीं है। अभी चौबीस घण्टे पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के लिए अपना नहीं, दिल्ली सरकार का ख़जाना खोल दिया। केजरीवाल ने 200 यूनिट तक बिजली का उपभोग करने वाले उपभोक्ताओं से कोई बिजली शुल्क नहीं लेने की घोषणा की। केजरीवाल की इस घोषणा से दिल्ली सरकार के कोष पर 1800 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा। अब केजरीवाल इस राशि की भरपाई अपने वेतन से या निजी संपत्ति से तो करने वाले नहीं हैं। दिल्ली के निर्धन लोगों को 1800 करोड़ की यह सौगात केजरीवाल ने उन मेहनतकश और ईमानदार करदाताओं के दम पर दी है, जो अपनी पसीने की कमाई से दिल्ली के विकास में योगदान देना चाहते हैं। सरकार को होने वाली कर आय का उद्देश्य ही विकास होता है, परंतु क्या निर्धन लोगों का बिजली बिल माफ कर देने से वे अमीर हो जाएँगे ? उत्तर है, ‘कदापि नहीं।’ दरअसल दिल्ली में जनवरी-2015 में विधानसभा चुनाव आ रहे हैं। ऐसे में केजरीवाल का मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने का उद्देश्य स्पष्ट नज़र आता है, परंतु प्रश्न यह उठता है कि अण्णा आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल तो देश की पुराने ढर्रे की डर्टी पॉलिटिक्स को बदलने के लिए राजनीति में आए थे और उन्होंने आम आदमी पार्टी (AAP-आप) की स्थापना की थी। सवाल यह उठता है कि क्या मुफ्तख़ोरी के जरिए वे राजनीति में परिवर्तन लाएँगे ? क्या महान सामाजिक आंदोलनकारी अण्णा हज़ारे का यही सपना है ? अण्णा तो राजनीति से हमेशा दूर ही रहे हैं, परंतु केजरीवाल ने अण्णा से जिन वायदों के साथ राजनीति में आने की अनुमति मांगी थी, उन वायदों पर केजरीवाल कितना खरा उतरे हैं ?

देश के नेताओं से सीधा और तीखा सवाल ?

क्या जनता को मुफ्तख़ोरी की लत लगा कर ही चुनाव जीते जा सकते हैं ? ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोदी ने मुफ्तखोरी का कोई वायदा न करके भी गुजरात में तीन बार विधानसभा चुनाव और देश में दो बार लोकसभा चुनाव भारी बहुमत से जीते हैं। इसके बावजूद देश के कई राज्यों में वर्षों से लोगों के वोट हासिल करने के लिए राजनीतिक दल कभी टीवी, लैपटॉप मुफ्त देने का वायदा करते हैं, तो कभी साड़ियाँ बाँटी जाती हैं। अभी कुछ दिन पहले तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने एक अनोखा दान करके सरकारी खजाने को 2000 करोड़ रुपए का चूना लगा दिया। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस-TRS) के मुखिया केसीआर ने जिस गांव में जन्मे, उस गाँव का ऋण अदा करने के लिए गाँव में बसने वाले प्रत्येक परिवार को 10-10 लाख रुपए दान में देने की घोषणा की। यदि कोई अपने गाँव के प्रति कृतज्ञता ही प्रकट करना चाहता है, तो उसे अपनी जेब से यह काम करना चाहिए, परंतु केसीआर आधुनिक भारत के अनोखे और विचित्र दानी निकले। आख़िर केसीआर की घोषणा से सरकारी खजाने पर पड़ने वाले 2000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ किससे वसूला जाएगा ? उत्तर है मेहनतकश और ईमानदार करदाता से। ऐसी परिस्थिति में कोई करदाता भला क्यों ईमानदारी से कर चुकाने के लिए प्रेरित होगा ? नेताओं को जनता की भलाई के लिए अच्छी-अच्छी योजनाएँ, उन्हें निर्धनता से बाहर लाने के प्रयास करने चाहिए, परंतु मुफ्तख़ोरी कभी भी निर्धनता निर्मूलन का स्थायी हल नहीं हो सकती।

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