क्या भारत लेगा चीन से सबक ? : E-COURT से हो रहा केसों का निपटारा, ऑनलाइन हो रही सुनवाई

रिपोर्ट : विनीत दुबे

अहमदाबाद, 8 दिसंबर, 2019 (युवाPRESS)। भारत (INDIA) में हैदराबाद (HYDERABAD) और उन्नाव (UNNAO) में दुष्कर्म और हत्या की घटनाओं (RAPE & MURDER CASES) के बाद देश की न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली के निर्भया कांड (NIRBHAYA CASE DELHI) के आरोपियों को 2012 में फाँसी की सज़ा सुनाए जाने के 6 साल बाद भी उन्हें फाँसी नहीं दी गई है। ऐसे में पुरजोर माँग उठ रही है कि अदालतों में केसों का तेजी से निपटारा किया जाना चाहिये और न्याय की माँग करने वालों को अविलंब न्याय मिले, ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिये। केन्द्र सरकार ने पिछले साल एक अध्यादेश पास किया था जिसमें दुष्कर्म मामलों की जाँच और ट्रायल (सुनवाई) की प्रक्रिया दो महीने के भीतर पूरी करने और अधिक से अधिक 6 महीने में केस का निपटारा करने का प्रावधान किया है। दूसरी ओर न्याय पालिकाओं में दलील दी जा रही है कि केसों की तुलना में न्यायाधीशों की कमी के कारण पेंडिंग केसों का ढेर बढ़ रहा है। 2019 तक छोटी से लेकर सबसे बड़ी अदालत तक 3.5 करोड़ से अधिक मामले पेंडिंग (PENDING) पड़े हैं। ऐसे में न्याय पालिका के समक्ष इन केसों के निपटारे की बड़ी चुनौती है। देश में सरकार और न्यायपालिका केसों के त्वरित निपटारे की कारगर व्यवस्था पर मंथन कर रहे हैं, तब चीन (CHINA) से ऐसी खबर आ रही है, जो भारत के लिये भी नज़ीर बन सकती है। चीन में पेंडिंग केसों का निपटारा करने के लिये ऑनलाइन अदालत (ONLINE COURT) का प्रकल्प तैयार किया गया है। इन ई-कोर्ट (E-COURT) में ऑनलाइन सुनवाई (ONLINE HEARING) करके केसों का निराकरण किया जा रहा है। इस प्रकल्प से अच्छे परिणाम भी सामने आ रहे हैं। चीन ने 1.18 लाख केसों में से 85 प्रतिशत केसों का निपटारा कर दिया है। जरूरत है भारत को भी चीन से सबक लेने की और ऐसे विकल्प पर गंभीरता से विचार करने की।

चीन का ई-कोर्ट प्रकल्प क्या है ?

चीन में ब्लॉकचेन, क्लाउड कंप्यूटिंग, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करके ई-कोर्ट शुरू की गई हैं। हेंगझाउ शहर में अगस्त-2017 में प्रथम इंटरनेट आधारित साइबर कोर्ट शुरू की गई थी। इस कोर्ट में पहले ही महीने में 12,074 केस आये थे, जिनमें से 10,391 केसों का निराकरण कर दिया गया। इस साइबर कोर्ट में जज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेकनीक का उपयोग करते हैं। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि इस अदालत में जज कोई इंसान नहीं, बल्कि मशीन (MACHINE) या रोबोट (ROBOT) हैं। इस मशीन या रोबोट के समक्ष वादी-प्रतिवादी को उपस्थित होना होता है। यह उपस्थिति भी वीडियो चेटिंग के माध्यम से हो सकती है। सुनवाई और दलीलें पूरी होने के बाद वादी-प्रतिवादी को कोर्ट का फैसला भी ऑनलाइन ही मिल जाता है। इस व्यवस्था में सबकुछ ऑनलाइन होता है, इसलिये वादी-प्रतिवादी को कहीं आना-जाना नहीं पड़ता है। इन्टरनेट के माध्यम से उपस्थिति दर्ज करानी होती है, जो घर या दफ्तर से भी हो सकती है। इन ई-अदालतों में हर तरह के विवादों का निपटारा किया जाता है। यह विवाद व्यापारिक, कॉपी राइट्स, ई-कॉमर्स प्रोडक्ट्स, जिम्मेदारी या दावों के भी हो सकते हैं। सर्वाधिक केस मोबाइल भुगतान और ई-कॉमर्स से जुड़े होते हैं। इनके अलावा सिविल विवाद से जुड़े वादी को अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करानी होती है। इसके बाद लॉग-इन करके अदालती सुनवाई में शामिल होना होता है। हेंगझाउ में ई-कोर्ट की स्थापना और इसकी सफलता के बाद राजधानी बीजिंग और गुआंगझाउ आदि शहरों में भी अदालतें शुरू की गईं और इनका परिणाम भी उत्साहजनक रहा। हेंगझाउ कोर्ट में केस दाखिल होने से लेकर सुनवाई, दलील और फैसला सब कुछ लगभग 38 दिन की प्रक्रिया में पूरा कर लिया गया।

सुप्रीम पीपल्स कोर्ट के अध्यक्ष व चीफ जस्टिस झाउकियांग के अनुसार इस वर्ष अक्टूबर तक देश की 90 प्रतिशत अदालतों में लगभग 30 लाख केसों की सुनवाई ऑनलाइन हो रही है, जबकि 1.18 लाख विवादों में से 85 प्रतिशत विवादों का ऑनलाइन निपटारा किया जा चुका है।

भारत की अदालतों में पेंडिंग केसों की स्थिति

भारतीय अदालतों में पेंडिंग पड़े केसों की बात की जाए तो छोटी अदालतों में हालत सबसे अधिक चिंताजनक है। वर्ष 2006 तक विभिन्न अदालतों में लगभग 2.50 करोड़ केस पेंडिंग थे, जो 2019 तक बढ़ कर 3.10 करोड़ हो गये हैं। सुप्रीम कोर्ट में वर्ष 2006 तक पेंडिंग केसों की संख्या 40 हजार थी, जो 2019 तक बढ़ कर 60 हजार हो गई है। इसी प्रकार देश के 25 हाईकोर्ट में पिछले तीन सालों में ही पेंडिंग केसों की संख्या 37 से बढ़ कर 44 लाख हो गई है। हाईकोर्ट में पेंडिंग केसों की बात करें तो एक साल से अधिक पेंडिंग पड़े केसों की संख्या लगभग 12.42 लाख है। 5 साल से पेंडिंग केसों की संख्या 14 लाख से अधिक और 5 से 10 साल तक के पेंडिंग केसों की संख्या 8.33 लाख व 10 साल से अधिक समय से पेंडिंग केसों की संख्या लगभग 8.25 लाख है। निचली अदालतों में 10 साल से अधिक समय से पेंडिंग केसों की संख्या 24.51 लाख से अधिक है और 5 से 10 साल के पेंडिंग केसों की संख्या 43.95 लाख, 1 से 5 साल के पेंडिंग केसों की संख्या 1.19 करोड़ और लगभग 1 साल से कम समय से पेंडिंग केसों की संख्या भी लगभग 1.19 करोड़ है। ऐसे भारत की सरकार और न्यायपालिका भी चीन से सबक लेते हुए ई-कोर्ट के प्रकल्प पर विचार करे तो पेंडिंग केसों का तेजी से निपटारा करने में मदद मिल सकती है।

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