क्या महात्मा गांधी को यह उपाधि दिलवाएँगे मोदी, जो उनकी 150वीं जयंती पर अविस्मरणीय श्रद्धांजलि बन जाए ?

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* लोग मानते हैं, पर भारत सरकार नहीं मानती महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता !!!

* 4 जून, 1944 को पहली बार बोस ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था

* 72 वर्षों से यही पढ़ाया-सुनाया जा रहा, ‘महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता हैं’

* 2012 में सरकार ने किया रहस्योद्घाटन, ‘भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं’

* क्या है धारा 18(1), जो महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित होने से रोकती है ?

विशेष टिप्पणी : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद 27 सितंबर, 2019 (युवाPRESS)। धारणा कीजिए कि आप कौन बनेगा करोड़पति (KBC) शो की हॉट सीट पर बैठे हैं। आपने कुल 16 में से 15 प्रश्नों के सही उत्तर दे दिए हैं और 1 करोड़ रुपए जीत चुके हैं। होस्ट अमिताभ बच्चन अंतिम और 16वाँ प्रश्न पूछने वाले हैं। आप सभी लाइफ लाइन का उपयोग कर चुके हैं। अब आपको अंतिम प्रश्न की प्रतीक्षा है। इस क्षण आपके मन में और शो देखने वाले सभी दर्शकों के मन में यही बात चल रही होगी कि अंतिम प्रश्न अत्यंत कठिन होगा, क्योंकि यह प्रश्न आपको केबीसी की सर्वोच्च पुरस्कार राशि 7 करोड़ रुपए दिलाएगा। ऐसे में यदि अमिताभ बच्चन आपकी स्क्रीन पर अंतिम प्रश्न के रूप में यह पूछ लें, ‘भारत के राष्ट्रपिता कौन हैं ? (WHO IS THE FATHER OF NATION OF INDIA ?)’ यह प्रश्न सुनते-देखते ही कदाचित पहली बार में आप हर्ष से भर जाएंगे कि कितना आसान प्रश्न पूछा गया है ? फिर आप इस प्रश्न के उत्तरों के चार विकल्पों पर दृष्टि दौड़ाएंगे, जो इस प्रकार हैं A. महात्मा गांधी, B. सरदार वल्लभभाई पटेल, C. नरेन्द्र मोदी और D. इनमें से कोई नहीं।

केबीसी में होस्ट अमिताभ बच्चन के समक्ष बैठे आप और शो को देख रहे लाखों दर्शकों के मुँह से इस फाइनल क्वेश्चन का एक ही फाइनल आंसर क्या निकलेगा ? ‘A. महात्मा गांधी’। यद्यपि आपने 15 भारी-भरकम और गूढ़ प्रश्नों के सटीक उत्तर दिए हैं और 16वें प्रश्न तक पहुँचे हैं, तो निश्चित रूप से आप विलक्षण प्रतिभा के धनी होंगे। संभव है कि उसी क्षण आपके मन में यह विचार उत्पन्न हो कि केबीसी वाले इतने मूर्ख तो नहीं हैं, जो वे 7 करोड़ की पुरस्कार राशि देने वाला अंतिम प्रश्न इतना आसान पूछेंगे। यदि आपके मन में यह विचार जागे, तो कदाचित आप इस प्रश्न का उत्तर में विकल्प ए को चुनने से पहले हजार बार सोचेंगे और सोचना भी चाहिए, क्योंकि इस प्रश्न का सही उत्तर ‘A. महात्मा गांधी’ नहीं, बल्कि ‘D. इनमें से कोई नहीं’ है !!!

आश्चर्य हुआ न ? परंतु यही वास्तविकता है। पिछले दिनों अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में वहाँ के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘FATHER OF INDIA’ की उपाधि दी। इसके पक्ष और विपक्ष में हमारे देश में अच्छी-खासी चर्चा छिड़ गई। यद्यपि सोशल मीडिया पर छिड़े इस चर्चा युद्ध में सभी ने एकमत से यह स्वीकार किया कि भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे, हैं और रहेंगे। उनका स्थान नरेन्द्र मोदी क्या, कोई नहीं ले सकता, परंतु एक कटु सत्य यह भी है कि महात्मा गांधी भारत सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रपिता नहीं हैं। भारतीय स्वतंत्रता को 72 वर्ष हो चुके हैं, परंतु भारत ने किसी भी व्यक्ति को अपना राष्ट्रपिता यानी फादर ऑफ नेशन घोषित नहीं किया है। यद्यपि भारत के प्रत्येक नागरिक को उसकी शिक्षा-दीक्षा में के दौरान यह बात अच्छे से रटा दी जाती है कि महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता हैं और देश का हर नागरिक उन्हें राष्ट्रपिता मानता भी है और उन्हें राष्ट्रपिता मानने में किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है, परंतु जहाँ तक सरकारी रिकॉर्ड का प्रश्न है, तो भारत सरकार ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित नहीं किया है। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानना यह भारतीयों की जनभावना का प्रतीक है। हमारे देश के लोगों की विशेषता है कि वे हर व्यक्ति को उसके विशिष्ट कौशल के लिए उपाधियाँ देते रहते हैं। जैसे कि हम सचिन तेंदुलकर को मास्टरब्लास्टर, क्रिकेट के भगवान जैसी उपाधियाँ देते हैं, जैसे कि हम सरदार पटेल को लौह पुरुष की उपाधि देते हैं, जैसे कि हम जवाहरलाल नेहरू को चाचा की उपाधि देते हैं, जैसे कि हम इंदिरा गांधी को आयरन लैडी की उपाधि देते हैं, परंतु ये सारी उपाधियाँ जनभावना से जन्मी हैं, भारत सरकार ने किसी को कोई उपाधि नहीं दी।

2012 में हुआ रहस्योद्घाटन, ‘भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं’

अब आपके मन में प्रश्न उठ रहा होगा कि महात्मा गांधी निर्विवाद रूप से भारत के राष्ट्रपिता की उपाधि पाने के योग्य हैं, तो फिर भारत सरकार ने स्वतंत्रता के 72 वर्ष बीत जाने के बावजूद उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि क्यों नहीं दी ? सबसे पहले तो आपको यह बता देते हैं कि महात्मा गांधी को जब हम राष्ट्रपिता कहते हैं, तो वह हृदय से कहते हैं। इसके लिए कोई सरकारी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि महात्मा गांधी को 68 वर्ष पहले जब पहली बार राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया गया था, तब भी यह उद्गार हृदय से ही निकला था। आश्चर्य की बात यह है कि महात्मा गांधी को 4 जून, 1944 को उस सुभाष चंद्र बोस ने रेडियो सिंगापुर से प्रसारित अपने संदेश में पहली बार राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया था, जो महात्मा गांधी की अहिंसक और शांतिपूर्ण विचारधारा से विपरीत हिंसा और छीन कर स्वतंत्रता लेने के पक्षधर थे। विरोधी विचारधारा के बावजूद बोस के हृदय से महात्मा गांधी के लिए राष्ट्रपिता जैसा महान उद्गार हृदय से निकला था और इसलिए निकला था, क्योंकि बोस जानते थे कि महात्मा गांधी में वह कौशल है, जो पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोता है। 4 जून, 1944 के बाद तो पूरे देश ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में हृदय से स्वीकार कर लिया और 1944 से यानी पिछले 75 वर्षों और स्वतंत्र भारत में पिछले 72 वर्षों से हमें यह बताया-पढ़ाया-सुनाया जाता है कि महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता हैं, परंतु वर्ष 2012 में पहली बार प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने यह रहस्योद्घाटन किया कि भारत सरकार ने महात्मा गांधी आधिकारिक रूप से राष्ट्रपिता का दर्जा नहीं दिया है। 18 जून, 2012 को भारत सरकार की ओर से सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत दायर एक आवेदन के प्रत्युत्तर में अधिकृत रूप से कहा गया, ‘भले ही महात्मा गांधी को लोकप्रिय ढंग से राष्ट्रपिता कहा जाता है, परंतु सरकार ने कभी इस प्रकार की कोई उपाधि औपचारिक रूप से उन्हें प्रदान नहीं की।’

संविधान की सुदृढ़ता और सरकार की विवशता !

वास्तव में महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की अधिकृत उपाधि देने से रोकता है हमारा संविधान। यह हमारे संविधान की सुदृढ़ता है कि वह देश के हर नागरिक को समान मानता है। नागरिकों को समानता का यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 18 में दिया गया है। अनुच्छेद 18 नागरिकों को दी जाने वाली सभी उपाधियों का उन्मूलन करता है, तो अनुच्छेद 18(1) की उद्घोषणा है, ‘राज्य (भारत सरकार/ राज्य सरकारें) नागरिकों या अनागरिकों को विधा या सैन्य सेवा से जुड़ी उपाधियों के अतिरिक्त कोई उपाधि नहीं देगा।’ अनुच्छेद 18(2) कहता है कि कोई भी भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से उपाधि प्राप्त नहीं करेगा। अनुच्छेद 18(3) के अनुसार यदि कोई विदेशी नागरिक भी भारत सरकार की सेवा में है, तो राष्ट्रपति की अनुमति के बिना वह विदेशी नागरिक राज्य से कोई उपाधि ग्रहण नहीं करेगा। यह हमारे संविधान की सुदृढ़ता का प्रतीक है कि वह समानता में कितना विश्वास करता है, जहाँ गांधी-सरदार-नेहरू सहित सभी नागरिक समान हैं, परंतु यदि जनभावना की बात करें, तो लोग महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता, नेहरू को चाचा नेहरू और सरदार को लौह पुरुष के रूप में पुकारते हैं। वैसे सरदार और नेहरू को जनता से मिली उपाधियाँ उनके प्रेम, स्नेह और दृढ़ संकल्पों का दर्पण हैं। इन्हें सरकार अधिकृत रूप से चाचा या लौह पुरुष घोषित न करे, तो कोई बड़ी बात नहीं है, परंतु महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करना भारत सहित समग्र विश्व में भारत के लिए गौरव की बात कहलाएगी।

क्या ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ ?

यद्यपि भारत सरकार संविधान की धारा 18(1) के समानता के अधिकारों के प्रावधानों के कारण महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने को लेकर विवश है, परंतु जिन महात्मा गांधी ने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान कर दिया, क्या वे अधिकृत रूप से भारत के राष्ट्रपिता घोषित होने के अधिकारी नहीं हैं ? भले ही बापू को राष्ट्रपिता घोषित करने के लिए पूर्ववर्ती सरकारों ने कुछ न किया हो, परंतु क्या वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार, जो अपने धारा 370 के उन्मूलन जैसे साहसी निर्णयों के लिए विख्यात है, महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने की दिशा में कुछ कर सकती है ? इस प्रश्न का उत्तर है, ‘हाँ।’ 26 जनवरी, 1950 को अस्तित्व में आए भारतीय संविधान में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारों ने कभी दलहित, तो कभी देशहित में कई संशोधन किए। वर्तमान मोदी सरकार ने तो धारा 370 हटा कर संविधान के इतिहास का सबसे बड़ा और साहसी संशोधन किया। ऐसे में, जबकि देश आगामी 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाने जा रहा है और स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का उल्लेख कर रहे हैं, तब क्या मोदी सरकार धारा 370 की तरह ही, धारा 18(1) में एक साधारण संशोधन नहीं कर सकती ? धारा 370 पर तो कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक दलों का विरोध भी था, परंतु यदि मोदी सरकार महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने के लिए धारा 18(1) में कोई संशोधन करना चाहेगी, तो कांग्रेस भी इसका विरोध करने का साहस नहीं कर सकेगी। विश्वास के साथ कहा तो यहाँ तक जा सकता है कि भारत की संसद में महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करवाने के लिए धारा 18(1) में संशोधन प्रस्ताव लाया जाए, तो देश के 1,841 राजनीतिक दलों में से एक भी दल इसका विरोध नहीं करेगा और यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होगा। समय की मांग भी यही है, क्योंकि हम बापू की 150वीं जयंती मना रहे हैं। ऐसे में मोदी सरकार चाहे, तो एक अध्यादेश के माध्यम से भी 2 अक्टूबर के दिन ही महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करके उन्हें अब तक की सबसे महान और अविस्मरणीय श्रद्धांजलि देने का महाकार्य कर सकते हैं।

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